सल्तनत काल में जायसी के खेतों में उड़ता था गुलाल
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
क्या आप जानते हैं कि जिस होली को आज हम रंगों का त्योहार कहते हैं, उसका जलवा सदियों पहले मुगल सम्राटों (Mughal holi) के दरबार में भी उतना ही जबरदस्त था? Mughal Holi History Facts की पड़ताल करें तो पता चलता है कि यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारत की ‘साझा विरासत’ का सबसे बड़ा सबूत रहा है। हालिया ऐतिहासिक शोध और पुराने दस्तावेजों से यह साफ हुआ है कि दिल्ली की सड़कों पर उड़ने वाला गुलाल कभी मजहब की दीवारें नहीं पहचानता था।
अमीर खुसरो की रूहानी कविताओं से लेकर अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की ‘होरियों’ तक, इस त्योहार ने हर दौर में खुद को नए रंग में ढाला है। जहाँ एक तरफ औरंगजेब ने दरबार में पाबंदियां लगाईं, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली की आम जनता और यहाँ तक कि शाही परिवार के रसूखदार लोग भी छिप-छिपकर या खुलेआम होली के हुड़दंग में शामिल होते थे। आइए जानते हैं उस दौर की अनसुनी कहानियाँ, जो आज के युवाओं के लिए इतिहास के प्रति नजरिया बदल देंगी।
सल्तनत काल: जब जायसी के खेतों में उड़ता था गुलाल
इतिहासकार बताते हैं कि मशहूर यात्री अल बेरुनी ने अपनी किताब ‘किताब-अल-हिन्द’ में भारत की होली का जो वर्णन किया है, वह आज भी प्रासंगिक है। Mughal Holi में एक दिलचस्प मोड़ तब आता है जब हम मलिक मोहम्मद जायसी को पढ़ते हैं। उनके अनुसार, खिलजी के दौर में गांवों में इतनी होली खेली जाती थी कि गुलाल की वजह से लहलहाते खेत भी लाल नजर आते थे।
अमीर खुसरो ने तो इसे सूफियाना रंग दे दिया था। उन्होंने निजामुद्दीन औलिया के प्रति अपने प्रेम को होली के जरिए व्यक्त करते हुए लिखा था—
“दैय्या रे मोहे भिजोया री
शाह निजाम के रंग में…”।
कपड़े रंग के कुछ न होत है,
या रंग में तन को डुबोया री।
यह दिखाता है कि भारत का लोकपक्ष हमेशा से ही उत्सवधर्मी रहा है।
मुगलिया शान: ‘ईद-ए-गुलाबी‘ और यमुना किनारे के मेले
मुगल बादशाहों ने होली को एक नया नाम और नया अंदाज दिया। जहाँगीर के समय इसे ‘आब-ए-पश्म‘ कहा जाता था, तो वहीं शाहजहाँ के दौर में इसे ‘ईद-ए-गुलाबी‘ या ‘आब-ए-पाशी‘ (रंगों की बौछार) के नाम से जाना जाने लगा। जब राजधानी आगरा से शाहजहाँनाबाद (पुरानी दिल्ली) आई, तो होली का केंद्र लाल किला और उसके पीछे बहने वाली यमुना बन गई।
लाल किले के पीछे यमुना किनारे लगे आम के बागों में होली के बड़े मेले लगते थे। खुदाबक्श लाइब्रेरी में रखे चित्र इस बात के गवाह हैं कि उस दौर में हिंदू-मुस्लिम अमीर एक-दूसरे पर महकता हुआ गुलाबजल छिड़कते थे। यह आज के ‘पूल पार्टी’ वाले कल्चर से कहीं ज्यादा रॉयल और ग्रेसफुल था।
औरंगजेब की पाबंदी और शायरों का विद्रोह
अक्सर कहा जाता है कि औरंगजेब ने होली पर रोक लगा दी थी। यह सच है कि दरबारी आयोजनों पर रोक थी, लेकिन दिल्ली की गलियों में सतरंगी फुहारें कम नहीं हुईं। औरंगजेब के समकालीन शायर फायज देहलवी ने उस समय का हाल लिखा है:
