जानिए कुंडलिनी जागरण के पांच चरणों के बारे में विस्तार से
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने साधकों को बताया कि मनुष्य के भीतर एक अपार शक्ति सोई हुई होती है — जिसे योग और अध्यात्म की भाषा में कुंडलिनी कहा जाता है। यह शक्ति हमारे मेरुदंड के मूल में, मूलाधार चक्र में, सर्पाकार लिपटी हुई मानी जाती है।
कहा जाता है कि जब यह शक्ति जाग्रत होती है, तो व्यक्ति के भीतर से चेतना ऊपर की ओर प्रवाहित होती है और आत्मबोध का अनुभव कराती है। लेकिन यह यात्रा केवल योग का अभ्यास नहीं — बल्कि एक गहन साधना है, जो धैर्य, संयम और साक्षीभाव मांगती है।
1. कुंडलिनी क्या है और यह कैसे जागती है
कुंडलिनी का अर्थ है लिपटी हुई ऊर्जा — जो सुप्त अवस्था में रहती है। जब व्यक्ति साधना, ध्यान और अनुशासन के द्वारा अपने मन-शरीर को संतुलित करता है, तब यह ऊर्जा धीरे-धीरे ऊपर उठती है और सातों चक्रों को सक्रिय करती है।
यह कोई रहस्यमय या चमत्कारी घटना नहीं, बल्कि ऊर्जा का वैज्ञानिक प्रवाह है। जब हमारे भीतर विचार, भावनाएँ, श्वास और कर्म में संतुलन आता है, तो यही संतुलन कुंडलिनी को ऊपर की ओर खींचता है।
2. क्यों बहुत से लोग कहते हैं — “फायदा नहीं हो रहा”?
बहुत से साधक वर्षों तक ध्यान और योग करते हैं, फिर भी अनुभव नहीं होता। कारण सरल है —
वे ऊर्जा को जगाने की बजाय, उसे रोकने की कोशिश करते हैं।
कुछ प्रमुख कारण:
- साधना में अधीरता — जल्दी परिणाम की चाह
- अनुशासन का अभाव — अनियमित ध्यान या आसन
- भावनात्मक असंतुलन — क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार
- मार्गदर्शक का अभाव — गलत दिशा में ऊर्जा प्रवाहित होना
- निचले केंद्रों में ऊर्जा का अटक जाना
कुंडलिनी केवल तब जागती है जब साधक शांत, सजग और समर्पित हो।
3. कुंडलिनी जागरण के पाँच चरण
| चरण | विधि | उद्देश्य |
| 1. शारीरिक तैयारी | हठ योग, आसन, प्राणायाम | शरीर के ऊर्जा मार्ग (नाड़ियाँ) शुद्ध हों |
| 2. भावनात्मक शुद्धि | भक्ति योग, क्षमा, करुणा | नकारात्मक भावनाएँ समाप्त हों |
| 3. मानसिक एकाग्रता | मंत्र जप, ध्यान | मन केंद्रित और स्थिर बने |
| 4. ऊर्जा जागरण | क्रिया योग, बंध, मुद्रा | कुंडलिनी को ऊपर ले जाना |
| 5. समर्पण और साक्षीभाव | मौन ध्यान, आत्मबोध | ऊर्जा को नियंत्रित नहीं, अनुभव करना |
4. ध्यान और साधना की व्यावहारिक विधियां
(1) आसन और प्राणायाम
कुंडलिनी के मार्ग को खुला रखने के लिए शरीर का स्वस्थ होना ज़रूरी है।
- ताड़ासन और भुजंगासन मेरुदंड को सक्रिय करते हैं।
- अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम ऊर्जा का संतुलन बनाते हैं।
- रोज़ सुबह 20 मिनट का सूर्य नमस्कार शरीर को जीवंत रखता है।
(2) मंत्र जप और मूल मंत्र
मंत्र ध्वनि के माध्यम से ऊर्जा को दिशा देते हैं।
- किसी योग्य गुरु से मिला मंत्र सर्वोत्तम होता है।
- “ॐ”, “हं”, “यं” जैसे बीज मंत्र चक्रों को सक्रिय करते हैं।
- मंत्र का उच्चारण धीरे और अंतर्मन से करें, मात्रा से नहीं भाव से।
(3) ध्यान की विधि
- रीढ़ सीधी रखें, आँखें बंद करें।
- ध्यान सिर के ऊपर की ओर केंद्रित करें।
