स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

विपासना और नाद श्रवण को लेकर साधकों में उठते हैं कई विचार

दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।

आध्यात्मिक यात्रा पर निकले हर साधक के मन में यह प्रश्न उठता है कि आत्म-बोध और शांति के लिए कौन सा मार्ग चुनें। ध्यान की अनगिनत विधियों में, विपासना और नाद श्रवण (अनाहत नाद को सुनना) दो अत्यंत शक्तिशाली और प्रचलित मार्ग हैं। दोनों का लक्ष्य एक ही है – मन के पार जाकर चेतना के शुद्ध स्वरूप का अनुभव करना। लेकिन उनकी प्रक्रिया और अनुभव में भिन्नता है। प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती के प्रवचनों और विश्लेषणों के आधार पर, यह लेख इन दोनों विधियों का गहन विश्लेषण करेगा ताकि आप यह समझ सकें कि आपके लिए कौन सी विधि अधिक उपयुक्त हो सकती है।

विपासना: यथार्थ को उसके यथार्थ रूप में देखना

विपासना का अर्थ है “विशेष रूप से देखना”। यह आत्म-निरीक्षण द्वारा आत्म-शुद्धि की एक प्रक्रिया है। इसमें साधक अपने शरीर के भीतर उत्पन्न होने वाली संवेदनाओं पर ध्यान केंद्रित करता है और उन्हें बिना किसी प्रतिक्रिया के, तटस्थ भाव से या साक्षी भाव से देखता है।

  • मूल सिद्धांत: विपासना इस सिद्धांत पर आधारित है कि मन और शरीर गहरे स्तर पर जुड़े हुए हैं। मन में उठने वाला हर विकार, जैसे क्रोध, भय, या लोभ, शरीर में एक निश्चित संवेदना पैदा करता है। जब हम इन संवेदनाओं को साक्षी भाव से देखना सीख जाते हैं, तो हम उन विकारों की जड़ों तक पहुँचकर उन्हें निर्मूल कर सकते हैं।
  • प्रक्रिया: साधक अपनी आती-जाती सांस के प्रति सजग होकर शुरुआत करता है। धीरे-धीरे, वह अपने ध्यान को पूरे शरीर पर घुमाता है और हर छोटी-बड़ी संवेदना (जैसे खुजली, दर्द, दबाव, या स्पंदन) को बिना अच्छा या बुरा कहे, बस देखता है। यह निरंतर अभ्यास मन को वर्तमान क्षण में जीना सिखाता है और उसे प्रतिक्रिया करने की पुरानी आदत से मुक्त करता है।

स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती के अनुसार, मन को शांत नहीं किया जा सकता, लेकिन हम उस अशांत मन के दृष्टा बनकर शांत अवस्था में पहुँच सकते हैं। वे कहते हैं, जब आप दूर से देखते हैं, एक बात पक्की हो गई कि आप मन नहीं हैं। आप कोई और हैं। वो जो कुछ और है, चैतन्य, वह शांत है।” विपासना इसी साक्षी या दृष्टा भाव को जगाने की एक क्रमिक और वैज्ञानिक विधि है।

नाद श्रवण: अस्तित्व के अनहद संगीत से जुड़ना

नाद श्रवण या अनाहत नाद को सुनना, एक अधिक सूक्ष्म और प्रत्यक्ष विधि है। ‘अनाहत’ का अर्थ है ‘बिना किसी आघात के उत्पन्न हुई ध्वनि’। यह वह आंतरिक संगीत है जो ब्रह्मांड में निरंतर बज रहा है और हमारे भीतर भी मौजूद है। यह सृष्टि की मौलिक ऊर्जा का ध्वनि रूप है।

  • मूल सिद्धांत: यह विधि इस मान्यता पर आधारित है कि संपूर्ण अस्तित्व ऊर्जा का ही एक स्पंदन है। जैसा कि स्वामी जी समझाते हैं, एक ही ऊर्जा है और वही ऊर्जा जब संघनित होती है तो पदार्थ की तरह दिखती है… आध्यात्मिक साधक के लिए, जीवन ऊर्जा… अनहद नाद (unstruck sound) में बदल सकती है।” इस आंतरिक ध्वनि को सुनने से चित्त सहज ही शांत और एकाग्र हो जाता है, क्योंकि मन को भटकने के लिए कोई बाहरी आलंबन नहीं चाहिए होता।
  • प्रक्रिया: साधक शांत स्थान पर बैठकर, कानों को बंद करके भीतर उठने वाली सूक्ष्म ध्वनियों पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करता है। शुरुआत में यह झींगुर की आवाज, बांसुरी, या घंटी जैसी लग सकती है। स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती इसे सर्वाधिक सुगम विधियों में से एक मानते हैं। वे कहते हैं, कान बंद करके अनहत नाथ को सुनना सर्वाधिक सुगम है।” जैसे-जैसे साधक इस ध्वनि में डूबता जाता है, विचार अपने आप शून्य हो जाते हैं और वह गहरे ध्यान में उतर जाता है।

ऊर्जा, चेतना और ध्यान का संबंध

स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती के अनुसार, दोनों विधियों का आधार एक ही है – ऊर्जा का रूपांतरण। वे स्पष्ट करते हैं कि ऊर्जा ही मूल तत्व है, जो अलग-अलग रूपों में प्रकट होती है।

“The same energy can be experienced as divine fragrance, divine taste, divine intoxication… When we talk about eternal consciousness (शाश्वत चेतन), it is the manifestation of the same energy. The seers of Upanishads have called it Ādiśakti, the original energy.”

