दिल्लीवालों को रहा है कसरत और कुश्ती का शौक

दिल्लीवालों को कसरत और कुश्ती का शौक हमेशा से रहा है। पौ फटने से पहले ही तारों की छांव में लड़के लंगर-लंगोट कसकर घर की छतों पर चढ़ जाते। पहले तेल की मालिश करते और फिर कसरत में जुट जाते। जरा चांदना होता तो छतों पर लड़के डंड पेलते और मुगदरों की जोड़ी हिलाते दिखाई देते थे। डंड पेलने के लिए छतों पर ईंटें रखी रहती थीं या बलडंड बनवा लेते थे।

कसरत से सीना चौड़ा, कमर छल्ला और पेट चपाती-सा हो जाता था। डंड और बैठक का साथ चोली-दामन का था और डंड के साथ बैठकें लगाई जाती थीं। नियम के अनुसार जितने कोई डंड पेलता उससे दुगुनी या तिगुनी बैठकें निकालता। बैठकों से जांघें मोटी हो जातीं और पिंडलियां मजबूत बनतीं। डंड पेलने से छाती उभरती और चौड़ी हो जाती। साथ ही बाजुओं में ताकत आती।

कसरत के बाद लड़के कुएं पर जाकर नहाते और घर में या हलवाई की दुकान पर दूध पीते । जो लड़के घरों में कसरत नहीं करते वे तड़के ही घर के दरवाज़े की कुंडी खोलकर निकल जाते और अखाड़े की राह लेते। जाते ही कपड़े उतारकर लंगर-लंगोट कस लेते। पहले एक-दूसरे की मालिश करते और फिर कुदाल और फावड़ा लेकर अखाड़े की ज़मीन ठीक करने में लग जाते। अखाड़े की ज़मीन को चिकनी मिट्टी और गेरु मिलाकर पोला कर लिया जाता था। अब कसरत शुरू हो जाती। हर तरफ से हूं-हां और बदन पर थप्पड़ या रैपटा पड़ने की आवाजें आने लगतीं।

कहीं बलडंड पर डंड पेले जा रहे हैं, पीछे एड़ियों पर किसी लड़के को खड़ा कर रखा है और वह लंगोट पकड़े डंड पेलने वाले के साथ ऊपर-नीचे हो रहा । इस प्रकार डंड पेलने से बदन और मज़बूत होता है। कोई लड़का दीवार पकड़कर एक कोने में बैठक लगा रहा है। और दिल-ही-दिल में बैठकों की गिनती करता जा रहा है। एक संतोला उठा रहा है और दूसरा लेज़िम से वरजिश कर रहा है। किसी के हाथ में मुगदरों की जोड़ी है तो कोई मुगरियों के हाथ निकाल रहा है। अखाड़े में सिर्फ़ लंगर या रुमाली पहनने की परंपरा है। सब उसी से गुप्तांग ढके हुए हैं।

कसरत और पहलवानी करते-करते पसीने में नहाने लगे हैं लेकिन थकावट नाम को नहीं। एक कोने में लड़का हाथों पंजों पर उलटा खड़ा है और कभी-कभी टांगों को घुटनों के पास से सिर की तरफ झुकाकर मोर की दुम ‘की नकल करता आहिस्ता-आहिस्ता आगे-पीछे हो रहा है। मलखंभ की इस कसरत से दिल मज़बूत और दिमाग रोशन हो जाता है क्योंकि उनकी ओर रक्त संचार तेज होता है। कसरत के सामान में लेजिम, संतोला और मुगदरों के अलावा याका, नाल (एक गोल भारी पत्थर जिसके बीच में एक छेद होता है) और तरह-तरह के लोहे और पत्थर के वज़न शामिल होते थे। अगर अखाड़े में दो लड़के कुश्ती में व्यस्त हैं तो दूसरे इस बीच उन चीज़ों से कसरत करके अपने आपको गर्म कर लेते हैं।

अखाड़े में पहुंचते ही लड़के सबसे पहले अपने गुरु या खलीफा के आगे नत मस्तक होते और उसके चरण स्पर्श करते थे गुरु या खलीफा की हैसियत पिता से ज्यादा समझी जाती थी और उसकी अवज्ञा का कभी सवाल ही पैदा नहीं होता था। उसके इशारे और आज्ञा पर लड़के हर काम करने के लिए हर वक़्त तैयार रहते थे। उस समय के उस्ताद न केवल अपने शागिर्दों को पहलवानी के दांव-पेंच ही सिखाते थे बल्कि नैतिकता पर भी पूरा बल देते थे। उनका कहना था कि जब तक दिल और दिमाग पर नियंत्रण नहीं होगा कसरत का कोई फायदा नहीं और बदन भी नहीं बनेगा। उनकी पहली सीख यह होती थी कि लंगोट के पक्के रहो।

शागिदों को यह सिखाया जाता था कि उनकी चाल में पहलवानी की शान होनी चाहिए। पहलवानी की शब्दावली में शागिदों को पट्टे कहा जाता था। उस्ताद बड़े ढंग से उन्हें कसरत करना सिखाते ताकि जिस्म के हर अंग का विकास ठीक तरह से हो। यह सावधानी ख़ासतौर पर रखी जाती थी कि न केवल शरीर के ऊपर के भाग का विकास हो बल्कि जायें और पिंडलियां मजबूत हो जाएं पहलवानों और शार्गिदों को अपने शरीर के प्रदर्शन का शौक होता था।

अखाड़े में गुरु या खलीफा एक ऊंचे चबूतरे पर बैठा रहता और उसकी नजर अपने हर शिष्य और पट्टे पर रहती थी। वह उन्हें हिदायतें देता रहता था। उसकी हिदायतें आमतौर पर ज्यादातर चार बातों तक सीमित रहती थीं अमल की फुर्ती, अंदरुनी ताकत, मौके पर सही दांव का इस्तेमाल और विरोधी के दांव के तोड़ का ठीक समय पर इस्तेमाल उस ज़माने में जो पकड़े आम थीं उनमें कैंची, मंढा, बगल, घिस्सा, घाल अड़ंगा, अंटी, कुफ़्ली और घोबीपाट शामिल हैं। ऊंची का दांव बड़ा लोकप्रिय था। पहलवान यह कोशिश करता था कि अपने प्रतिद्वंद्वी के घुटनों को ऊंची के आकार में मोड़कर उसे ऐंड कर दे। जो पहलवान ऊंची के दांव का शिकार हो जाता था उसके घुटने बहुत देर तक अपनी असल हालत में न आते जब तक कि उसका तोड़ न इस्तेमाल किया जाए।

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