क्या जीवन में आनंद संभव है? दुख के सागर में आनंद की वीणा
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
मनुष्य जाति के मन में यह संदेह हमेशा से रहा है कि दुख, कष्ट और निराशा से भरे जीवन में आनंद संभव है भी या नहीं। यह सवाल ही हमारी गहन विषादग्रस्तता से पैदा होता है। लेकिन, आध्यात्मिक गुरु स्वामी शैलेंद्र सरस्वती इस संदेह को सीधे चुनौती देते हैं। अपने ताज़ा प्रवचन में, वे एक क्रांतिकारी परिभाषा देते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति आनंद के अस्तित्व पर भरोसा करता है, वही आस्तिक है; चाहे वह किसी मंदिर-मस्जिद में न जाए। और असली नास्तिक वह है जो आनंद को नकारता है, भले ही वह धार्मिक क्रियाकांडों में लीन हो। यह एक नया और गहरा दृष्टिकोण है जो हमारी पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं को हिला देता है। यदि ईश्वर का अर्थ परम आनंद की दशा है, जैसा कि ऋषियों ने सच्चिदानंद (सत्य, चैतन्य, आनंदमय) कहकर परिभाषित किया है, तो आनंद पर श्रद्धा ही आत्मज्ञान का पहला कदम है। यह प्रवचन उन सभी के लिए है जो जीवन में असली शांति और आनंद की खोज कर रहे हैं, लेकिन गलत दिशा में भाग-दौड़ कर रहे हैं।
आनंद की खोज: क्यों भौतिक साधन असफल हैं?
स्वामी शैलेंद्र सरस्वती सवाल उठाते हैं: क्या जीवन में आनंद संभव है, और यदि है, तो हम इसे क्यों नहीं पा रहे? उनका निष्कर्ष चौंकाने वाला है—कोई भी वास्तव में आनंद नहीं चाहता। हर कोई एक बड़ा मकान, नई कार, धन-वैभव, या सुंदर जीवन साथी चाहता है, और यह मानता है कि इनके मिलने पर आनंद मिलेगा। ये सभी वस्तुएँ आनंद पाने के साधन (कंटेनर) माने जाते हैं, न कि स्वयं आनंद (कंटेंट)।
वह तर्क देते हैं कि यही सबसे बड़ी भ्रांति है। भौतिक साधनों को प्राप्त करने की दौड़ में, हम पहले खुद को धीमा मानकर और दौड़ते हैं, फिर दिशा बदलकर देखते हैं, और अंत में थक हारकर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि “आनंद होता ही नहीं है।” यह मन का तीसरा, सबसे बड़ा धोखा है। स्वामी जी गारंटी देते हैं कि आज तक साधन के द्वारा किसी को भी आनंद नहीं मिला है। जिसे भी मिला है, वह बिना साधन के मिला है।
निर्वाण उपनिषद और सदानंद स्वरूप का रहस्य
इस आध्यात्मिक सत्य की पुष्टि के लिए स्वामी जी निर्वाण उपनिषद का उल्लेख करते हैं। उपनिषद के ऋषि के अनुसार, सन्यासी वह है जो केवल आनंद मांगता है, साधन नहीं मांगता—”आनंद भिक्षसी”। आनंद को प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह कोई वस्तु नहीं है। यह आत्म अनुभव की वह दशा है जब हम बाहरी भाग-दौड़ छोड़कर थोड़ी देर के लिए स्वयं में ठहर जाते हैं। हमारा अंतर्तम पहले से ही आनंद से ओत-प्रोत है।
आनंद को खोजना नहीं है, बल्कि उसके प्रति जागना है। हमारी बहिर्मुखी आदतें—शिकायत, अहंकार, आलोचना, और भूत-भविष्य में डोलना—हमें अंतर्मुखी नहीं होने देतीं। योगेन सदानंद स्वरूप दर्शनाम (योग की प्रक्रिया से सदानंद स्वरूप का दर्शन) सन्यासी की मुख्य क्रिया है। सदानंद वह आनंद है जो आता-जाता नहीं, बल्कि सदा-सदा मौजूद रहता है। यह सुख-दुख की तरह क्षणिक नहीं है। योग का अर्थ है स्वयं से जुड़ना, बाहरी जगत से बनाई गई पहचान (तादात्म्य) को तोड़ना।
अहंकार और आत्मज्ञान: दुःख की जननी
स्वामी जी अहंकार को सारे दुखों की जननी बताते हैं। नाम, रूप, पद, ज्ञान, डिग्री, धर्म, भाषा—इन सब से हमारा जो तादात्म्य (Identification) हो गया है, वही अहंकार है। यह अहंकार ही हमें दुखों के तल पर रखता है। वह कहते हैं कि यह अहंकार ही वह “जादू का स्पर्श” है जो हाथ में आई वस्तु को भी “मिट्टी” बना देता है।
