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क्या ग्रहण में ध्यान करना वाकई असरदार है? स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने खोले इसके पीछे के वैज्ञानिक राज!

दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।

Solar & Lunar Eclipse 2026: जब भी सूर्य या चंद्र ग्रहण (Eclipse) की बात आती है, समाज दो हिस्सों में बंट जाता है—एक जो इसे केवल खगोलीय घटना मानता है और दूसरा जो इसे अंधविश्वास से जोड़ता है। लेकिन Grahan me dhyan ka prabhav क्या वास्तव में होता है? ओशो धारा के प्रमुख और प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने इस पर एक क्रांतिकारी नजरिया पेश किया है। उन्होंने बताया कि ग्रहण का संबंध केवल नक्षत्रों से नहीं, बल्कि सीधे हमारे शरीर और मन की ऊर्जा से है।

ग्रहण के समय ब्रह्मांड में गुरुत्वाकर्षण की जो खींचतान होती है, उसका गहरा प्रभाव पृथ्वी के जल और हमारे भीतर मौजूद 70% जल तत्व पर पड़ता है। आइए जानते हैं स्वामी जी के अनुसार ग्रहण के दौरान ध्यान की गहराई में जाने का सही विज्ञान क्या है।

खगोलीय संरेखण (Alignment) और मानव चेतना

स्वामी जी बताते हैं कि ग्रहण के दौरान सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में आ जाते हैं। इस संरेखण के कारण पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण (Gravity) का खिंचाव सामान्य दिनों की तुलना में बिल्कुल अलग होता है।

इस खिंचाव का सबसे बड़ा उदाहरण समुद्र में उठने वाला ‘ज्वार-भाटा’ (Tides) है। स्वामी जी का तर्क है कि यदि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण विशाल समुद्रों में लहरें पैदा कर सकता है, तो क्या वह हमारे शरीर के भीतर मौजूद जल और तरल तत्वों को प्रभावित नहीं करेगा? निश्चित रूप से करेगा। यही कारण है कि इस दौरान ध्यान करना एक विशेष अनुभव हो सकता है।

पूर्णिमा और अमावस्या: ध्यान का असली अवसर

स्वामी जी ने एक महत्वपूर्ण बात कही—सिर्फ ग्रहण का इंतजार क्यों करना? हर पूर्णिमा (Full Moon) और अमावस्या को भी यही स्थिति बनती है।

  • पूर्णिमा का विज्ञान: पूर्णिमा के दिन पृथ्वी बीच में होती है, एक तरफ चांद और दूसरी तरफ सूरज। दोनों ओर से पड़ने वाला खिंचाव एक-दूसरे को ‘नलिफाई’ (Nullify) करता है, जिससे ‘विदेही अनुभूति’ (Body-less experience) में जाना बहुत आसान हो जाता है।
  • अमावस्या का प्रभाव: इस दिन सूरज और चांद एक ही दिशा में होते हैं, जिससे पृथ्वी पर खिंचाव बढ़ जाता है। यही कारण है कि ज्यादातर भूकंप या ज्वालामुखी फटने जैसी घटनाएं इन्हीं दिनों के आसपास होती हैं।

क्या ग्रहण के समय ध्यान करना खतरनाकहै?

अक्सर लोग डराते हैं कि ग्रहण में ध्यान करने से कुछ बुरा हो जाएगा। स्वामी जी इस पर स्पष्ट कहते हैं कि शुभ कार्य के लिए किसी मुहूर्त का इंतजार करना केवल काम को टालने का बहाना है। जो करने योग्य है, उसे ‘अभी और यहीं’ (Here and Now) करना चाहिए। ग्रहण के दौरान बढ़ा हुआ गुरुत्वाकर्षण बल साधक को शरीर के बंधनों से मुक्त होने में मदद कर सकता है, बशर्ते वह डरने के बजाय साक्षी भाव (Witnessing) में रहे।

अंततः, Grahan me dhyan ka prabhav वैज्ञानिक और ऊर्जावान दोनों स्तरों पर सत्य है। स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती के अनुसार, ब्रह्मांडीय ऊर्जा का यह बदलाव हमें ध्यान की गहराई में ले जाने के लिए एक ‘कैटालिस्ट’ (Catalyst) का काम करता है। हालांकि, वे यह भी याद दिलाते हैं कि ध्यान के लिए किसी विशेष खगोलीय घटना की प्रतीक्षा करने से बेहतर है कि हम हर दिन को पूर्णिमा की तरह जागरूकता के साथ जिएं।

Q&A Section

Q1. क्या ग्रहण के दौरान ध्यान करने के लिए कोई विशेष विधि है?

A-स्वामी जी के अनुसार, किसी विशेष विधि से ज्यादा जरूरी ‘साक्षी भाव’ है। बढ़ते गुरुत्वाकर्षण के बीच खुद को शरीर से अलग अनुभव करना इस समय सरल होता है।

Q2. पूर्णिमा के दिन नींद कम क्यों आती है?

A-वैज्ञानिक रिसर्च के अनुसार, पूर्णिमा पर औसत 12 मिनट की नींद कम हो जाती है क्योंकि प्रकृति में जागरण (Awareness) की ऊर्जा बढ़ जाती है, जो ध्यान के लिए शुभ है।

Q3. क्या ग्रहण का प्रभाव केवल नकारात्मक होता है?

A-बिल्कुल नहीं। यह ऊर्जा के बदलाव का समय है। यदि आप शांत हैं, तो यह आपको गहराई में ले जाएगा; यदि आप अशांत हैं, तो उत्तेजना बढ़ा सकता है।

Q4. ग्रहण में मंदिर क्यों बंद कर दिए जाते हैं?

A-यह पारंपरिक मान्यताओं का हिस्सा है, लेकिन ध्यान एक आंतरिक यात्रा है, जिसके लिए बाहरी मंदिरों के खुलने या बंद होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

Q5. क्या ग्रहण के समय मंत्र जाप अधिक फलदायी होता है?

A-हां, क्योंकि इस समय पृथ्वी का वातावरण ऊर्जा के प्रति अधिक संवेदनशील होता है, इसलिए मंत्रों की ध्वनि का प्रभाव गहरा होता है।

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