शहर की बारिशें और चौक चौराहों से आती तली भुनी जायकों की खुशबू। ठंढी बरसात की फुहारों में पुरानी यादों के बीच नागौरी हलवे, बेड़मी पूरी, मटर की कचौरी हलवे, समोसे, जलेबी का सिलसिला जो चल पड़ता है तो थामना मुश्किल सा हो जाता है। ठीक उसी तरह जब सावन के बादल शहर में कुछ इस कदर घिर आते हैं कि बारिशों का सिलसिला फिर बामुश्किल थमता है। सावन में पकौड़े, चटपटी आलू और बेड़मी पूरी, जलेबी, भुट्टे का स्वाद लेने बस कदम निकल पड़ते हैं चांदनी चौक (chandni chowk) की जायके वाली गलियों में..

आलू और बेड़मी पूरी

चावड़ी बाजार (chawri bazar) के बर्शाबुल्ला चौक बारिशों में और खास सी नजर आती है। यहां से आती गर्म घी में तले जाते बेड़मी पूरी की खुशबू अपने ओर खींच लेती है। बेड़मी पूरी और कचौरी की खुशबू से राहगीर भी खिंचे चले आते हैं। लेकिन यहां के लोग भी फुर्सत में गर्मागर्म बेड़मी पूरी और आलू की चटपटी सब्जी के जायकों की तलाश में चले आते हैं। दरअसल, शाहजहांनाबाद (shahjahanabad) की गली बारिशों में भी गुलजार रहती है। खासतौर पर सुबह और दोपहर में जब लोग यहां बेड़मी पूरी खाने दूर दूर से आते हैं।

श्याम स्वीट्स (shyam sweets) के भरत ने बताते हैं कि सावन में अब भी पुराने लोग सिंधारा बंधवाने यहां आते हैं लेकिन अब धीरे धीरे स्थितियां बदल रही है। कई लोग दिल्ली के बाहर गुड़गांव, फरीदाबाद बस चुके हैं। लेकिन खरीदारी करने इन्हीं गलियों में आते हैं। क्योंकि वे कही भी चले जाए हैं दिल्ली के जायके उनके दिल में बसते हैं। इसी के चलते पुरानी दिल्ली में पुराने जायके आज भी चल रहे हैं। खासकर पुराने लोग आज भी अपने ठीए और दुकानों में इन चीजों को पकाते हैं। नागौरी हलवे की मिठास और स्वाद के कायल मुगलकाल के आखरी बादशाह बहादुर शाह जफर (bahadur shah zafar) भी इस कदर थे कि वे नाश्ते में इसी दुकान से नागौरी हलवा और मटर की कचौड़ी मंगाया करते थे। श्याम स्वीट्स पिछली पांच पीढ़ी से चल रही है। दिल्ली छह का खालिस स्वाद जो किसी के मुंह में पानी ला दे। बेड़मी पूरी और आलू की सब्जी के साथ आचार भी जायके के लुत्फ को बढ़ा देता है।

जलेबी की तीन छल्लों की गर्मागर्म चाशनी ..

करीब 80 साल पहले योगेश यादव के पिताजी ने चांदनी चौक पर जलेबी बनानी शुरू की थी। शिव मिष्ठान भंडार, आजादी से पहले के बेहतरीन जायकों में गिना जाता है। इस जायके में आज भी वो ही ताजगी और पुराना स्वाद है। यही वजह है कि यहां पुराने लोगों के साथ साथ अब नई पीढ़ी भी जलेबी का स्वाद लेने आते हैं। जलेबी की तरह गोल छल्लों में सोहना स्वाद है। तीन छल्लों में बंधी मीठी स्वादिष्ट मुंह में घुल जाती है। और रिमझिम फुहारे पड़ने लगे तो घी में तली जा रही जलेबी के धुएं भर से ही मुंह में पानी आ जाता है।

योगेश यादव बताते हैं कि बारिशों में तो जलेबी खूब खरीदी जाती है। पहले जब यहां पूरी रिहाइश थी तब तो लोग कतारों में खड़े रहते थे, लेकिन अब दुकानदार अपनी मीठे खाने की तलब को संतुष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि उनके चपन के दोस्त दिल्ली एनसीआर से यहां आते हैं जलेबी के साथ मीठी यादें ताजा करते हैं। हमारी तरह कई लोगों की यादें यहां आकर ताजा हो जाती है। जलेबी आज भी उसी तरह, उतनी ही बड़ी बनाई जाती है। आस पास के लोग सावन के महीने में लगने वाले कार्यक्रमों में यहीं से जलेबी लेकर आते हैं। वे बताते हैं कि खमीर और मैदा के मिश्रण को उसी तरह तैयार किया जाता है, जैसा पहले था। इसी वजह से लोग इस जलेबी को खूब पसंद करते हैं। कुर कुरी

भुने हुए भुट्टों का स्वाद ..

बारिशों में जो सबसे आसानी से मिल जाते हैं, वो हैं भुट्टे। शहर के बाजारों के चौक चौराहों में दो तरह के गर्मागर्म भुट्टे का स्वाद चलते फिरते लिया जा सकता है। रिमझिम फुहारों के बीच तो भुने और भांप से पकाए गए भुट्टे का सुस्वाद लेने से शायद ही कोई रोक पाता है। कोयले की धीमी आंच पर सींकते भुट्टे, उस पर नीबू और काला नमक का चटपटा जादू। चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन के पास जो भुट्टे की भुनने की सुंगध शुरू होती है वो पूरी चांदनी चौक के गली नुक्कड़ में मौजूद रहती है। एक पुरानी सी दरीबे में पिछले कई सालों से रेत में आलू और भुट्टे भुनने वाले सुमेश बताते हैं कि बारिशों में भुट्टे का काम निकल पड़ता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि बारिश में भुट्टे का स्वाद दो गुना बढ़ा सा लगता है, दूसरा किफायती भी है। रेत में भुने हुए भुट्टे कई दुकानदार यही से लले जाते हैं।

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