आत्मज्ञान में प्रवेश के लिए, हमें इस अहंकार से नता तोड़ना होगा। स्वामी जी संसार छोड़ने को नहीं कहते, बल्कि 24 घंटे में से आधा-एक घंटा अपने भीतर ठहरकर, अपने मौलिक अवस्था (Original State) को पहचानने का आग्रह करते हैं। आत्मज्ञान में पता चलता है कि आत्मा नहीं है (“In self-realization we come to realize that there is no self”)—यानी वह पृथक ‘मैं’ या ‘अहंकार’ नहीं है। वहाँ केवल चैतन्य मात्र है, जो परमात्मा बोध है।
आनंद का स्वभाव: विस्तार और उत्सव
आनंद का स्वभाव सिमटना नहीं, बल्कि फैलना है। दुख में व्यक्ति सिकुड़ता है और अकेला हो जाता है, जबकि आनंद उत्साह के रूप में अभिव्यक्त होता है। ओशो ने सन्यासी की परिभाषा दी थी: “उत्सव अमर जाति, आनंद अमर गोत्र।” यह फैलाव, यह विस्तार, उस ब्रह्म का दिव्य गुण है जो हमारे भीतर मौजूद है।
आनंद को परिभाषित करना कठिन है, लेकिन नेति-नेति (यह भी नहीं, वह भी नहीं) के मार्ग से इशारा किया जा सकता है। आनंद कामनाओं में नहीं है, साधनों में नहीं है, भूत-भविष्य में नहीं है। आनंद दुख का अभाव है। यह कोई Invention (आविष्कार) नहीं जिसका निर्माण करना है, न ही Achievement (उपलब्धि) है जो कमाया जाएगा, बल्कि यह एक Discovery (खोज) है—वह जो पहले से ही भीतर मौजूद है।
भीतर छिपे आनंद की खोज
अंत में, स्वामी शैलेंद्र सरस्वती आश्वासन देते हैं कि आनंद संभव है, और यह हमारी नाभि में बसी कस्तूरी की तरह हमारे भीतर ही मौजूद है। कस्तूरी मृग की तरह बाहर भाग-दौड़ करने की मूर्खता छोड़ दें। उनका संदेश स्पष्ट है: किसी चमत्कार या जादू-टोने की तलाश में न भागें। गुरु केवल इशारा करता है कि तुम अपने भीतर डूबो, शांत हो जाओ, और सजग हो जाओ।
गुरु वह दे देता है जो तुम्हें मिला ही हुआ है (ओंकार स्वरूप), और वह छीन लेता है जो तुम्हारा नहीं है (अहंकार)। एक आनंदित व्यक्ति को देखकर ही भीतर यह भरोसा पैदा होता है कि आनंद प्राप्त किया जा सकता है। यह आत्मविश्वास ही वह माहौल बनाता है जहाँ शक समाप्त हो जाता है। वास्तविक संपदा भीतर है, और उसे बाहर खोजना विपदाग्रस्त जीवन को आमंत्रित करना है।
Questions & Answers (Q&A)
Q1: स्वामी शैलेंद्र सरस्वती के अनुसार नास्तिक की नई परिभाषा क्या है?
A1: स्वामी जी के अनुसार, असली नास्तिक वह है जो परम आनंद की दशा या आनंद के अस्तित्व पर भरोसा नहीं करता, भले ही वह धार्मिक क्रियाकलापों में लीन हो। इसके विपरीत, जो व्यक्ति आनंद पर श्रद्धा रखता है, वह आस्तिक है।
Q2: हम आनंद प्राप्त क्यों नहीं कर पाते, जबकि हम उसे चाहते हैं?
A2: स्वामी जी कहते हैं कि हम वास्तव में आनंद नहीं, बल्कि आनंद के साधन (जैसे धन, मकान, पदवी) चाहते हैं। हम समझते हैं कि साधन मिलने पर आनंद मिलेगा, लेकिन यह भ्रांति है। आनंद बिना साधन के, स्वयं में ठहरने से मिलता है।
Q3: ‘सदानंद स्वरूप‘ का क्या अर्थ है और यह सुख से कैसे अलग है?
A3: ‘सदानंद’ का अर्थ है सदा-सदा मौजूद रहने वाला आनंद। यह सुख से अलग है क्योंकि सुख और दुःख क्षणिक होते हैं, आते-जाते रहते हैं। सदानंद शांति और आनंद की वह मौलिक अवस्था है जो आत्मा का ब्रह्म स्वरूप है।
Q4: अहंकार को सारे दुखों की जननी क्यों कहा गया है?
A4: अहंकार विभिन्न नाम, रूप, पद, और मान्यताओं से हमारा किया गया तादात्म्य (Identification) है। जब तक हम इस झूठे ‘मैं’ के तल पर जीते हैं, तब तक हम दुखी रहेंगे। यह अहंकार ही बाहरी वस्तुओं को पाकर भी उन्हें आनंद नहीं देने देता।
Q5: आत्मज्ञान (Self-Realization) में क्या होता है?
A5: आत्मज्ञान में व्यक्ति को यह बोध होता है कि वह ‘मैं’ (अहंकार) जो उसने स्वयं को माना था, उसका अस्तित्व नहीं है। यह ‘स्व’ विलीन हो जाता है, और व्यक्ति अपने चैतन्य मात्र या परमात्मबोध स्वरूप को पहचानता है।
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