पढ़िए भारत में ब्रिटिश अधिकारी कैसे मनाते थे नए साल का जश्न
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
क्या आपने कभी सोचा है कि आज से करीब 184 साल पहले, जब भारत पर अंग्रेजों का राज था, तब नए साल का जश्न कैसे मनाया जाता था? सोशल मीडिया और क्लब पार्टियों के इस दौर में, ब्रिटिश भारत में न्यू ईयर का अंदाज बेहद शाही और थोड़ा अजीब भी था। एमिली ईडन, जो उस समय के गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैंड की बहन थीं, उनकी डायरी के पन्नों से सच्चाई सामने आई है। यह डायरी केवल तारीखों का हिसाब नहीं है, बल्कि यह उन ब्रिटिश मेमसाहिबों के अकेलेपन, उनकी भव्य पार्टियों और अजनबी देश में घर की यादों का एक इमोशनल दस्तावेज है।
हाल ही में इतिहासकार इप्सिता नाथ की रिसर्च में एमिली ईडन की डायरी के उन हिस्सों को हाईलाइट किया गया है, जो बताते हैं कि 1841 के आस-पास न्यू ईयर ईव का मतलब केवल शराब और नाच-गाना नहीं था। उस समय की मेमसाहिबें गंगा के किनारे टेंटों में रहकर केक बेक करती थीं और लखनऊ के नवाबों के साथ ‘अरेबियन नाइट्स’ जैसी शामें गुजारती थीं। यह लेख आपको इतिहास के उस गलियारे में ले जाएगा जहाँ साड़ियों की जगह गाउन थे और देसी शराब की जगह ‘पंच ए ला रोमेन’ का बोलबाला था।
Emily Eden और ब्रिटिश मेमसाहिबों का शाही लाइफस्टाइल
ब्रिटिश राज के दौरान भारत में रहने वाली अंग्रेज महिलाओं यानी ‘मेमसाहिबों’ के लिए नया साल केवल कैलेंडर बदलना नहीं था। एमिली ईडन की डायरी के अनुसार, यह समय अक्सर लंबी यात्राओं का होता था। चूंकि अंग्रेज अफसर एक शहर से दूसरे शहर दौरों पर रहते थे, इसलिए कई बार नए साल का जश्न सड़कों के किनारे लगे तंबू (tents) में मनाया जाता था।
दिलचस्प बात यह है कि ये महिलाएं भारत की चिलचिलाती गर्मी और धूल के बीच भी अपनी ब्रिटिश परंपराओं को नहीं भूलती थीं। वे घर की याद में गुलाब और केले के पत्तों से घर सजाती थीं क्योंकि उन्हें इंग्लैंड के ‘होली और मिसल्टो’ (Holly and Mistletoe) नहीं मिलते थे। एमिली ईडन ने लिखा है कि कैसे वे लोग सड़क किनारे ईंटों के अस्थायी ओवन बनाकर ‘प्लम केक’ बेक किया करती थीं।
कानपुर से लखनऊ तक: नवाबों की दावत और हीरे-जवाहरात
एमिली ईडन की डायरी में 1837 के न्यू ईयर का एक शानदार जिक्र मिलता है जब वे कानपुर में थीं। वहां लखनऊ के नवाब ने उन्हें नाश्ते पर बुलाया। यह कोई मामूली ब्रेकफास्ट नहीं था। मेमसाहिबों को हीरे से जड़े कंघे और पन्ने के झुमके तोहफे में दिए गए। एमिली ने अपनी डायरी में इसे ‘अरेबियन नाइट्स’ जैसा अनुभव बताया है।
लखनऊ के इमामबाड़े और रूमी दरवाजे की खूबसूरती ने उन्हें हैरान कर दिया था। 31 दिसंबर की शाम को नदी के किनारे आतिशबाजी (Fireworks) हुई और नावों पर नर्तकियां परफॉर्म कर रही थीं। ब्रिटिश भारत में न्यू ईयर का यह रूप दिखाता है कि कैसे अंग्रेज शासक और भारतीय नवाब मिलकर जश्न मनाते थे।
शाही बॉल्स और 800 मेहमानों की बड़ी पार्टी
जैसे-जैसे ब्रिटिश सत्ता मजबूत हुई, जश्न का पैमाना बढ़ता गया। 1822 के आसपास, वायसराय की पत्नी एलिस रीडिंग ने एक ‘State Ball’ का आयोजन किया था जिसमें 800 मेहमान शामिल हुए थे। आज के दौर में जहां कोविड या अन्य पाबंदियों की बात होती है, उस दौर में इतनी बड़ी भीड़ का जुटना अपने आप में एक ‘Major Update’ था। एमिली की डायरी बताती है कि ऊंचे ओहदे वाली मेमसाहिबों पर सोशल दिखने का काफी दबाव रहता था।
