सत्ता का केंद्र और ‘इन्द्रप्रस्थ‘ का मोतियों वाला दान
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
अगर हिन्दुस्तान के राजनैतिक इतिहास को एक विशाल महाकाव्य माना जाए, तो दिल्ली उसका सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। दिल्ली केवल ईंट-पत्थरों से बना शहर नहीं है, बल्कि यह एक जीवित राजनैतिक दर्शन है। यदि हम दिल्ली का राजनैतिक इतिहास (Delhi Political History) सही अर्थों में लिखना चाहें, तो हमें इसे किसी कालखंड की बेड़ियों में नहीं बांधना होगा। दिल्ली की जड़ें उस समय की हैं जब इतिहास और मिथक (Mythology) आपस में मिल जाते हैं। यह शहर आज ही राजधानी नहीं बना है, बल्कि हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, यह कौरवों और पाण्डवों के काल से ही सत्ता का केंद्र रहा है। इस लेख में हम उस सफर का विश्लेषण करेंगे जो इन्द्रप्रस्थ की पौराणिक गलियों से शुरू होकर आधुनिक भारत के संसद भवन तक पहुँचता है।
इन्द्रप्रस्थ का रहस्य: दान की भूमि से राजधानी तक
दिल्ली के राजनैतिक सफर की शुरुआत ‘इन्द्रप्रस्थ’ से होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसे इन्द्रप्रस्थ ही क्यों कहा गया? प्राचीन दस्तावेजों के अनुसार, ‘प्रस्थ’ शब्द का गहरा अर्थ है—”दोनों हाथों से दान करना।” लोक-कथाओं में वर्णन है कि इन्द्र देवता ने इस विशेष स्थान पर दो हाथ भर-भर के मोतियों का दान किया था। इसी दान की पवित्रता और समृद्धि के कारण पाण्डवों ने इसे अपनी राजधानी चुना।
आज के ‘पुराना किला’ क्षेत्र में जो ‘इन्द्रपथ’ नामक गाँव बसा हुआ था, वह इसी पौराणिक विरासत का अंतिम अवशेष था। नई दिल्ली के निर्माण के समय जब पुराने किले को खाली कराया गया, तब कहीं जाकर इन्द्रप्रस्थ का वह अंतिम भौतिक निशान मिटा। एक राजनैतिक इतिहासकार के लिए यहाँ से शोध शुरू करना अनिवार्य हो जाता है कि उस समय का समाज कैसा था? क्या इन्द्र का वह मोती-दान किसी विशेष राजनैतिक संधि का हिस्सा था? उस समय के लोगों का साधारण जीवन और देश के हालात क्या थे?
सात शहरों का सफर और भौगोलिक विस्थापन का विज्ञान
दिल्ली की राजनीति का एक अद्भुत पहलू इसका निरंतर खिसकना है। बारहवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर २०वीं सदी के प्रारंभ तक दिल्ली ने अपनी जगह कई बार बदली। पृथ्वीराज चौहान की राजधानी जिसे उस समय ‘देहली’ कहा जाता था, वह आज के महरौली और लाडोसराय के पास एक ऊंचे टीले पर स्थित थी। वहाँ से लेकर साल १९११ तक दिल्ली हमेशा ‘उत्तर’ की ओर बढ़ती रही।
हर नया शासक पुरानी दिल्ली को दक्षिण में छोड़ देता था और उत्तर में एक नई दिल्ली स्थापित करता था। इस प्रकार दिल्ली आठ या नौ बार बसी। पुरानी कहावतों में एक मशहूर मिसरा है— “नौ दिल्ली दस बादली और किला वजीराबाद”। यह एक प्राचीन भविष्यवाणी थी कि नौवीं बार दिल्ली अपने वर्तमान स्थान पर बनेगी और दसवीं बार इसका विस्तार ‘बादली’ के खेतों तक होगा। आश्चर्यजनक रूप से, जब अंग्रेजों ने नई दिल्ली की योजना बनाई, तो उसकी प्रारंभिक बुनियाद बादली के पास ही रखी गई थी।
ऐतिहासिक करवट: उत्तर से दक्षिण की ओर वापसी
दिल्ली के इतिहास में शाहजहाँनाबाद (पुरानी दिल्ली) के बाद एक बड़ा मोड़ आया। वर्तमान नई दिल्ली, शाहजहाँनाबाद के ‘दक्षिण’ में बनाई गई। यह दिल्ली के इतिहास की पहली ‘करवट’ थी। अब तक दिल्ली हमेशा उत्तर की ओर भाग रही थी, लेकिन २०वीं सदी में इसने वापस अपनी पुरानी देहलियों (महरौली और हुमायूँ के मकबरे की ओर) की तरफ रुख किया। यह बदलाव केवल भौगोलिक नहीं था, बल्कि आने वाली उन राजनैतिक घटनाओं का संकेत था जिन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखी।
गयासुद्दीन तुगलक: धर्मनिरपेक्ष राजनीति का पहला उद्घोष
