गाना गाकर सामान बेचते थे दिल्ली के फेरीवाले

पुराने जमाने में फेरीवाले दिल्ली की समाजी जिन्दगी का एक हिस्सा थे जिसके बिना दिल्ली वालों का जीवन नीरस और अधूरा हो जाता। कोई रिहायशी या कारोबारी जगह ऐसी नहीं थी जहां फेरीवाले नहीं आते-जाते थे। गली-मुहल्ले, कूचे – बाजार, दफ़्तर-मदरसे, तफरीहगाहें, कोई चप्पा उनसे नहीं बचा था। घरवाले अभी मुश्किल से सोकर ही उठते कि फेरीवाले गलियों में आवाजें देने लगते। हर फेरीवाले का आने का वक्त बंधा हुआ था और लोगों को पता होता था कि अमुक फेरीवाला अमुक समय आएगा। मगर एक-एक करके दिन में तीस-चालीस फेरीवाले आ जाया करते थे। हर फेरीवाला अपने गाहक को और हर गाहक फेरीवाले को खूब पहचानता और नाम से जानता था। दोनों दुआ सलाम के बाद एक दूसरे की कुशल-मंगल भी पूछ लेते थे।

दिल्ली के फेरीवालों की एक बड़ी विशेषता यह थी कि अपने सौदे को वे एक बड़ी लच्छेदार आवाज में और अक्सर सुरीले स्वर में और कभी-कभी तो गाकर बेचते थे। किसी साहित्यकार ने सच लिखा है कि दिल्ली के बाजारों-कूचों में फेरीवालों की आवाजें सुनकर ऐसा लगता था कि इस्फहान’ के शायर चौक में गजल पढ़ रहे हैं। दिल्ली के बारे में यह भी मशहूर था कि यहां हर आदमी चाहे वह पढ़ा-लिखा था या नहीं, कलापूर्ण रुचि और संवेदनशीलता रखता था। फेरीवाले जो आवाज लगाते, वह आमतौर पर उनका अपना आविष्कार होता। अगर कलाम किसी और का भी होता तो उसमें अपनी तरफ से कुछ-न-कुछ जोड़ लेते। लेकिन जो कुछ कहते गागर में सागर भर देते और सुनने वालों को बड़ा आनन्द आता। आदमी को अगर चीज न भी लेनी होती तो फेरीवाले की आवाज सुनकर उसे रस आने लगता और उसे खरीदने की इच्छा उसके मन में पैदा हो जाती।

फेरीवालों का गाकर अपने सौदे को बेचने का रिवाज मुगलों के जमाने में शाहजहां के काल से शुरू हुआ। शाहजहां की इच्छा थी कि फेरीवाले उसकी नई राजधानी शाहजहानाबाद में अपनी चीजों को साफ और ऊंची आवाज़ में बेचें ताकि घर की औरतें अपने घरों की ड्योढ़ी पर जरूरत की चीजें खरीद सकें और फेरीवाले और राह चलते हुए उन्हें न देख सकें। उन दिनों हिन्दू और मुसलमान औरतों में परदे का रिवाज समान था। लड़कियों की शादी-ब्याह के मौके पर औरतें घरों में बैठी-बैठी दहेज का पूरा सामान खरीद लेतीं।

उन्नीसवीं सदी के मध्य में बड़ा सस्ते का जमाना था और दिल्ली वाले रोजमर्रा की जरूरत की मामूली चीजें छोटे सिक्कों से ही खरीद लेते। उन दिनों में प्रचलित छोटे सिक्के थे कौड़ियां, गडे, दाम, छदाम, दमड़ी, अद्धी, मंसूरी पैसा, पैसे और टके या अद्धे । एक पैसा 25 गंडों या 100 कौड़ियों के बराबर था और एक दाम पैसे का 1/25वां हिस्सा छ दाम, एक चौथाई अद्धी- आधा पैसा और टका दो पैसे के बराबर होता था। बच्चे तो फेरीवालों से इन सिक्कों से ही छोटी-मोटी चीज़े लेकर खाते रहते थे। गेहूं एक रुपए का एक मन और घी एक रुपए का पांच सेर मिला करता था । काफी बाद में जब अंग्रेजी दौर शुरू हुआ और कीमतें कुछ बढ़ीं तो रुपए, आने, पैसे, घेले और पाई का रिवाज हो गया। मगर उस जमाने में भी पन्द्रह रुपए महीने में एक छोटे परिवार का अच्छी तरह से गुज़ारा हो जाता था।

गुलाबी जाड़े में सबसे पहले सुबह-सवेरे भड़भूजे, दौलत की चाट या नमश, तिलंगी वाले और मक्खन की गोलियों वाले गलियों और सड़कों पर निकल आते थे भड़भूजे के कंधे पर एक बड़ा बेला लटका रहता था जिसमें भाड़ के भुने हुए चने होते थे। उसी थैले के अंदर दो और छोटे थैलों में मुरमुरे और परमल होते थे। दिल्ली वालों को भुने हुए चने खाने का बड़ा शौक़ था। उनका यह विश्वास था कि भुने हुए चनों को सूंघने से जुकाम-नजला ठीक हो जाता है। कहा जाता है कि हर सुबह बहादुरशाह ज़फ़र को भी भुने हुए चने सोने की एक तश्तरी में रखकर दिए जाते थे।

दौलत की चाट या नमश (दूध के झागों की पिस्तों की आबवाली चाट) दिल्ली वालों की एक खास नेमत होती थी। यह मिट्टी की छोटी-छोटी प्यालियों में होती थी और उसे क्या हिन्दू क्या मुसलमान सब छोटे-बड़े चाव से खाते थे। उसकी नीचे की खुरचन तो बहुत ही स्वाद होती थी। इसे बांस की बनी हुई छोटी-छोटी छिली हुई खपचियों से खाते थे।

दौलत की चाटवाले की आवाज ‘चाट है दौलत की, दिलवालों की, मुफलिस का दिल उचाट है, यह दौलत की चाट है, चाट लो दौलत की, दौलत की चाट, दौलत की कानों में पड़ते ही मुंह में पानी आने लगता। फिर तिलंगनी काली मिचवाला आता। मक्खन की गोलियां एक पैसे की चार मिलतीं और मक्खन की गोलियों वाला आवाज लगाता रहता, ‘ले लो गोली मक्खन की ताजा खालिस मक्खन की।’ उसके बाद एक बहंगी में रखे सब्जीवाला दाखिल होता। वह ऊंची आवाज़ में अपनी सब्जियों की तारीफ़ भी करता और भाव भी बताता। ‘आने सवैया (सवा सेर) हो गई मटर नरम, मीठी भरवां मटर।

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