विलियम डेलरिंपल अपनी किताब द लास्ट मुगल में लिखते हैं कि पादरी मिजेली जॉन जेनिंग्स दिल्ली के ईसाइयों का पादरी था और कभी अपनी बात खुल्लम खुल्ला कहने से नहीं घबराता था। जेनिंग्स बहादुर शाह जफर के बेटे मिर्जा जवांबख्त की शादी से तीन महीने पहले हिंदुस्तान पहुंचा था। वह तभी से दिल्ली के लोगों को ईसाई बनाने की कोशिश की अपनी योजना पर अमल कर रहा था क्योंकि उसका ख़्याल था कि मुगल राजधानी दुनिया में शैतान की आखिरी पनाहगाह थी।

वह लिखता है:- “इस शहर की चार दीवारी में जिंदगी का गुरूर, आंख की लालच और जिस्मानी हवस पूरी तरह रची हुई है। और इस जमीन के टुकड़े की तमाम बरकत एक के बाद एक भ्रष्ट शासकों के हाथ तबाह हो रही है। ऐसा लगता है कि यहां शैतान को खुली छूट रही है कि वह अपनी शेखी पूरी कर सके। वह जिसको चाहे गुमराह कर सकता है और जहां सच्चाई, विनम्रता और नेकी के लिए कोई जगह नहीं है…..”

जेनिंग्स का प्लान था कि वह हिंदुस्तान के सभी मजहबों को, जो उसके ख्याल से झूठे थे, जड़ से उखाड़ फेंके, चाहे इसके लिए उसे जबरदस्ती ही करनी पड़े।

“प्राचीन मज़हबों की जड़ें, सभी पुरानी जगहों की तरह, यहां भी इतनी गहरी चली गई हैं कि उनको उखाड़ने के लिए हम लोगों को बहुत गहराई में जाना पड़ेगा।”” उसका तरीका बहुत सीधा था। ब्रिटिश सल्तनत की बढ़ती हुई ताकत का इस्तेमाल। जो ‘रहस्यमयी रूप से दिव्य कृपा का ज़रिया’ था जो काफ़िरों को वास्तविक धर्म स्वीकार करा सकेगा।

अपने दिल्ली मिशन के प्रस्ताव में जेनिंग्स ने लिखा कि अब ब्रिटिश ‘सरकार के कब्ज़े में ‘कोहे-नूर’ हीरा भी आ गया है जो कभी हिंदुस्तान के सबसे महान वंश मुगलों की मिल्कियत था। इसकी कृतज्ञता में अब अंग्रेजों को चाहिए कि वह हिंदुस्तान भर में ईसाइयत का प्रचार करें और इसके बदले में वहां के लोगों को एक “अनमोल मोती” (ईसाई धर्म) पेश करें। और जैसे-जैसे ब्रिटिश शासन पूर्व से लेकर पश्चिम तक फैलता जाएगा, उसी तरह अंग्रेज़ों को भी सारा मुल्क असली ख़ुदा और उसके मानने वालों के लिए फतह कर लेना चाहिए और झूठे मजहबों से कोई समझौता नहीं करना चाहिए।

जेनिंग्स 1832 में हिंदुस्तान आया था। उसकी बेटी के अनुसार, बहुत जल्द उसकी साख “मज़हबी मामलों में बेपरवाही बरतने वालों के खिलाफ जंग करने” वाले पादरी की हो गई। शुरू में वह पहाड़ी शहरों में रह चुका था जहां ईसाइयों की कब्रों पर पत्थर लगवाने के सिवाय उसके पास और कोई काम न था। लेकिन उसका असल ख़्वाब हमेशा दिल्ली में एक मिशन खोलने का था जहां वह “विधर्मी लोगों को सही रास्ते पर लगाने का” गंभीर काम कर सके। आखिर 1852 में उसको दिल्ली के पादरी की नौकरी मिल गई और वह सीधा लाल किले पहुंच गया। वहां उसका दोस्त कैप्टन डगलस लाहौरी दरवाज़े वाले मकान में अपनी अपाहिज बीवी के साथ रह रहा था। दोनों चर्च के बहुत समर्थक और धार्मिक थे। जेनिंग्स ने उनके साथ रहना शुरू कर दिया।