डायरी का भावुक पहलू: 1841 का वो आखिरी पत्र
एमिली ईडन की डायरी का सबसे इमोशनल हिस्सा 31 दिसंबर 1841 का है। कलकत्ता में बैठी एमिली ने लिखा था कि वह भारत में अपना आखिरी साल बिता रही हैं। उनके शब्दों में एक अजीब सा डर और बदलाव (Sense of dread) महसूस किया जा सकता है। उन्होंने लिखा कि भारत के प्रवास ने उन्हें ‘सुस्त और असहाय’ बना दिया है। वह वापस इंग्लैंड जाकर अपने अपनों के बीच ‘सामान्य’ होना चाहती थीं। यह अहसास आज के उन युवाओं जैसा ही है जो लंबे समय तक घर से दूर रहकर एक अनजानी बेचैनी महसूस करते हैं।
इतिहास का आधुनिक भारत से कनेक्शन
इप्सिता नाथ की किताब ‘Memsahibs’ यह साफ करती है कि इन महिलाओं का जीवन केवल विलासिता नहीं था। वे एक ऐसे देश में थीं जिसे वे पूरी तरह समझ नहीं पाती थीं। ब्रिटिश भारत में न्यू ईयर का जश्न उनके लिए अपनी पहचान को बचाए रखने का एक जरिया था। आज जब हम न्यू ईयर सेलिब्रेट करते हैं, तो हमें उस दौर की इन यादों में संघर्ष और सांस्कृतिक मिलन का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है।
अंत में, एमिली ईडन की डायरी से हमें पता चलता है कि वक्त चाहे 1841 का हो या 2026 का, नए साल की उम्मीदें और डर हमेशा एक जैसे रहते हैं। ब्रिटिश भारत में न्यू ईयर का वह दौर आज के आधुनिक भारत की नींव का एक हिस्सा है। एमिली के शब्द—”आने वाला साल बड़े बदलाव लाएगा”—आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। यह केवल इतिहास नहीं, बल्कि इंसानी जज्बातों की एक ऐसी कहानी है जो हमें बीते हुए कल से जोड़ती है और भविष्य के लिए तैयार करती है।
Q&A Section
Q-एमिली ईडन कौन थीं और उनकी डायरी क्यों महत्वपूर्ण है?
A-एमिली ईडन भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैंड की बहन थीं। उनकी डायरी ब्रिटिश राज के सामाजिक जीवन और मेमसाहिबों के अनुभवों का सबसे सटीक ऐतिहासिक स्रोत मानी जाती है।
Q- ब्रिटिश भारत में मेमसाहिबें नया साल कैसे मनाती थीं?
A-वे भव्य पार्टियों (Balls), नवाबों द्वारा दिए गए शाही भोज और सड़कों के किनारे टेंटों में केक बेक करके नया साल मनाती थीं।
Q- क्या ब्रिटिश काल में भारतीय नवाब भी इन पार्टियों में शामिल होते थे?
A-हाँ, विशेष रूप से लखनऊ और कानपुर जैसे क्षेत्रों में नवाब अंग्रेज अफसरों को महंगे तोहफे देते थे और उनके सम्मान में आतिशबाजी और नाच-गाने का आयोजन करते थे।
Q-एमिली ईडन ने 1841 के अपने आखिरी लेख में क्या लिखा था?
A-उन्होंने भारत छोड़ने की खुशी और साथ ही एक अनजाना डर व्यक्त किया था कि भारत में रहने के कारण उनके व्यक्तित्व में जो बदलाव आए हैं, क्या वे इंग्लैंड जाकर फिर से ‘सामान्य’ हो पाएंगी।
Q- उस समय क्रिसमस और न्यू ईयर की सजावट कैसे की जाती थी?
A-चूंकि भारत में पारंपरिक यूरोपीय पौधे नहीं मिलते थे, इसलिए मेमसाहिबें केले के पेड़ों और गुलाब के फूलों से अपने घरों और टेंटों को सजाती थीं।
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