सत्कर्म की परिभाषा को लेकर दूर करें भ्रम, मां अमृत प्रिया के विचारों पर गहन मंथन
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
हाल ही में, आध्यात्मिक वक्ता मां अमृत प्रिया द्वारा सत्कर्म की पारंपरिक परिभाषा पर एक बड़ा खुलासा हुआ है। एक नई व्याख्या सामने आई है जो सदियों से चली आ रही ‘दान-यज्ञ ही सत्कर्म है’ की धारणा को चुनौती देती है। अमृत प्रिया के अनुसार, भगवान कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि सत शब्द का अर्थ केवल परमात्मा का नाम नहीं, बल्कि ‘सत्य भाव’ और ‘श्रेष्ठ भाव’ में किया गया कोई भी कार्य है। यह एक नया ट्रेंड है जहां आध्यात्मिक समझ ‘कर्मकांड’ से हटकर ‘कर्म के पीछे के इरादे’ पर केंद्रित हो रही है।
अमृत प्रिया ने प्रवचन में इस बात पर ज़ोर दिया कि कृष्ण स्पष्ट कहते हैं, “हे पार्थ, उत्तम कर्म के लिए भी सत शब्द जुड़ता है।” इसका निर्णायक अर्थ यह है कि जब कोई कार्य अच्छे मन और नेक इरादे से किया जाता है, तब वह शुभ और श्रेष्ठ होता है। यदि आपके दान, यज्ञ, या पूजन के पीछे अहंकार या ‘कर्ता भाव’ है, तो वह कार्य सत्कर्म नहीं माना जाएगा।
यह नई समझ भारत के युवाओं के बीच तेज़ी से फ़ैल रही है, जो जटिल कर्मकांडों के बजाय जीवन के हर छोटे कार्य में आत्मिक संतोष खोजने की ओर अग्रसर हैं। इस दृष्टिकोण से, बर्तन धोना या झाड़ू लगाना भी उतना ही बड़ा सत्कर्म हो सकता है जितना कोई बड़ा धार्मिक अनुष्ठान।
बाहरी प्रेरणा बनाम आत्म-प्रेरणा: सत्कर्म का मूल
एक कर्म को सत्कर्म बनने के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त है उसकी आत्म-प्रेरणा। मां अमृत प्रिया ने कहा कि जब तक कोई कर्म किसी बाहरी लालच (जैसे पुण्य कमाने) या दबाव से प्रेरित होकर किया जाता है, तब तक वह ‘सत्कर्म’ नहीं होता।
जिस कार्य को व्यक्ति अंतः प्रेरणा से, अपने आनंद से करता है, वही श्रेष्ठ है। ऐसा इसलिए क्योंकि परमात्मा कर्म के दिखावे को नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे इंटेंशन (इरादे) और भाव को देखता है। यदि यह गहरी बात हमारे जीवन में स्पष्ट हो जाए, तो जीवन की अनगिनत उलझनें सुलझ सकती हैं। हम अक्सर ‘सत्कर्म’ करने के चक्कर में जीवन के उपयोगी क्षणों को व्यर्थ गंवाते रहते हैं, जबकि आवश्यकता केवल अपने इरादों को शुद्ध करने की है। यहाँ तक कि किसी को हँसा देना जैसा छोटा-सा कार्य भी सत्कर्म हो सकता है, बशर्ते वह शुद्ध भाव से किया गया हो।
तीन प्रकार की वृत्तियाँ: तामसी, राजसी और सात्विक
जीवन में कर्म करने के तरीके को तीन प्रमुख वृत्तियों में विभाजित किया गया है, जिसका गहरा संदर्भ भगवद्गीता में मिलता है:
- तामसी वृत्ति (Inertia): इस वृत्ति के लोग आलस्य और अज्ञान से भरे होते हैं। उनकी “गाड़ी हमेशा पार्किंग में लगी रहती है।” वे कोई भी कार्य शुरू करने से पहले बहाने खोजते हैं और जीवन में कोई गति नहीं कर पाते।
- राजसी वृत्ति (Over-Activity): ये लोग अत्यधिक कर्मठ होते हैं, लेकिन बिना सोचे-समझे भागते हैं। उनका पैर हमेशा एक्सलरेटर पर दबा रहता है। वे कर्म करते हैं, लेकिन कर्म के उद्देश्य, परिणाम, या दिशा पर विचार नहीं करते, जिससे वे अक्सर भटक जाते हैं और कष्ट पाते हैं।
- सात्विक वृत्ति (Balance): यह उत्तम कर्म की कुंजी है। सात्विक वृत्ति का व्यक्ति संतुलन वाला होता है। उसे पता होता है कि कब ब्रेक लगाना है और कब एक्सलरेटर दबाना है। वह जीवन में कर्म को एक माध्यम मानता है, जब कर्म सामने आता है तो वह करता है, और जब कर्म नहीं होता, तो अपने ‘होने के आनंद’ में रम जाता है।
सत्कर्म का वास्तविक जन्म सात्विक वृत्ति से ही होता है, जहाँ कर्म अकर्ता भाव (निष्काम भाव) से, एक माध्यम बनकर, छंद और आनंद के अतिरेक से किया जाता है।
