आज भी दिल्ली में हर्षोल्लास से मनाया जाता है होली का पर्व
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
Delhi Holi History: क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि देश का सबसे शक्तिशाली पता, यानी राष्ट्रपति भवन, कभी भोजपुरी के फाग और ढोलक की थाप से गूंजता था? आज जब हम डिजिटल होली और लाउड म्यूजिक के दौर में हैं, तब दिल्ली की होली का इतिहास हमें एक ऐसे दौर में ले जाता है जहाँ राजनीति, साहित्य और लोक-संस्कृति का अद्भुत मिलन होता था। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं था, बल्कि यह मौका था जब सत्ता के गलियारे आम आदमी के अपनत्व से सराबोर हो जाते थे।
हालिया सांस्कृतिक शोध और पुरानी यादों के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ही राष्ट्रपति भवन में सामूहिक होली मनाने की उस शानदार परंपरा की नींव रखी थी। उस समय दिल्ली के वैभव के बीच ग्रामीण भारत की महक घुल जाती थी। चलिए, दिल्ली की होली के उन अनकहे पन्नों को पलटते हैं जो आज भी हमें अपनी जड़ों की याद दिलाते हैं।
राष्ट्रपति भवन में जब ‘देहात‘ उतर आता था
हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार जगदीशचंद्र माथुर ने अपनी पुस्तक “जिन्होंने जीना जाना” में एक भावुक चित्रण किया है। वे लिखते हैं कि राष्ट्रपति भवन के औपचारिक माहौल में डॉ. राजेंद्र प्रसाद होली के दिन बिल्कुल बदल जाते थे। वे राष्ट्रपति नहीं, बल्कि एक साधारण ग्रामीण भारतीय बन जाते थे।
माथुर साहब के अनुसार, मुगल गार्डन में जहाँ कूटनीतिक बातें होती थीं, वहां होली पर भोजपुरी लोक-संगीत की महफिल सजती थी। राजेंद्र बाबू को भोजपुरी फाग पर झूमते देखना एक अलौकिक अनुभव था। उस समय राष्ट्रपति भवन की ऊंची दीवारें और दिल्ली का राजसी ठाट-बाट मानो गायब हो जाता था। ऐसा लगता था जैसे सुदूर गांव की कोई मस्त हवा वहां बह रही हो। सेनाध्यक्ष से लेकर अदने कर्मचारी तक, सब एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर इस उत्सव का हिस्सा बनते थे।
नेहरू का आवास और साहित्यकारों का जमावड़ा
दिल्ली की होली का इतिहास केवल राष्ट्रपति भवन तक सीमित नहीं था। प्रधानमंत्री निवास (Teen Murti Bhavan) भी उन दिनों सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। मशहूर रंगकर्मी जे.एन. कौशल अपनी किताब “दर्द आया दबे पांव” में जिक्र करते हैं कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के आवास पर होली और उनके जन्मदिन पर खास रौनक रहती थी।
वहां पंचानन पाठक जैसे कलाकार जुटते थे, जो नेहरू के बाल सखा भी थे। प्रधानमंत्री आवास पर होने वाली वह होली केवल रंग खेलने का माध्यम नहीं थी, बल्कि वह देश के बौद्धिक और सांस्कृतिक नेतृत्व के मेल-मिलाप का मंच थी।
खुशवंत सिंह और उनकी ‘लव स्टोरी‘ वाली होली
मशहूर लेखक खुशवंत सिंह की दिल्ली वाली होली तो और भी दिलचस्प है। उन्होंने अपनी किताब में साझा किया कि उन्होंने पहली बार होली दिल्ली के ‘मॉडर्न स्कूल’ में मनाई थी। उस दौर में स्कूल के संस्थापक लाला रघुवीर सिंह के घर पर जम कर रंग खेला जाता था।
मजेदार बात यह है कि खुशवंत सिंह ने जिस पहली लड़की के साथ होली खेली थी, वह कवल थीं, जो बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं। खुशवंत सिंह उस दौर की दिल्ली के मौसम का जिक्र करते हुए कहते हैं कि होली के समय दिल्ली सबसे खूबसूरत होती है। पलाश (टेसू) के फूल अपने पूरे शबाब पर होते हैं और परिंदे अपने घोंसले बनाने में मगन रहते हैं। आज की कंक्रीट की दिल्ली में वह पलाश का रंग शायद ही कहीं दिखता हो।
