मुगल बादशाह भी पतंगबाजी का उठाते थे लुत्फ

बदरी, बारिश और बूंदे..बरसना तो छोड़िए जिक्र होते ही दिल बाग-बाग हो उठता है। मन मचल उठता है, दिल का मयूरा पंख फैला गुनगुनाने को बेकरार हो जाते हैं। क्या बड़े और क्या बच्चे, बुजुर्ग सभी झूम उठते हैं। शायद बारिश की बूंदों को महसूस करते ही मोहम्मद अल्वी ने गजल लिखी होगी कि-धूप ने गुजारिश की, एक बूंद बारिश की। दिल्ली में बारिश का अपना ही मजा है। पुरानी दिल्ली की गलियों में बारिश का उल्लास त्योहारों की मानिंद मनाया जाता था। पतंगबाजी के शोर से गली-मोहल्ले गूंज उठते थे तो घर के किचन में गर्म कड़ाही में बनता जायका लोगों के मुंह में पानी ला देता था। बारिश का जमा पानी तब बोझ नहीं लगता था। कागज की नौका बच्चों की खुशियों की पोटली बन जाती थी। तभी तो तहजीब हाफी ने गजल लिख डाली कि- मैं कि कागज की कश्ती हूं, पहली बारिश ही आखिरी है मुझमें। तो जगजीत सिंह दौलत, शोहरत ही नहीं अपनी पूरी जवानी न्यौछावर कर बारिश का पानी और कागज की कश्ती मांगते हैं। जामा मस्जिद, चांदनी चौक, दिल्ली गेट के खुले मैदानों में कभी बारिश के बाद पतंगबाजी के ऐसे पेंच लड़ते थे जो घंटो तक लोगों का मनोरंजन करते थे।

पतंगबाजी का शौक

इतिहासकार कहते हैं कि दिल्ली में आज से नहीं मुगल काल से पतंगबाजी शौक से बढ़कर कल्चर में शुमार रहा है। मुगल काल में यमुना के किनारे खुले मैदान पतंगबाजी का अड्डा होते थे। उन दिनों दिल्ली गेट के पास एक रेतीली ढलान होती थी जिसे महाबत खान की रेती कहते थे। इस ढलान पर पतंगबाजी का मैच आयोजित होता था। सावन में बारिश के बाद तेज हवाएं जब चलती थी तो मैच पूरे उफान पर होता था। कई बार लखनऊ तक से टीम आती थी यहां पतंगबाजी का मैच खेलने। इन दो टीमों के बीच जबरदस्त मुकाबला होता था। उन दिनों पतंग पर डिजाइन बनाना भी कला में शुमार था। नारायणी गुप्ता अपनी पुस्तक दिल्ली-बिटविन टू एम्पायर में लिखती हैं कि देवेन्द्रनाथ टैगोर 1857 की क्रांति के कुछ समय पहले दिल्ली आए थे। उनकी यात्रा में उन्हें सिर्फ एक बात जो याद रही कि कैसे बहादुर शाह जफर को पतंग उड़ाते देखने के लिए जबरदस्त भीड़ उमड़ी थी। जबकि दिल्ली-डेवलपमेंट एंड चेंज में आई मोहन लिखते हैं कि पहले पतंगबाजी सिर्फ शासक एवं उसके परिवार का ही शौक होता था लेकिन धीरे धीरे यह आम लोगों में भी लोकप्रिय हो गया। एक किस्सा आई मोहन लिखते हैं कि आजादी के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू संबोधित कर रहे थे, उसी समय एक पतंग उड़ते हुए उनके पास तक पहुंच गई। उन्होंने पतंग पकड़ लिया एवं फिर उसे हवा में आजादी के जश्न के प्रतीक स्वरूप उड़ा दिया। जबकि ए-डिफरेंट फ्रीडम में निकिता देसाई लिखती हैं कि शाह आलम (1702-12) के समय पतंगबाजी का शौक परवान चढ़ा। समय के साथ पतंगबाजी का शौक सावन की फुहारों के बाद तेज हवाओं के संरक्षण में जारी होकर 15 अगस्त तक जो चला तो वो दौर आज भी जारी है।

