साधकों के सवालों का जवाब देते हुए स्वामी जी ने अनाहत नाद का गुप्त विज्ञान बताया
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
हम सब अपने जीवन में कभी न कभी उस परम सत्ता या ईश्वर की खोज में निकलते हैं। कोई मंदिर की सीढ़ियां चढ़ता है, तो कोई तीर्थों की धूल छानता है। लेकिन क्या वास्तव में ईश्वर कहीं बाहर खोया हुआ है? सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने हाल ही में एक सत्संग के दौरान इस शाश्वत प्रश्न का ऐसा वैज्ञानिक और तार्किक उत्तर दिया है, जो हमारी सदियों पुरानी मान्यताओं को झकझोर कर रख देता है। स्वामी जी ने न केवल यह बताया कि ईश्वर को कैसे पाया जा सकता है, बल्कि उन्होंने मानवीय प्रेम, व्यापारिक बुद्धि और ‘आत्मा के सौंदर्य’ पर भी विस्तार से प्रकाश डाला है।
रिश्तों का गणित: क्या आप प्रेम कर रहे हैं या व्यापार?
स्वामी जी के पास एक जिज्ञासु ने प्रश्न रखा कि “मैं जिसे प्रेम और सम्मान देती हूं, बदले में वैसा नहीं मिलता, तो क्या करूं?” इस पर स्वामी जी ने जो विश्लेषण किया, वह आज के आधुनिक समाज के लिए एक बड़ा ‘आई ओपनर’ है।
उन्होंने कहा कि जब हम किसी को प्रेम या आदर देते हैं और बदले में कुछ पाने की अपेक्षा रखते हैं, तो वह प्रेम नहीं बल्कि एक ‘बिजनेस डील‘ (व्यापारिक सौदा) है। हमारे मन में एक गुप्त कैलकुलेटर चलता रहता है, जहाँ हम लाभ और हानि का हिसाब जोड़ते हैं। स्वामी जी कहते हैं, “सच्चा प्रेम तो वह है जो केवल लुटाना जानता है। जैसे एक माँ अपने अबोध बालक के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देती है, वह यह नहीं सोचती कि यह बच्चा उसे क्या वापस देगा।”
तनाव और दुख वहीं से शुरू होता है जहाँ हमारे भीतर का ‘व्यापारी’ जाग जाता है। जब तक आप ‘भिखारी’ बनकर प्रेम मांगेंगे, तब तक आप अपमानित महसूस करेंगे। जिस दिन आप ‘दाता’ बन जाएंगे, आपका हृदय शुद्ध होने लगेगा।
अध्यात्म: आत्मा का ‘ब्यूटी पार्लर‘
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने अध्यात्म को एक बहुत ही रोचक और आधुनिक उपमा दी—‘आत्मा का ब्यूटी पार्लर’। उन्होंने कहा कि जैसे महिलाएं अपने शरीर की सुंदरता और चेहरे के दाग-धब्बों को दूर करने के लिए ब्यूटी पार्लर जाती हैं, वैसे ही अध्यात्म हमारे मन और आत्मा के दागों को साफ करने की प्रक्रिया है।
- होश की शक्ति: स्वामी जी के अनुसार, हम जितने भी गलत काम करते हैं, वे ‘बेहोशी’ में होते हैं। जैसे ही हम अपने भीतर झांकते हैं और अपनी ‘याचक वृत्ति’ (मांगने की आदत) को देख लेते हैं, वह अशुद्धि अपने आप विदा हो जाती है।
- सजगता: चेहरे पर लगा धब्बा आईने में देखते ही हम साफ कर लेते हैं, वैसे ही ध्यान के आईने में मन के विकारों को देखते ही वे टिक नहीं पाते।
ईश्वर खोया नहीं है, हमारी पहचान गलत है
सबसे महत्वपूर्ण चर्चा ईश्वर की प्राप्ति पर हुई। स्वामी जी ने एक चुटकुले के माध्यम से समझाया कि हाथी इतना बड़ा जानवर है कि वह खो नहीं सकता। वैसे ही, ईश्वर तो यह पूरा अस्तित्व (Existence) है, वह खो कैसे सकता है?