  • विपासना में, हम ऊर्जा के स्थूल रूप (शारीरिक संवेदनाओं) को देखकर अपनी चेतना को परिष्कृत करते हैं।
  • नाद श्रवण में, हम ऊर्जा के सूक्ष्म रूप (ध्वनि) से सीधे जुड़कर चेतना के स्रोत तक पहुँचते हैं।

दोनों ही मार्गों का अंतिम लक्ष्य उस शाश्वत चेतना का अनुभव करना है, जो सभी रूपों और अभिव्यक्तियों के परे है।

कौन सा मार्ग आपके लिए है?

यह कहना कि एक विधि दूसरे से “बेहतर” है, उचित नहीं होगा। यह साधक के स्वभाव और प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।

पहलूविपासनानाद श्रवण (अनाहत नाद)
दृष्टिकोणविश्लेषणात्मक और क्रमिक। स्थूल (शरीर) से सूक्ष्म (मन) की ओर।भक्तिपूर्ण और प्रत्यक्ष। सीधे सूक्ष्म (ध्वनि) से जुड़ना।
आवश्यकताधैर्य, अनुशासन और संवेदनाओं के प्रति तटस्थ रहने की क्षमता।गहरी श्रद्धा, सुनने की संवेदनशीलता और आंतरिक मौन।
प्रारंभिक अनुभवशुरुआत में उबाऊ या कठिन लग सकता है क्योंकि मन बार-बार भटकता है।अधिक आकर्षक हो सकता है क्योंकि एक दिव्य ध्वनि का अनुभव होता है।
किसके लिए उपयुक्तजो लोग तार्किक, वैज्ञानिक और व्यवस्थित दृष्टिकोण पसंद करते हैं।जो लोग भक्ति-भाव वाले हैं, संगीत या ध्वनि के प्रति संवेदनशील हैं।

स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती के शब्दों में, कान से भीतर जाने से नाद सुनाई देता है… आँख से भीतर जाने पर आलोक (आंतरिक प्रकाश) दिखाई देता है।” यह इंगित करता है कि अलग-अलग इंद्रियों के माध्यम से एक ही आंतरिक सत्य तक पहुँचा जा सकता है। नाद श्रवण को उन्होंने “सर्वाधिक सुगम” कहा है, जिसका अर्थ है कि कई लोगों के लिए इसमें प्रवेश करना आसान हो सकता है।

विधि महत्वपूर्ण नहीं, अवस्था महत्वपूर्ण है

अंततः, विपासना हो या नाद श्रवण, दोनों ही शक्तिशाली उपकरण हैं जो हमें मन के कोलाहल से निकालकर साक्षी भाव में स्थित होने में मदद करते हैं। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि आप कौन सी नाव चुनते हैं, बल्कि यह है कि आप नदी पार कर पाते हैं या नहीं। स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती का जोर विधि से अधिक उस अवस्था पर है जहाँ आप यह जान जाते हैं कि ‘आप मन नहीं हैं’।

अपनी यात्रा की शुरुआत के लिए आप दोनों विधियों को आजमा सकते हैं और देख सकते हैं कि कौन सी विधि आपके साथ अधिक प्रतिध्वनित होती है। लक्ष्य किसी विधि में सिद्धहस्त होना नहीं, बल्कि उस शाश्वत, शांत चैतन्य में स्थित होना है जो हम सबका वास्तविक स्वरूप है।

प्रश्न और उत्तर (Q&A):

प्रश्न 1: स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती के अनुसार विपासना और नाद श्रवण में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर: मुख्य अंतर उनके दृष्टिकोण में है। विपासना एक विश्लेषणात्मक विधि है जिसमें शरीर की संवेदनाओं को साक्षी भाव से देखकर मन को शुद्ध किया जाता है। वहीं, नाद श्रवण एक प्रत्यक्ष विधि है जिसमें साधक सीधे आंतरिक ध्वनि (अनाहत नाद) से जुड़कर मन को शांत करता है।

प्रश्न 2: क्या स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती किसी एक विधि को श्रेष्ठ बताते हैं?

उत्तर: वे किसी विधि को श्रेष्ठ नहीं बताते, लेकिन वे कहते हैं कि “कान बंद करके अनहत नाथ को सुनना सर्वाधिक सुगम है,” जिसका अर्थ है कि यह विधि कई साधकों के लिए शुरू करने में अपेक्षाकृत आसान हो सकती है।

प्रश्न 3: अनाहत नाद क्या है?

उत्तर: अनाहत नाद वह आंतरिक, दिव्य ध्वनि है जो बिना किसी भौतिक टकराव के उत्पन्न होती है। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा का ध्वनि रूप है जो हमारे भीतर भी निरंतर विद्यमान है। इसे सुनना ही नाद श्रवण ध्यान है।

प्रश्न 4: इन ध्यान विधियों का अंतिम लक्ष्य क्या है?

उत्तर: इन सभी विधियों का अंतिम लक्ष्य साक्षी भाव को जगाना है, यानी यह बोध कि आप मन, शरीर या विचारों से परे एक शुद्ध चेतना हैं। इसका लक्ष्य मन को शांत कर आत्म-साक्षात्कार या समाधि की अवस्था को प्राप्त करना है।

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