1857 की क्रांति: बहादुर शाह जफर ने झज्जर के नवाब को पत्र लिखकर अपनी ख्वाहिश बताई थी। कहा था कि सबसे पहले ‘तैमूर के आला खानदान के सब लोगों और उन सबकी जायदाद के साथ’ महरौली में ख़्वाजा कुतब की सूफी मजार पर जाना चाहते थे फिर वह सब कुछ इकट्ठा करके, जो ऐसे सफर के लिए जरूरी है।

हर तरफ जंग के संकट से जूझ रहे हिंदुस्तान को पार करके मक्का और मदीना के ‘पवित्र स्थलों को’ जाना चाहते थे। इसलिए वह नवाब झज्जर से मिन्नत करते हैं कि ‘तुम हमारे सेवक हो, इसलिए फौरन हमारे शाही हुजूर में अपने कुछ एकदम भरोसे के खादिमों के साथ हाजिर हो। ताकि तुम हमारे पवित्र व्यक्तित्व की सुरक्षा कर सको, जब तक हम खुदा के घर (मक्का) के लिए रवाना नहीं हो जाते।

अगर तुम ऐसा करोगे, तो तुम्हें हमारी दिव्य रजामंदी और खुशी हासिल होगी और तुम्हारी शोहरत सारी दुनिया में फैल जाएगी।’ लेकिन एक छोटी सी मुश्किल थीः ‘यहां कोई गाड़ियां उपलब्ध नहीं हैं इसलिए तुम अपने साथ 400 या 500 गाड़ियां और 500 या 600 ऊंट जरूर लाना।

लेकिन नवाब तो दो कश्तियों के सवार थे। और वह किसी की भी तरफदारी नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने माफी मांग ली और कहा कि वह बहुत शर्मिंदा हैं। लेकिन इतना बुरा वक्त आ गया है कि वह ‘साया-ए-इलाही’ की मदद को नहीं आ सकते। एक ब्रिटिश जासूस का कहना है कि उसके फौरन बाद ही उन्होंने सिपाहियों के अफसरों के जाने के बाद वह शेर पढ़े,

जिनका अर्थ इस तरह थाः

मेरे ऊपर आसमान गिर पड़ा है,

अब मैं न आराम कर सकता हूं न सो सकता हूं

अब बस मेरा अंतिम प्रस्थान निश्चित है

अब वह चाहे सुबह को हो या रात को

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