समस्या यह है कि हमने अपने मन में ईश्वर की एक ‘काल्पनिक तस्वीर‘ बना ली है।
- धर्मों की भ्रांति: हिंदू, मुस्लिम, ईसाई—सबके पास ईश्वर का अपना-अपना फोटोग्राफ है। स्वामी जी का कहना है कि ये सब हमारी कल्पनाएं हैं। कोई ईश्वर स्वर्ण सिंहासन पर बैठकर दुनिया नहीं चला रहा है।
- गलत धारणा: यदि हम किसी गलत फोटो को लेकर असली व्यक्ति को ढूंढेंगे, तो वह सामने खड़ा होने पर भी हमें नहीं मिलेगा। यही कारण है कि करोड़ों लोग मंदिरों में जाकर भी ईश्वर से खाली हाथ लौटते हैं।
अनाहत नाद: ईश्वर का वास्तविक स्वरूप
स्वामी जी ने रहस्योद्घाटन किया कि ईश्वर वास्तव में एक ‘सूक्ष्म संगीत‘ है। वह कोई आकृति नहीं, बल्कि एक ‘चैतन्यमई ऊर्जा‘ (Conscious Energy) है। उन्होंने इसे ‘अनाहत नाद’ कहा।
- आहत नाद: वह ध्वनि जो दो चीजों के टकराने से पैदा होती है (जैसे ताली, बोलना या घंटी)। यह ध्वनि पैदा होती है और तुरंत नष्ट हो जाती है।
- अनाहत नाद: वह ध्वनि जो बिना किसी टक्कर के, बिना किसी संगीतकार के अनादि काल से गूंज रही है। इसे ही ‘ईश्वर का स्वर’ कहा जाता है।
ईश्वर से मिलन की प्रायोगिक विधि
स्वामी जी ने इस दिव्य संगीत को सुनने की एक बहुत ही सरल लेकिन प्रभावी विधि बताई है, जिसे कोई भी अपने घर पर कर सकता है:
- स्थान और समय: इसके लिए किसी हिमालय की गुफा में जाने की जरूरत नहीं है। आपके घर का एक शांत कोना पर्याप्त है। सुबह 4 से 5 बजे का समय (ब्रह्म मुहूर्त) सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि उस समय संसार और इंटरनेट दोनों शांत होते हैं।
- श्रवण ध्यान (Listening Meditation): चुपचाप बैठ जाएं। पहले बाहर की आवाजों को सुनें, फिर अपने शरीर के भीतर की हलचल को।
- सांसों का अंतराल: अपनी सांसों की आवाज सुनें। सांस के आने और जाने के बीच जो एक छोटा सा अंतराल (Gap) आता है, वहां कोई हलचल नहीं होती। उस शून्य में ही ‘अनाहत नाद’ की गूंज सुनाई देती है।
- रिलैक्स्ड अवेयरनेस: ईश्वर को पाने के लिए तनावग्रस्त होने की जरूरत नहीं है। बस शांत और सजग होना है। जैसे-जैसे आप उस संगीत में डूबेंगे, आप (भक्त) मिटने लगेंगे और केवल वह संगीत (भगवान) शेष रह जाएगा।
कण-कण में दर्शन
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती का संदेश स्पष्ट है—ईश्वर दर्शन कोई बाहरी घटना नहीं, बल्कि आंतरिक उपलब्धि है। वह हमसे कभी अलग हुआ ही नहीं है, बस हम अपनी धारणाओं के शोर में उसे सुन नहीं पा रहे हैं। जिस दिन हमारा मन शांत होगा, हमें पता चलेगा कि हम सदा से उसी के घेरे में थे। यह मिलन ‘देखने’ से नहीं, बल्कि ‘मिट जाने’ से होता है।
आपके सवालों के जवाब
Q- क्या गृहस्थ जीवन में रहते हुए ईश्वर को पाया जा सकता है?
हाँ, स्वामी जी के अनुसार इसके लिए त्याग की नहीं, बल्कि ‘होश’ की आवश्यकता है। घर में रहते हुए ध्यान करना अधिक सहज है।
Q- अनाहत नाद सुनने में कितना समय लगता है?
यह आपकी सजगता पर निर्भर करता है। यदि आप पूरी तरह रिलैक्स होकर ‘सुनने’ की कला सीख लें, तो यह बहुत जल्दी अनुभव हो सकता है।
Q- क्या मंत्र जाप से ईश्वर मिलते हैं?
मंत्र जाप एक ‘आहत नाद’ है। स्वामी जी उस ‘अनाहत’ को सुनने की बात करते हैं जो मंत्रों के पीछे छिपा सन्नाटा है।
Q- दूसरों से सम्मान न मिले तो मन को शांत कैसे रखें?
यह समझें कि आप ‘भिखारी’ नहीं हैं। अपनी खुशी के लिए दूसरों पर निर्भरता छोड़ना ही शांति का मार्ग है।
Q- ध्यान के दौरान नींद आए तो क्या करें?
नींद आना इस बात का प्रमाण है कि आप रिलैक्स हो रहे हैं, लेकिन होश खो रहे हैं। सजगता बनाए रखें।
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