लेकिन सिवाय डगलस के जेनिंग्स के ज़्यादा दोस्त न बन पाए क्योंकि उसका बर्ताव बहुत बेहिसी और अक्खड़पन का था। मैटकाफ परिवार भी उसको और थियो उसको ‘कट्टर’ मानता था।” जेनिंग्स शायद एक इकलौता विषय था जिसे बहुत नापसंद करता था। सर थॉमस उसको बदतमीज़ और दोगला कहता था या जिस पर बाप और बेटा दोनों की एक राय थी। और न सिर्फ वह बल्कि अंग्रेजों के पक्के समर्थक अंग्रेजी अख़बार डेल्ही गैजेट और मुग़लों के तरफदार देहली उर्दू अखवार भी उसके बारे में पूरी तरह से एक राय रखते थे।

यह कोई ताज्जुब की बात न थी कि धर्मनिष्ठ मौलवी मोहम्मद बाकर ने जो देहली उर्दू अख़बार के संपादक थे, जेनिंग्स को ‘धर्मांध’ लिखा।’ ज्यादा ताज्जुब की बात यह है कि अंग्रेज़ी अख़बार ने भी उसकी मज़हबी कार्रवाइयों को कुछ ज्यादा ही जुनूनी माना। जब जेनिंग्स कुंभ मेले में गया और लाखों यात्रियों को जो गंगा के किनारे जमा थे, ईसाइयत स्वीकार करने का प्रचार करने लगा और खूब बुलंद आवाज़ में उनके मज़हब को ‘शैतानी बुतपरस्ती’ कहकर भड़काया, तो दिल्ली गज़ट ने लिखा, “जेनिंग्स और उसके दोनों मातहतों को ज़्यादा सावधान रहना चाहिए। उनमें मिशनरी जोश ज़्यादा है, और वह समझ कम कि यह काफिरों का मेला बिल्कुल मुनासिब जगह नहीं है जहां वह धर्मपरिवर्तन की कोशिश कर सकते हैं। यहां वह रोज़ आम मजमे के सामने अपने उपदेश देते हैं, और उन पर ज़रा भी असर नहीं हुआ है, क्योंकि उसको ईसाइयत के खिलाफ चार बड़ी ताकतों से मुकाबला करना पड़ता है-अपराध, कारोबार, अय्याशी और बुतपरस्ती । जेनिंग्स मौजूदगी से सबसे ज़्यादा गुस्सा नागा साधुओं को था जो एक धृष्ट भिक्षु क़बीला है और ये नंगे रहते हैं। वह भीड़ के अंदर घुस जाते और अगर उनको कोई भी गैर-हिंदू नज़र आ जाता तो उसे बुरा-भला कहते और बाहर निकालने की कोशिश करते थे।

जेनिंग्स अपने लोगों में भी बहुत लोकप्रिय नहीं था। सर थॉमस का कहना था कि चर्च में एक औरत सर्दी की शिकायत कर रही थी, तो उसने उससे कहा कि “अगर तुम्हारा दिल गर्म होता, तो तुम्हारे पांव भी गर्म हो सकते थे!”” दिल्ली में वह कोई ख़ास अच्छा उपदेश देने वाला भी नहीं समझा जाता था। एक ब्रिटिश मजिस्ट्रेट ने लिखा है:

“मैं शाम की सर्विस के लिए चर्च गया तो उसके चेहरे पर एक बहुत हठीला अंदाज़ था जैसे वह कह रहा हो, “मैं जानता हूं कि यह काफी तकलीफदेह है मगर तुमको झेलना ही पड़ेगा।” जब तक उसने अपना लंबा उपदेश ख़त्म किया तो शाम हो चुकी थी और शमा जलानी पड़ीं। इस अंधेरे चर्च में एक शमा की रोशनी और इसके हाले में खड़े हुए शख्स की गरजदार आवाज़ ने अजीब समां बांध दिया। पूरे उपदेश में, बावजूद देर होने के, उन्होंने एक लफ्ज़ भी कम न किया। यह जिंदगी के बदलते हालात के बारे में था और कि इंसान को अपनी गलतियों पर पछताने में देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि भविष्य का कोई भरोसा नहीं है। उनको सुनकर उस वक्त मुझ पर एक अजीव उदासी का भाव छा गया।”

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