पढ़िए दिल्ली के अनसुने इतिहास की कहानी
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
दिल्ली की राजनीति का इतिहास केवल सत्ता के बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक शहर के पुनर्जन्म की दास्तां है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने दिल्ली पर जो कहर बरपाया, उसने यहाँ की जनता के आत्मविश्वास को पूरी तरह कुचल दिया था। लगभग 50 सालों तक दिल्ली एक ऐसे सन्नाटे में रही, जहाँ लोग अपनी वाजिब शिकायतों के लिए भी जुबान खोलने से कतराते थे। इतिहासकारों ने इस दौर को ‘मानसिक लकवा’ कहा है। लेकिन 1905 के बंगाल विभाजन और शिक्षा के प्रसार ने दिल्ली के युवाओं में एक नया खमीर पैदा किया। आज जब हम दिल्ली को देश की राजनीतिक धड़कन कहते हैं, तो हमें उन गुमनाम नायकों और ओजस्वी वक्ताओं को नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने अंग्रेजों की आँखों में आँखें डालकर “झूठों का बादशाह” कहने की हिम्मत दिखाई थी। यह रिपोर्ट उस दौर की है जब दिल्ली ने अपनी खामोशी तोड़कर क्रांति का दामन थामा।
गदर का साया और खामोश दिल्ली (1857-1905)
1857 के बाद दिल्ली की गलियों में सन्नाटा पसर गया था। एक बड़ी संख्या में दिल्ली वाले शहर छोड़कर जा चुके थे। जो बचे थे, वे सहमे हुए थे। 1905 तक दिल्ली की हालत यह थी कि यहाँ की सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं भी केवल हुकूमत की चापलूसी करने और उनके कसीदे पढ़ने तक सीमित थीं। कोई भी राजनीतिक हलचल दिल्ली से नहीं उठ रही थी। हालाँकि, इसी दौरान शिक्षा के कुछ केंद्र विकसित हुए और शिक्षित युवाओं का एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ जो पश्चिम के लोकतांत्रिक विचारों से प्रभावित होने लगा था।
लार्ड कर्जन की बदजुबानी और डॉ. नजीर अहमद का पलटवार
1905 में लार्ड कर्जन ने भारतीयों को अपमानित करते हुए कहा कि “हिंदुस्तानी झूठ बोलने में जरा भी संकोच नहीं करते।” इस अपमान ने दिल्ली के शिक्षित वर्ग को भीतर तक झकझोर दिया। कुछ समय बाद सेंट स्टीफंस कॉलेज में एक सभा हुई, जहाँ लार्ड लेफरायल कर्जन की सफाई पेश कर रहे थे। तभी दिल्ली के मशहूर वक्ता डॉ. नजीर अहमद खड़े हुए। 60 वर्ष से अधिक की आयु होने के बावजूद उनकी आवाज में जो कड़क थी, उसने ब्रिटिश अधिकारियों को हिला दिया। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा—”राजा और प्रजा में बस इतना ही फर्क है कि राजा की हर बुराई भी अच्छी दिखती है। अच्छा, हम झूठे ही सही, पर लाट साहब, हम तो सिर्फ झूठे हैं, आप तो ‘झूठों के बादशाह’ हैं।” इस एक वाक्य ने दिल्ली के युवाओं में वह आग लगा दी जो आगे चलकर एक विशाल मशाल बनी।
सैयद हैदर रजा: दिल्ली की राजनीति का नया चेहरा
दिल्ली की जनता एक ऐसे नेतृत्व की तलाश में थी जो बिना डरे उनके जज्बात बयां कर सके। यह कमी सेंट स्टीफंस कॉलेज के एम.ए. के छात्र सैयद हैदर रजा ने पूरी की। उन्होंने लाला शंकरनाथ, लाला अमीरचन्द और लाला किशनदयाल जैसे साथियों के साथ मिलकर दिल्ली में राजनीतिक चेतना का नया अध्याय शुरू किया। रजा की भाषा शैली इतनी जादुई थी कि लोग उनके भाषण सुनने के लिए मीलों पैदल चलकर आते थे। 1907 में उन्होंने ‘आफ़ताब’ नाम का साप्ताहिक पत्र निकाला। यह अखबार इतना लोकप्रिय हुआ कि सीआईडी की कड़ी निगरानी के बावजूद लोग इसे हाथों-हाथ खरीदते थे।
क्रांतिकारी गतिविधियाँ और लार्ड हार्डिंग बम केस
1912 में दिल्ली फिर से भारत की राजधानी बनी। इसी दौरान क्रांतिकारी गतिविधियाँ भी तेज हुईं। लाला हरदयाल, जो ऑक्सफोर्ड की स्कॉलरशिप छोड़कर स्वदेश लौटे थे, युवाओं के प्रेरणास्रोत बने। 1912 के अंत में जब लार्ड हार्डिंग का जुलूस चांदनी चौक से गुजर रहा था, तो उन पर बम फेंका गया। इस केस ने दिल्ली की राजनीति में भूचाल ला दिया। लाला अमीरचन्द और लाला अवधविहारी को फांसी हुई। हालाँकि यह कांग्रेस का आंदोलन नहीं था, लेकिन इसने यह साबित कर दिया कि दिल्ली अब अंग्रेजों के लिए सुरक्षित नहीं रही।
होमरूल लीग और ‘हेलीईज्म‘ का दमन
1916 में एनी बेसेंट की होमरूल लीग की शाखा दिल्ली में खुली। चीफ कमिश्नर मिस्टर हेली (जिन्हें बाद में सर मैलकम हेली कहा गया) ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। दमन इतना बढ़ा कि बम्बई क्रॉनिकल ने इसे ‘हेलीईज्म’ का नाम दिया। मिस माइनर, जो इन्द्रप्रस्थ गर्ल्स स्कूल की हेड मिस्ट्रेस थीं, ने सरकारी सहायता की धमकी मिलने के बावजूद होमरूल लीग का साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा, “चाहे स्कूल बंद हो जाए, पर मैं सिद्धांतों से पीछे नहीं हटूंगी।” यह दिल्ली के चरित्र में आया वह बदलाव था जिसने आजादी की नींव रखी।
1918 का दिल्ली कांग्रेस अधिवेशन उस लंबी लड़ाई का परिणाम था जो 1905 में शुरू हुई थी। दिल्ली की राजनीति अब चापलूसी से निकलकर प्रतिरोध के रास्ते पर आ चुकी थी। लाला शंकरलाल, आसफ अली और पंडित नेकीराम शर्मा जैसे नेताओं ने जेल जाकर यह सुनिश्चित किया कि दिल्ली की आवाज कभी दबे नहीं। आज की युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि दिल्ली की आजादी की कीमत उन हजारों लोगों ने चुकाई है जिन्होंने सीआईडी की नजरों और सरकारी लाठियों के बीच ‘स्वराज’ का सपना देखा था।
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