लजीज जायका

बारिश की बात हो और गर्मागर्म जायके का जिक्र ना हो तो बात बेमानी होगी। बारिश की बूंदों से भींगते मन को गर्मागर्म जायके से संतुष्टि मिलती है। अरबी यात्री इब्न बतूता द्वारा लिखित यात्रा वृतांत के अंग्रेजी अनुवाद पुस्तक ट्रेवल ऑफ इब्न बतूता इन एशिया एंड अफ्रीका में गिब लिखते हैं कि 14वीं सेंचुरी में तुगलकाबाद के शासक सुल्तान गयासुद्दीन की टेबल पर कई तरह के व्यंजन परोसे जाते थे। जिसमें प्याज और अदरक से पकाया मीट प्रमुख था। बादाम, अखरोट, पिस्ता, स्पाइसी मसाले मोटे ब्रेड के भीतर भर के खाया जाता था जो आजकल के समोसे की तरह था। खाने से पहले गुलाब शरबत दिया जाता था एवं खाने के बाद पान देने का रिवाज था। मुगलों के आने के बाद खानपान में विविधता आयी। सादिया देहलवी अपनी पुस्तक जैसमीन एंड जिन्न में लिखती हैं कि बारिश में पुरानी दिल्ली की गलियों से आती खुशबू हर किसी को अपना दिवाना बना देती। इसी क्रम में वो लाल मिर्च के उपयोग पर बताती है कि लाल मिर्च पुर्तगाली भारत लाए। 16वीं सदी में गोवा में उन्होंने खेती शुरू कि लेकिन दिल्ली पहुंचने में इसे दो सौ साल लग गए। दिल्ली पहुंचने की इसकी कहानी काफी दिलचस्प है। दररअसल, शाहजहां की बेटी जहांआरा ने चांदनी चौक बनाया। जो भारत के प्रतिष्ठित बाजारों में से एक था। बाजार के बीचो बीच एक नहर गुजरती थी जिससे ना केवल चांदनी चौक की खूबसूरती में चार चांद लगता था बल्कि पानी की आपूर्ति भी होती थी। लेकिन मुहम्मद शाह रंगीला के शासन में नहर का पानी प्रदूषित हो गया। नतीजा, लोगों की तबियत बिगड़ गई। शाही हकीम ने लोगों को मिर्च खाने की सलाह दी। इस तरह दिल्ली में लाल मिर्च खाने का चलन चल पड़ा जो आगे चलकर पानी के बताशे, पापड़ी, कलमी बड़े, समोसा और कचौड़ी में जमकर प्रयोग होने लगी।

सादिया देहलवी लिखती हैं कि मानसूनी सीजन में हरी मिर्च कीमा, शिमला मिर्च कीमा, दाल भरी रोटी, आम चटनी, बेसन रोटी और कढ़ी खूब पसंद किया जाता था। मिर्च, मांस, दही, धनिया, हल्दी, लहसुन पेस्ट, अदरक, प्याज और तेल से हरी मिर्च कीमा बनाया जाता था। जबकि इन्हीं सब सामानों में शिमला मिर्च कीमा भी बनाया जाता था। जबकि दाल भरी रोटी चना दाल, प्याज, हल्दी, ग्रीन चिली, पुदीना मिला बनाई जाती थी जिसे घर वाले जी भर के खाते थे। आम चटनी बारिश में कमोबेश हर शख्स की थाली में होता था। इसी तरह बारिश में बेसन रोटी और कढ़ी भी घरों में खूब बनती थी।

बारिश और आम

सादिया लिखती हैं कि बारिश के मौसम में पिकनिक के लिए महरौली बेस्ट डेस्टिनेशन था। अब्बू लाहौरी गेट से ऊंट किराए पर ले आते थे एवं रात में हमारा महरौली का सफर शुरू आता था। घर में अम्मी गेहूं के आटे और चीनी से गुल गुल बनाती थी। आम को लेकर प्रतियोगिता होती थी कि कौन कितने आम खा सकता है। दिल्लीवाला आम को लेकर चूजी होता है। शुरूआत सीजन में हम आम नहीं खाते थे। बारिश के बाद खाते थे। दशहरी, लंगड़ा, सरौली, चौसा, रटौल के हम क्या पूरी दिल्ली दीवानी थी। अब्बा रटौल आम पाकिस्तान से लेकर आते थे। सन 1948 में करीब डेढ़ सौ आम पाकिस्तान से लाकर दोस्तों में बांटा था। रटौल की कहानी भी दिलचस्प है। दरअसल, मूल रटौल तो उत्तर प्रदेश के बागपत में एक जगह है। ऐसी कहानी प्रचलित है कि अनवर नामक शख्स के रटौल में आम के बागान थे। बाद में वो पाकिस्तान शिफ्ट हो गया। वहां भी उसने आम लगाए जो ना केवल पाकिस्तान बल्कि दिल्ली में भी पसंद किए जाते थे। इसके अलावा अनरसे की गोली, सुहाला मिठाई भी खूब पसंद की जाती थी।

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