यह बाग कश्मीरी दरवाजे के बाहर यमुना के किनारे बना हुआ था। अब यमुना दूर चली गई है और उसकी जगह रिंग रोड है। बाग बहुत लंबा-चौड़ा और बहुत बड़े रकबे में फैला हुआ इसे नवाब कुदसिया बेगम महल मोहम्मद शाह बादशाह ने जो अहमद शाह बादशाह की माता थी, 1748 ई. में बनवाया था। उसका असली नाम उधमबाई था। यह ‘बेगम बड़ी बुद्धिशाली थी, मगर मोहम्मद शाह की ऐशपसंदी ने इसे भी गारत कर दिया।

कहा जाता है कि बेगम साहिबा को यह बाग बना-बनाया मिल गया था, जिसको उन्होंने अपने शौक और सलीके से खूब बनाया-संवारा। आलीशान इमारतें बनवाकर खड़ी कर दीं। नहरें और फव्वारे बनवाए, जिनके बंबों के निशानात अब भी दिखाई देते हैं। अब तो न वे महल रहे, न वे इमारतें और न बारहदरी। एक सदर दरवाजा और दो बारहदरियां और चंद गिरी पड़ी कोठरियां बेशक पुराने जमाने की याद दिलाती हैं। दरवाजा, जो पश्चिम में बना हुआ है, 39 फुट ऊंचा, 74 फुट लंबा और 55 फुट चौड़ा है। पूर्व की ओर एक मस्जिद बनी हुई है- जिसका मुंह रिंग रोड की ओर हैं।

किसी जमाने में यमुना का पानी बाग के साथ टकराया करता था। अब वह बहुत दूर चली गई है। इस बाग में अंग्रेजों ने फ्री मैसन लाज बनवाई थी, जो अभी मौजूद है। उसकी इमारत बाग के बीच वाले दरवाजे के नजदीक ही है।

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