इच्छा और जरूरत का फर्क: क्या आपका लालच आपकी शांति छीन रहा है? स्वामी शैलेंद्र सरस्वती का बड़ा खुलासा
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
क्या आप भी महसूस करते हैं कि घंटों ध्यान में बैठने के बाद भी मन शांत नहीं होता? हाल ही में एक साधक ने स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती से यही प्रश्न पूछा कि आखिर गहरे ध्यान में प्रवेश क्यों नहीं हो पा रहा है। स्वामी जी ने इसका जो उत्तर दिया, वह आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सभी के लिए एक ‘आई-ओपनर’ है। अक्सर हम अपने ही मन के बनाए हुए जालों में उलझ जाते हैं। जब तक हम यह नहीं पहचानेंगे कि हमने अपने जीवन में कितना “जंजाल” फैला रखा है, तब तक समाधि का द्वार खुलना असंभव है। स्वामी जी के अनुसार, समस्या इच्छाओं में नहीं, बल्कि उन इच्छाओं के प्रति हमारी “बेहोशी” में है।
‘नीड‘ और ‘ग्रीड‘ का अंतर: अध्यात्म का असली विज्ञान
स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने स्पष्ट किया कि ‘इच्छा मात्र ही बाधा है’ का अर्थ यह नहीं है कि आप अपनी बुनियादी जरूरतें छोड़ दें। उन्होंने दो मुख्य श्रेणियां बताई हैं:
- नीड (जरूरत): भूख लगने पर भोजन, प्यास पर पानी और शरीर को ढंकने के लिए वस्त्र। ये शारीरिक आवश्यकताएं हैं और जब तक शरीर है, ये रहेंगी। इनका त्याग करना “आत्म-हिंसा” और मानसिक विक्षिप्तता है।
- ग्रीड (लालच/वासना): यह मानसिक है। एक अलमारी कपड़ों से भरी है, फिर भी और चाहिए। यह एक प्रकार का “मानसिक पागलपन” है जिसका कोई अंत नहीं है।
स्वामी जी ने उन साधुओं पर भी कटाक्ष किया जो शरीर को कष्ट देकर (जैसे कांटों पर लेटना या कड़कती ठंड में निर्वस्त्र रहना) सोचते हैं कि उन्होंने त्याग कर दिया। असल में, उन्होंने अपनी ‘नीड’ तो छोड़ दी, लेकिन उनकी ‘ग्रीड’ (जैसे स्वर्ग की चाह या अगले जन्म का लालच) वैसी ही बनी रहती है।
भविष्य की दौड़ और वर्तमान का आनंद
स्वामी जी के अनुसार, जो व्यक्ति भविष्य की कामनाओं में दौड़ता रहता है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। “मजा करने वाला दिन” कभी नहीं आता क्योंकि उससे पहले मौत आ जाती है। यदि आप वास्तव में आनंदित होना चाहते हैं, तो आपको वर्तमान केंद्रित होना होगा। मानसिक वासनाएं वे जंजाल हैं जो कभी पूरे नहीं होते, वे केवल आपकी ऊर्जा और समय बर्बाद करते हैं। एक सच्चा साधक वही है जो विवेकपूर्ण तरीके से अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरा करे और मानसिक पागलपन से खुद को मुक्त रखे।
साधना में निरंतरता: बहानेबाजी या वास्तविकता?
स्वामी जी ने उन लोगों को आईना दिखाया जो कहते हैं कि उनकी साधना की निरंतरता टूट जाती है। आज के तकनीकी युग में ओशो का समस्त साहित्य, संगीत और ध्यान विधियां इंटरनेट पर मुफ्त उपलब्ध हैं। स्वामी जी कहते हैं कि पहले कुआं प्यासे के पास नहीं आता था, लेकिन अब तकनीक के माध्यम से कुआं खुद प्यासे तक पहुंच रहा है। यदि आप फिर भी इंटरनेट पर ओशो का साहित्य पढ़कर साधना नहीं कर पा रहे हैं, तो यह आपकी “बुद्धिहीनता” है। यह स्पष्ट है कि आप साधना करना ही नहीं चाहते।
सजगता ही समाधान है
इच्छाओं का त्याग कैसे करें, इस प्रश्न का सरल उत्तर है—”सजगता”। जैसे ही आप अपने मन के जालों के प्रति सतर्क होते हैं, आप उनसे बाहर आने लगते हैं। अपने जीवन से ‘ग्रीड’ को कम करें और ‘नीड’ का सम्मान करें। साधना को कल पर टालने के बजाय, आज और अभी उपलब्ध संसाधनों का लाभ उठाएं। याद रखें, जो वर्तमान में जीना सीख गया, वही सच्चा आध्यात्मिक है।
Q&A Section
प्रश्न 1: क्या अध्यात्म के लिए सुख-सुविधाओं का त्याग जरूरी है?
उत्तर: नहीं, स्वामी जी के अनुसार शरीर की बुनियादी जरूरतों (नीड) को पूरा करना आपका कर्तव्य है। त्याग केवल मानसिक वासनाओं और अनावश्यक संग्रह (ग्रीड) का होना चाहिए।
प्रश्न 2: ध्यान में मन क्यों भटकता है?
उत्तर: मन भविष्य की कामनाओं और अतीत के जालों में उलझा रहता है। जब तक आप सजग होकर इन जालों को नहीं पहचानेंगे, मन भटकता रहेगा।
प्रश्न 3: क्या उपवास और शरीर को कष्ट देना सही साधना है?
उत्तर: नहीं, स्वामी जी इसे “एबनॉर्मल माइंड” या मानसिक रुग्णता मानते हैं। शरीर को कष्ट देना आध्यात्मिक नहीं, बल्कि हिंसात्मक व्यवहार है।
प्रश्न 4: साधना की निरंतरता कैसे बनाए रखें?
उत्तर: उपलब्ध ऑनलाइन संसाधनों और गुरुओं के मार्गदर्शन का नियमित उपयोग करें। टालमटोल छोड़ना ही निरंतरता की पहली सीढ़ी है।
प्रश्न 5: ओशो के साहित्य का साधना में क्या महत्व है?
उत्तर: ओशो का साहित्य और प्रवचन साधना की गहरी समझ विकसित करने के लिए डिजिटल युग में सबसे सुलभ और प्रभावी उपकरण हैं।
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