Premanand-Ji-Maharaj
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वृंदावन वाले महाराज जी का बड़ा खुलासा: विवाद नहीं, यह तो विज्ञान है!

दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।

सुप्रसिद्ध संत स्वामी प्रेमानंद जी महाराज (Premanand Ji Maharaj), जिनके दर्शन के लिए आज देश-दुनिया से युवा खिंचे चले आते हैं, उन्होंने रामचरितमानस की एक ऐसी चौपाई की गुत्थी सुलझाई है जो सदियों से विवादों में रही है। “ढोल गवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी”—इस दोहे को लेकर अक्सर लोग गोस्वामी तुलसीदास जी पर सवाल उठाते हैं। लेकिन महाराज जी ने अपने तीखे और तार्किक अंदाज में स्पष्ट कर दिया है कि यह अपमान नहीं, बल्कि जीवन जीने का गहरा सूत्र है।

महाराज जी कहते हैं कि शब्दों के अर्थ पकड़ने के लिए हृदय में शुद्धता होनी चाहिए। उन्होंने उदाहरण दिया कि जैसे ‘कनक’ का अर्थ सोना भी है और धतूरा भी, वैसे ही ‘ताड़ना’ का अर्थ हर पात्र के लिए अलग है। अगर आप इसे सिर्फ ‘पिटाई’ समझ रहे हैं, तो यह आपकी बुद्धि का दोष है, तुलसीदास जी का नहीं।

महाराज जी की व्याख्या: ताड़नाका अर्थ मारना क्यों नहीं है?

प्रेमानंद महाराज जी के अनुसार, गोस्वामी जी ने बहुत सूक्ष्मता से वर्णन किया है। उन्होंने बताया कि ‘ताड़ना’ का अर्थ पिटाई करना कहना गलत है।

1. ढोल: संगीत का अनुशासन

महाराज जी कहते हैं कि ढोल को हाथ जोड़कर कहो कि “साहब आप बज जाइए”, तो वह नहीं बजेगा। उसे ‘थपाक’ चाहिए, लेकिन वह भी शास्त्र और संगीत के सिद्धांत के अनुसार। ढोल को ताड़ने का अर्थ है उसे सुर में रखना ताकि वह राग प्रकट कर सके।

2. गवार: जिम्मेदारी और दृष्टि

महाराज जी के अनुसार, यदि आप किसी विवेकहीन (गवार) व्यक्ति को कोई कार्य सौंपते हैं और उस पर दृष्टि (ताड़ना) नहीं रखते, तो वह कार्य नष्ट हो जाएगा। यहाँ ताड़ना का अर्थ उसे पीटना नहीं, बल्कि उस पर कड़ी निगरानी रखना है।

3. शूद्र: शास्त्र का शासन

शूद्र का अर्थ महाराज जी ने उसे बताया है जिसका प्रादुर्भाव भगवान के श्रीचरणों से हुआ है। यहाँ ‘ताड़ना’ का तात्पर्य है—शास्त्र के शासन को स्वीकार करना और सदाचार का पालन करना।

स्त्री तो साक्षात् शक्ति है, उसका अपमान सर्वनाश है”

इस व्याख्या में महाराज जी ने नारी शक्ति पर विशेष जोर दिया है। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देते हुए कहा कि जो नारी अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दे, उसे कोई ‘पीटने’ की बात कैसे कर सकता है?

महाराज जी कहते हैं, स्त्री एक रत्न है।” जैसे हम कीमती रत्न को खुला नहीं छोड़ते क्योंकि उस पर हमला हो सकता है, वैसे ही नारी पर ‘ताड़ना’ यानी सुरक्षात्मक दृष्टि रखने की जरूरत है। पिता, भाई, पति और फिर पुत्र के संरक्षण में नारी को रखने का अर्थ उसे दबाना नहीं, बल्कि उसकी मर्यादा और पवित्रता को सुरक्षित रखना है ताकि कोई कुमार्गगामी उस पर हमला न कर सके।

महाराज जी ने कड़ी चेतावनी भी दी—”जहाँ स्त्री का अपमान हो जाए, वहाँ रावण और दुर्योधन जैसा सर्वनाश निश्चित है। स्त्री भगवान की साक्षात् शक्ति है, इसे ताड़ना (पीटना) समझने वाले महामूर्ख हैं।”

प्रेमानंद महाराज जी का स्पष्ट कहना है कि शब्दों के फेर में मत उलझिए। ताड़ना का अर्थ है—देखभाल, अनुशासन और सुरक्षा। जिस तरह घुड़सवार घोड़े को एड़ी से और किसान बैल को इशारे से निर्देशित करता है, वैसे ही समाज की इन पांच इकाइयों को विशेष मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। महाराज जी के वचन हमें सिखाते हैं कि महापुरुषों की वाणी को समझने के लिए पहले अपनी दृष्टि को पावन करना अनिवार्य है।

Q&A Section

Q1. प्रेमानंद महाराज ने ताड़नाका क्या अर्थ बताया है?

A-महाराज जी के अनुसार ताड़ना का अर्थ मारना-पीटना नहीं, बल्कि देखभाल करना, निगरानी रखना और अनुशासन में रखना है।

Q2. क्या महाराज जी के अनुसार नारी को पीटना सही है?

A-बिल्कुल नहीं। महाराज जी ने इसे मूर्खता बताया है और नारी को ‘रत्न’ और ‘जगदंबा की शक्ति’ कहा है जिसकी सुरक्षा अनिवार्य है।

Q3. ढोल और नारी की तुलना का क्या मतलब है?

A-यह तुलना नहीं है, बल्कि ‘ताड़ना’ शब्द के अलग-अलग संदर्भ हैं। ढोल को सुर में रखने के लिए और नारी को सुरक्षित रखने के लिए ‘ध्यान’ (ताड़ना) की जरूरत होती है।

Q4. प्रेमानंद महाराज जी ने गवारके लिए क्या तर्क दिया?

A-उन्होंने कहा कि विवेकहीन व्यक्ति को काम देकर छोड़ना नहीं चाहिए, उस पर निगरानी रखनी चाहिए ताकि काम खराब न हो।

Q5. रामायण की इस चौपाई पर विवाद क्यों होता है?

A-विवाद का मुख्य कारण ‘ताड़ना’ शब्द का गलत अर्थ (पिटाई) निकालना है, जबकि आध्यात्मिक संदर्भ में इसका अर्थ ‘देखना या समझना’ है।

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