बच्चन की ‘मधुशाला‘ और दिल्ली की फाग
दिल्ली की होली की बात हो और हरिवंश राय बच्चन का जिक्र न हो, यह अधूरा है। अपनी आत्मकथा के खंड “दशद्वार से सोपान तक” में बच्चन जी ने दिल्ली के एक मार्मिक प्रसंग का उल्लेख किया है। जब उनके बेटे अमिताभ बच्चन (अमित) घायल होने के बाद दिल्ली आए थे, तब 1983 के आसपास बच्चन जी ने अपनी पत्नी तेजी बच्चन के मनोरंजन के लिए बुंदेलखंडी कवि ईसुरी की शैली में ‘फाग’ लिखी थी। उनके शब्दों में अपनों के दूर होने का दर्द और होली का उल्लास दोनों समाहित थे।
बदलती दिल्ली: खोता हुआ सामूहिकता का रंग
70 और 80 के दशक के बाद दिल्ली की होली का स्वरूप बदलने लगा। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह के पत्रों में दिल्ली की होली में शामिल होने की एक तड़प दिखती है, तो वहीं सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 70 के दशक की होली पर तंज कसते हुए लिखते हैं कि “राजधानी में अब रंग कम और पानी ज्यादा बढ़ गया है।” उनका इशारा मनोरंजन के ‘लोकरंजन’ से कटने की ओर था।
समाजशास्त्री पूरनचंद जोशी और लेखक मनोहर श्याम जोशी ने भी इस बदलाव को महसूस किया। मनोहर श्याम जोशी बताते हैं कि जब तक कुमाऊंनी बिरादरी गोल मार्केट और सरोजिनी नगर के सरकारी क्वार्टरों तक सीमित थी, तब तक पहाड़ी होली की परंपरा जीवंत थी। जैसे-जैसे दिल्ली बढ़ी, वह सामुदायिक अपनत्व कहीं खो गया।
आज की दिल्ली की होली का इतिहास हमें सिखाता है कि त्योहार केवल छुट्टी मनाने का जरिया नहीं हैं, बल्कि ये अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर हैं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद की वह सादगी और नेहरू के निवास का वो सांस्कृतिक परिवेश आज की भागदौड़ भरी दिल्ली में एक सुखद याद जैसा है। हमें फिर से उस ‘पलाश’ वाले रंग और ‘अपनत्व’ वाली होली की जरूरत है, जहाँ दीवारें गिर जाएं और केवल इंसानियत का रंग बचे।
Q&A Section
प्रश्न: राष्ट्रपति भवन में सामूहिक होली मनाने की शुरुआत किसने की थी?
उत्तर: भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में सामूहिक रूप से होली मनाने की परंपरा शुरू की थी।
प्रश्न: लेखक खुशवंत सिंह ने पहली बार होली कहाँ मनाई थी?
उत्तर: उन्होंने दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में पहली बार होली मनाई थी, जहाँ उनकी मुलाकात उनकी भावी पत्नी कवल से हुई थी।
प्रश्न: होली के त्योहार में ‘पलाश‘ के फूलों का क्या महत्व है?
उत्तर: पलाश (टेसू) के फूलों का उपयोग पारंपरिक रूप से प्राकृतिक रंग बनाने के लिए किया जाता है। दिल्ली में होली के मौसम में यह पेड़ अपने पूरे यौवन पर होता है।
प्रश्न: हरिवंश राय बच्चन ने दिल्ली में होली पर किसके लिए ‘फाग‘ लिखी थी?
उत्तर: उन्होंने अपनी पत्नी तेजी बच्चन के मनोरंजन के लिए और घायल बेटे अमिताभ बच्चन के संदर्भ में एक विशेष फाग लिखी थी।
प्रश्न: दिल्ली की ‘कुमाऊंनी होली‘ किन इलाकों में प्रसिद्ध थी?
उत्तर: 80 के दशक तक दिल्ली के गोल मार्केट और सरोजिनी नगर जैसे सरकारी आवासों वाले इलाकों में पारंपरिक कुमाऊंनी होली बहुत प्रसिद्ध थी।
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