भक्ति योग: मिटने का मार्ग और ‘सत चित आनंद’
कर्म योगी कर्मों को सुधारने में, और ज्ञान योगी ज्ञान को शुद्ध करने में लगे रहते हैं, लेकिन भक्ति योग एक तीसरा और गहरा मार्ग दिखाता है। भक्त यह स्वीकार करता है कि “मैं ही प्रॉब्लम हूँ,” और इसलिए मेरा कोई भी कर्म शुद्ध सत्कर्म हो ही नहीं सकता।
भक्त का उद्देश्य है स्वयं का फ़ना (मिट जाना) हो जाना। इस समर्पण के भाव से, भक्त पाता है कि मिटते-मिटते जो बचा, वह केवल सत (सत्य) ही है—नानक द्वारा कहा गया ‘एक ओंकार सतनाम’। जब कोई व्यक्ति ओंकार की ध्वनि में डूबता है, तो उसे तीन दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं, जिन्हें सत चित आनंद कहा जाता है:
- सत (Beingness): ‘मैं हूँ’ में ‘मैं’ (अहंकार) मिट जाता है, केवल ‘हूँ’ (होने का भाव) बचता है।
- चित (Consciousness): चैतन्यता बढ़ती है, और खोज का दिया स्थिर हो जाता है।
- आनंद (Bliss): अकारण खुशी का एहसास होता है। यह आनंद किसी कारण, परिस्थिति या व्यक्ति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि स्वयं के ‘होपन’ में ठहरने से उत्पन्न होता है।
इस प्रकार, सत्कर्म बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता, आत्म-प्रेरणा, और अकर्ता भाव से किया गया वह कार्य है जो हमें ‘सत चित आनंद’ की ओर ले जाता है।
सत्कर्म और जीवन का हल
सत्कर्म की यह गहन समझ जीवन को सरल और सार्थक बनाती है। यह हमें सिखाती है कि हमारे जीवन का हल बाहरी कर्मों की मात्रा में नहीं, बल्कि उन कर्मों के पीछे की गुणवत्ता—अर्थात् शुद्ध भाव और इरादे—में निहित है। झाड़ू लगाने से लेकर किसी बड़े प्रोजेक्ट को पूरा करने तक, प्रत्येक कार्य यदि आत्म-प्रेरणा और साधु भाव से किया जाए, तो वह सत्कर्म है। अंततः, हरि ओम तत्सत की ध्वनि में डूबकर अपने अहंकार को विदा करना ही जीवन का सबसे बड़ा और उत्तम कर्म है।
Q&A Section (FAQ)
Q1. भगवद्गीता के अनुसार सत्कर्म की सबसे सरल परिभाषा क्या है?
A1. भगवद्गीता के अनुसार, सत्कर्म वह कार्य है जो आत्म-प्रेरणा से, बिना किसी कर्ता भाव या अहंकार के, शुद्ध साधु भाव (श्रेष्ठ इरादे) से किया जाता है। परमात्मा कर्म को नहीं, बल्कि उसके पीछे के इंटेंशन को देखता है।
Q2. सात्विक, राजसी और तामसी वृत्तियाँ सत्कर्म से कैसे जुड़ी हैं?
A2. सात्विक वृत्ति ही संतुलन (बैलेंस) पैदा करती है जो सत्कर्म के लिए अनिवार्य है। तामसी वृत्ति आलस्य में कर्म करने से रोकती है, जबकि राजसी वृत्ति अति-कर्म में भटका देती है। केवल सात्विक व्यक्ति ही निष्काम भाव से कार्य करता है, जो सत्कर्म है।
Q3. ‘अकर्ता भाव‘ (निष्काम कर्म) का क्या अर्थ है?
A3. अकर्ता भाव का अर्थ है कर्म को एक माध्यम बनकर करना, यह सोचे बिना कि ‘मैं यह कर रहा हूँ।’ यह फल की इच्छा, अहंकार या कर्तापन के भाव से मुक्त होकर कर्म करना है।
Q4. सत चित आनंद की अनुभूति सत्कर्म से किस प्रकार संबंधित है?
A4. जब कोई व्यक्ति वास्तविक सत्कर्म करता है या ओंकार की ध्वनि में डूबता है, तो उसका अहंकार मिटता है और उसे सत चित आनंद (होना, चैतन्यता और अकारण खुशी) की दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं। यह सत्कर्म का आंतरिक परिणाम है।
Q5. भक्ति योग सत्कर्म के अन्य मार्गों से किस तरह भिन्न है?
A5. भक्ति योग में भक्त यह स्वीकार करता है कि उसका होना ही अहंकार है, इसलिए वह स्वयं को मिटाने (फ़ना करने) पर ज़ोर देता है। वह अपने कर्मों को सुधारने के बजाय स्वयं को परमात्मा के चरणों में विलीन करने की कामना करता है, जिससे सहज ही सत की प्राप्ति होती है।
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