दिलशाद गार्डन (Dilshad garden) का नाम सुनते ही आंखों के सामने बाग-बगीचे की तस्वीर उभर आती है। लेकिन क्या आपको पता है कि यहां कभी बड़ा गार्डन नहीं था। यह इलाका तो बंगाली जुल्फों की फैक्ट्री के लिए प्रसिद्ध था। इसी तरह बेगमपुर (Begumpur) का नाम बेगमपुर मस्जिद पर रखा गया है।
दिलशाद गार्डन की जुल्फों का जलवा
आरवी स्मिथ की मानें तो दिलशाद गार्डन में कभी कोई बड़ा गार्डन नहीं था। लेकिन यहां बंगाली जुल्फें बनाने की एक फैक्ट्री थी जो बहुत ही प्रसिद्ध थी। आजादी के पहले तक तो यहां की जिन लड़कियाें की शादी पाकिस्तानी होती थी। या फिर जो लड़कियां दिल्ली या आसपास के इलाके में घुमने के लिए भी आती थी वो जुल्फें जरूर खरीदती थी। लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां की जुल्फें बतौर गिफ्ट भी लोग देते थे। आजादी के बाद बंटवारे के समय यह फैक्ट्री बंद हो गई थी। जुल्फें बंगाल के नाम से ही फैक्ट्री प्रसिद्ध थी। लेकिन दिलशाद गार्डन नाम कैसे पड़ा इस बारे में बहुत कुछ सटीक नहीं कहा जा सकता है। स्थानीय निवासी वेद प्रकाश वेदी कहते हैं कि दरअसल यह पुरा इलाका तो झिलमिल-ताहिरपुर आबादी पर बसा है। डीडीए के फ्लैट हैं, जिसे डीडीए ने ही दिलशाद गार्डन नाम दिया है। गार्डन तो यहां बनाए गए बाग बगीचों की वजह से बोला गया।
बेगमपुर
स्थानीय निवासी कहते हैं कि बेगमपुर मस्जिद के नाम पर ही इसका नाम पड़ा। कभी दिल्ली की जामा मस्जिद के बाद सबसे बड़ी मस्जिद मानी जाती थी। बेगमपुर मस्जिद का इतिहास तुगलक के काल का है। बेगमपुर मस्जिद दिल्ली के जहांपनाह नगर में स्थित है। इसका निर्माण मोहम्मद बिन तुगलक ने लगभग 1350 ईसवी में कराया था। जहांपनाह को दिल्ली के सात नगरों में चौथा नगर कहा जाता है। जिसे मंगोलों के लगातार हो रहे आक्रमण से बचने के लिये बनवाया गया था। इस नगर की सीमा पिथौरागढ़ और सीरी दोनों नगरों के परकोटों को मिलाकर बनाई गई थी। वर्तमान में मालवीय नगर के पास ही बेगमपुर है। बकौल संजय पहले यहां एक बहुत बड़ा जोहड़ था जो बेगमपुर की जोहड़ के नाम से जाना जाता था। कहा जाता है कि यह इतना बड़ा था कि इसमें महरौली, जेएनयू तक का बारिश का पानी आता था। बाद में अतिक्रमण के चलते यह खत्म ही हो गया। हालांकि अभी भी जोहड़ृ का केस अदालत में चल रहा है।