- श्वास को धीरे-धीरे देखें — जैसे भीतर से एक प्रकाश ऊपर जा रहा हो।
- कुछ मिनट बाद भीतर से कंपन या हल्की गर्माहट का अनुभव हो सकता है।
(4) भक्ति और संगीत साधना
ऊर्जा जब जाग्रत होती है, तो उसका प्रवाह आनंद में होना चाहिए।
- संगीत, नृत्य, गायन — ये ऊर्जा को प्रेम और उल्लास में बदलते हैं।
- “झूमना” या “नाचना” भी ध्यान का हिस्सा हो सकता है।
(5) साक्षीभाव और मौन
अंतिम चरण में कुछ न करें — न विचार, न विरोध। बस देखें।
यहीं से सच्ची शांति प्रारंभ होती है।
5. लाभ — जब कुंडलिनी संतुलित रूप से जागती है
- मानसिक स्पष्टता और निर्णय क्षमता बढ़ती है।
- नकारात्मक भावनाएँ (क्रोध, भय, चिंता) स्वतः मिटती हैं।
- शारीरिक रोगों में सुधार होता है।
- गहन आनंद और प्रेम का अनुभव होता है।
- साधक का दृष्टिकोण करुणामय और सृजनात्मक बनता है।
- चेतना का विस्तार होता है — “अहं ब्रह्मास्मि” की अनुभूति होती है।
6. सावधानियाँ — यदि असंतुलन हो जाए
कुंडलिनी साधना अत्यंत संवेदनशील है। गलत दिशा में की गई ऊर्जा-क्रिया अस्थिरता या भ्रम उत्पन्न कर सकती है।
इसलिए ध्यान रखें:
- कभी भी अधीर न हों — धीरे-धीरे आगे बढ़ें।
- जब मानसिक या शारीरिक असहजता महसूस हो, अभ्यास रोकें।
- किसी योग्य गुरु या योगाचार्य से मार्गदर्शन लें।
- अपने आहार, नींद और दिनचर्या को संतुलित रखें।
- ध्यान के बाद थोड़ी देर चलना, धरती को छूना (ग्राउंडिंग) ज़रूरी है।
7. प्रतीकात्मक कहानी का अर्थ
सूफी फकीर और युवक की कहानी कुंडलिनी साधना की गहराई को प्रतीकात्मक रूप में बताती है।
जब फकीर ने कहा — “चुप रहना सीखो”, उसका अर्थ था — अंतर का मौन।
जब तक भीतर शोर है, विचार हैं, तर्क है, ऊर्जा स्थिर नहीं होगी।
और “छिद्रयुक्त घड़ा” का अर्थ है — ऐसा मन जो अपनी शक्ति को संभाल नहीं पाता।
यही कारण है कि साधक को पहले पूर्ण मौन और ध्यानशीलता सीखनी चाहिए, तभी ऊर्जा का संचय और उत्थान संभव है।
निष्कर्ष
कुंडलिनी जागरण कोई रहस्यमय जादू नहीं — यह जीवन की परम चेतना से जुड़ने की यात्रा है।
जो इसे सही भाव, संयम और समर्पण से करता है, वह अपने भीतर ईश्वरीय शक्ति का अनुभव करता है।
यह साधना हमें सिखाती है —
ऊर्जा को रोकना नहीं, उसे प्रेम और जागरूकता में बहने देना ही सच्चा ध्यान है।
8. कुंडलिनी जागरण से जुड़ी सामान्य जिज्ञासाएँ (Q&A)
Q1. क्या हर व्यक्ति कुंडलिनी जागरण कर सकता है?
हाँ, लेकिन इसके लिए अनुशासन, शुद्ध आहार, नियमित साधना और मानसिक तैयारी ज़रूरी है।
Q2. इसमें कितना समय लगता है?
यह पूरी तरह व्यक्ति की तैयारी पर निर्भर है — कुछ को महीनों में, तो कुछ को वर्षों में अनुभव होता है।
Q3. क्या इसके दुष्प्रभाव भी होते हैं?
अगर इसे जल्दबाज़ी या गलत तरीके से किया जाए, तो मानसिक असंतुलन, अत्यधिक ऊर्जा या बेचैनी जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
Q4. कुंडलिनी जागरण के बाद क्या होता है?
साधक का अनुभव पूरी तरह बदल जाता है। उसे भीतर एक प्रकाश, शांति और साक्षीभाव का अनुभव होता है।
Q5. क्या बिना गुरु के यह संभव है?
प्रारंभिक अभ्यास संभव हैं, लेकिन पूर्ण जागरण के लिए अनुभवी गुरु या शिक्षक का साथ आवश्यक है।
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