जब भाषा सत्य को समझाने में छोटी पड़ जाए
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
प्रख्यात आध्यात्मिक गुरू स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती अक्सर कहते हैं कि परम सत्य को भाषा में बांधना असंभव है। जब कोई बुद्ध पुरुष कहता है “अहं ब्रह्मास्मि”, तो वह व्याकरण की मजबूरी के कारण ‘अहं’ (मैं) शब्द का प्रयोग करता है। वास्तव में उसका भाव होता है—”मैं तो अब बचा ही नहीं, जो है वह केवल ब्रह्म ही है।” आज के समय में जब लोग डिप्रेशन और पहचान के संकट (Identity Crisis) से जूझ रहे हैं, स्वामी जी के ये सूत्र जीवन को एक नई दिशा देते हैं।
व्याकरण की गलती और ‘अहं ब्रह्मास्मि‘ का संकट
स्वामी जी बहुत खूबसूरती से समझाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति कहे “सिर्फ ब्रह्म है”, तो सुनने वाले को लगेगा कि वह किसी तीसरे व्यक्ति की बात कर रहा है। इसलिए ‘अहं’ जोड़ना पड़ता है। लेकिन यहीं से गलती शुरू होती है। लोग समझने लगते हैं कि यह व्यक्ति खुद को भगवान कह रहा है।
इसी भ्रम को तोड़ने के लिए गुरु ‘तत्त्वमसि‘ का सहारा लेते हैं। वे कहते हैं “तू भी वही है”। इसका अर्थ है कि यदि मैं ब्रह्म हूं, तो तू भी ब्रह्म है—यहाँ कोई छोटा या बड़ा नहीं है। यह सूत्र हमारे अहंकार को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि हमें यह एहसास कराने के लिए है कि हम सब एक ही चेतना के हिस्से हैं।
जन्म-मृत्यु का चक्र: सजा या समझ का अभाव?
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती इस बात पर जोर देते हैं कि परमात्मा कोई अलग व्यक्ति नहीं है जो ऊपर बैठकर हमें सजा दे रहा है।
- हमारी कामनाएं: हम अपनी इच्छाओं (Desires) के कारण ही बार-बार जन्म लेते हैं।
- प्रकृति का खेल: प्रकृति का काम केवल शरीर को बचाए रखना और वंश बढ़ाना है (निचले तीन चक्र)।
- मजा और सजा: हमें लगता है कि हम जीवन का मजा ले रहे हैं, लेकिन वास्तव में हम अपनी ही कामनाओं की सजा भुगत रहे होते हैं। जिस दिन हम ‘निष्काम’ हो जाते हैं, उस दिन लौटना बंद हो जाता है।
अस्तित्व के साथ तालमेल
स्वामी जी का संदेश स्पष्ट है: अस्तित्व चाहता है कि हम ‘मैच्योर’ (प्रौढ़) बनें। वह हमें कोई सजा नहीं दे रहा, बल्कि हमें विकसित होने का मौका दे रहा है। जैसे ही हम अपने भीतर के ज़हर (क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार) को छोड़कर अमृत (प्रेम, मैत्री, करुणा) की ओर बढ़ते हैं, हम उस परम सत्य के करीब पहुँच जाते हैं जिसे ‘ब्रह्म’ कहा गया है।
Q&A Section
Q1. स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती के अनुसार ‘अहं ब्रह्मास्मि‘ का भाव क्या है?
उत्तर: इसका भाव है “मैं नहीं हूं, केवल परमात्मा ही है।” भाषा की सीमा के कारण ‘मैं’ शब्द का उपयोग करना पड़ता है।
Q2. क्या गुरु और शिष्य में कोई अंतर है?
उत्तर: ‘तत्त्वमसि’ सूत्र के अनुसार कोई अंतर नहीं है। जो गुरु है, वही शिष्य भी है, बस शिष्य को अभी इसका बोध नहीं हुआ है।
Q3. मनुष्य के भीतर ईर्ष्या और क्रोध क्यों प्रबल होते हैं?
उत्तर: क्योंकि प्रकृति ने हमारे अस्तित्व को बचाने के लिए शुरुआती तीन चक्रों (Survival instincts) को बहुत विकसित कर दिया है।
Q4. ‘निष्काम‘ होने का क्या अर्थ है?
उत्तर: जब संसार की किसी भी वस्तु या पद को पाने की कोई इच्छा शेष न रहे, उसे निष्काम होना कहते हैं।
Q5. क्या जन्म-मृत्यु का चक्र टाला जा सकता है?
उत्तर: हाँ, आत्म-साक्षात्कार और निष्कामता के माध्यम से इस चक्र से मुक्ति संभव है।
- Black & White में कैद हुआ भारत का इतिहास! Roshan Lal Chopra की ‘Frames of Eternity’ प्रदर्शनी में दिखेंगे 11 प्रधानमंत्रियों के दुर्लभ पल
- Innova का सुख, बजट में फिट! Nissan Gravite 2026 का फर्स्ट ड्राइव रिव्यू: क्या ये है भारत की असली फैमिली कार?
- Nissan Gravite का जलवा! मात्र इतने में मिल रही है लग्जरी वाली फील, एक्सेसरीज की कीमतों ने उड़ाए होश-Check Details!
- 2026 Hyundai Verna Launched: 25 से ज्यादा नए अपडेट्स के साथ आई नई ‘वरना’, कीमत ₹10.98 लाख से शुरू—क्या यह एक Big Reveal है?
- Shakun Group MD Accident: क्या 2 करोड़ की BMW i7 भी नहीं बचा पाई वल्लभ माहेश्वरी की जान? रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसे की इनसाइड स्टोरी!