ले अबीर और अरगजा भरकर रुमाल,
छिड़कते हैं और उड़ाते हैं गुलाल,
ज्यूं झड़ी हर सू है पिचकारी की धार,
दौड़ती हैं नारियाँ बिजली की सार।
इतना ही नहीं, औरंगजेब के मामा शाइस्ता खां का खुद होली खेलते हुए चित्र मौजूद है। इससे पता चलता है कि होली का जादू उस समय के ‘पावरफुल’ लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। मीर तकी मीर जैसे शायरों ने भी होली को शादियों (खुशियों) का प्रतीक बताया है।
आओ साकी,
शराब नोश करें शोर-सा है,
जहाँ में गोश करें,
आओ साकी बहार फिर आई,
होली में कितनी शादियाँ लाई।
बहादुरशाह जफर: वो बादशाह जो खुद ‘होरी‘ लिखता था
Mughal Holi का सबसे भावुक हिस्सा अंतिम बादशाह बहादुरशाह जफर से जुड़ा है। जफर केवल बादशाह नहीं, एक बेहतरीन शायर भी थे। वे अपनी प्रजा के साथ इस कदर घुलमिल जाते थे कि खुद ‘होरियां’ लिखते और गाते थे। उनकी एक प्रसिद्ध रचना आज भी याद की जाती है:
क्यों मों पे मारी रंग की पिचकारी,
देखो कुंवरजी दूँगी गारी,
भाज सकूँ मैं कैसे मोसों भाजा नहीं जात,
ठारे अब देखूँ मैं कौन जू दिन रात,
शोख रंग ऐसी ढीठ लंगर से कौन खेले होरी,
मुख बंदे और हाथ मरोरे करके वह बरजोरी।
‘सिराज-उल-अखबार’ के अनुसार, होली के दिन लाल किले के झरोखों से बादशाह खुद झांकते थे और नीचे से गुजरने वाली स्वांग मंडलियों (झांकियों) को इनाम देते थे। तख्त उठाने वाले कहारों तक को इस दिन अशर्फियां बांटी जाती थीं।
उपरोक्त तमाम Mughal Holi Facts यह साबित करते हैं कि भारत की मिट्टी में उत्सव का रंग बहुत गहरा है। 18वीं सदी तक भारत के लगभग सभी वर्ग, चाहे वे किसी भी मजहब के हों, होली को अपना त्योहार मान चुके थे। मिर्जा मोहम्मद हसन खत्री की ‘हफ्त तमाशा’ जैसी किताबें इसकी पुष्टि करती हैं। हालांकि, वक्त के साथ सत्ता बदली और दूरियां बढ़ीं, लेकिन यह ऐतिहासिक विरासत आज भी हमें याद दिलाती है कि हमारी जड़ें साझा संस्कृति में हैं। आज जब हम डिजिटल युग में होली मनाते हैं, तो हमें लाल किले की उन गलियों और खुसरो के उन दोहों को नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने इस त्योहार को ‘अमर’ बना दिया।
Q&A
Q1. मुगलों के समय होली को क्या कहा जाता था?
Ans: मुगलों के समय होली को ‘ईद-ए-गुलाबी’ या ‘आब-ए-पाशी’ कहा जाता था।
Q2. क्या औरंगजेब के समय होली बंद हो गई थी?
Ans: दरबार में औपचारिक आयोजनों पर रोक थी, लेकिन दिल्ली की आम जनता और शाइस्ता खां जैसे रसूखदार लोग होली मनाते रहे थे।
Q3. बहादुरशाह जफर होली कैसे मनाते थे?
Ans: वे खुद ‘होरियां’ लिखते थे, हिंदू-मुस्लिम अमीरों के साथ झरोखे में बैठते थे और कलाकारों को इनाम देते थे।
Q4. अमीर खुसरो का होली से क्या संबंध है?
Ans: खुसरो ने होली को सूफियाना अंदाज में पेश किया और अपने गुरु निजामुद्दीन औलिया के रंग में रंगने की बात कही।
Q5. ‘हफ्त तमाशा‘ पुस्तक किस बारे में है?
Ans: यह मिर्जा मोहम्मद हसन खत्री द्वारा लिखित पुस्तक है, जो बताती है कि 18वीं सदी में लगभग सभी भारतीय मुस्लिम होली खेलते थे।
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