मध्यकालीन दिल्ली के शासकों को अक्सर संकीर्ण नजरिए से देखा जाता है, लेकिन गयासुद्दीन मोहम्मद तुगलक के विचार आज के लोकतंत्र के लिए भी प्रेरणा हो सकते हैं। एक महान योद्धा और दूरदर्शी बादशाह के रूप में, गयासुद्दीन ने घोषणा की थी— “धार्मिक विश्वास एक व्यक्तिगत मामला है, इसका हुकूमत के प्रबंध या शासन की स्थापना से कोई वास्ता नहीं होना चाहिए।” यही वह राजनैतिक उद्देश्य था जिसने दिल्ली की सल्तनत को स्थिरता दी। गयासुद्दीन के बाद शेरशाह सूरी, बाबर और अकबर ने इसी ‘प्रजा-रक्षक’ नीति का अनुसरण किया। दिल्ली की राजनीति में कभी किसी योद्धा का जोर रहा, तो कभी महलों में रहने वाली समझदार बेगमों का। कभी सूफी संतों और पीर-फकीरों के संकेत पर हुकूमतों की दिशा बदली, तो कभी स्वार्थी दरबारियों की टोली ने जाल बुने। दिल्ली ने इन सबको अपनी गोद में पनाह दी और सबको परखा।
आर्थिक संप्रभुता: जब दिल्ली दुनिया का सोने का कटोरा थी
ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर से पहले, दिल्ली और हिन्दुस्तान की राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ इसकी आर्थिक स्वतंत्रता थी। इतिहास गवाह है कि उस समय तक हिन्दुस्तान की दौलत कभी देश की सीमाओं से बाहर नहीं गई। इसके विपरीत, मुगलों के शासनकाल में काबुल, बदख्शां और बलख जैसे क्षेत्र दिल्ली के राजनैतिक और व्यापारिक नियंत्रण में थे।
बाहर से आने वाले बहुमूल्य तोहफे और धन दिल्ली के कोष को भरते थे। यदि महमूद गजनवी, तैमूर या नादिरशाह जैसे लुटेरे यहाँ से धन ले भी गए, तो वह उस व्यापारिक लाभ के सामने कुछ भी नहीं था जो सदियों तक दिल्ली ने दुनिया से कमाया था। दिल्ली की पूंजी निरंतर बढ़ती रही और यह शहर दुनिया के सबसे अमीर शहरों की सूची में शीर्ष पर रहा।
सांप्रदायिक एकता का स्वर्णिम काल: मुगलों का राजपूती रक्त
एक बड़ा भ्रम यह फैलाया गया है कि मुगल शासन केवल एक विदेशी या धार्मिक शासन था। सत्य यह है कि अकबर के बाद से मुगल बादशाह आधे मुगल और आधे राजपूत थे। अंतिम बादशाहों की रगों में तो ७५% तक राजपूती खून दौड़ रहा था। उनकी सोच, परंपराएं, त्यौहार और व्यावहारिक दुनिया पूरी तरह हिन्दुस्तानी रंग में रंगी हुई थी।
दिल्ली के दरबार में हिन्दू मंत्रियों और वजीरों का प्रभाव इतना अधिक था कि उसे किसी भी मायने में ‘बाहरी शासन’ नहीं कहा जा सकता था। इतिहास के पन्नों को संकीर्ण मानसिकता वाले लेखकों ने काला जरूर किया है, जिससे हिन्दू-मुसलमानों के भाईचारे में कड़वाहट पैदा हो, लेकिन दिल्ली की मिट्टी गवाह है कि यहाँ के किसानों और व्यापारियों ने कभी इस भेदभाव को अपनी प्रगति के आड़े नहीं आने दिया। जब भी तख्तापलट हुआ, वह केवल दरबारियों और फौजियों तक सीमित रहा; आम आबादी ने हमेशा अपना जीवन शांतिपूर्ण तरीके से व्यतीत किया।
अंग्रेजी हुकूमत का उदय: एक डॉक्टर की फीस और साम्राज्य का अंत
अंग्रेजी हुकूमत का बीज दिल्ली में ही बोया गया और वह भी मुगलों के वैभव के बीच। साल १६१३ में जहांगीर के दरबार में सर टामस रो ने व्यापार की इजाजत मांगी। इसके बाद १६३४ में शाहजहाँ ने बंगाल में फैक्टरी बनाने की अनुमति दी। लेकिन सबसे निर्णायक क्षण १७१३ में आया, जब बादशाह फर्रुखशियर का इलाज डॉक्टर हैमिल्टन ने किया।
इनाम के तौर पर हैमिल्टन ने केवल यह चाहा कि अंग्रेजी कंपनी के माल पर ‘टैक्स’ माफ कर दिया जाए। दिल्ली के उस लाल किले में, जहाँ ढाई सौ साल पहले तक दुनिया के बड़े-बड़े राजा ‘तख्त-ए-ताऊस’ के सामने सिर झुकाते थे, वहीं से एक व्यापारिक रियायत ने धीरे-धीरे भारत की गुलामी की पटकथा लिख दी। आज उसी किले पर ब्रिटिश झंडा (कांग्रेस के संघर्ष से पहले तक) लहराने लगा था, जहाँ कभी ‘अदब से आँखें नीची रखो’ की सदाएं गूँजती थीं।
दिल्ली की शाश्वत परीक्षा
शाहजहाँनाबाद (वर्तमान पुरानी दिल्ली) १६४८ में बनकर तैयार हुई थी। दिल्ली का मिजाज अजीब है—इसे न शाहों से प्यार है, न शहंशाहों से। यह सबकी परीक्षा लेती है। जो इसकी तराजू में पूरा नहीं उतरता, उसे यह समय के उस बियाबान में धकेल देती है जहाँ से कभी आवाज वापस नहीं आती। दिल्ली मनुष्य के उस प्राकृतिक धर्म की गूँज है जिसका प्रारंभ और अंत ‘विप्लव’ और ‘क्रांति’ है। आज की दिल्ली उसी राजनैतिक विरासत को ढो रही है जिसका सीधा संबंध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक संघर्षों और देश की आजादी के आंदोलनों से है।
Q&A Section
Q. दिल्ली का ‘इन्द्रप्रस्थ‘ नाम किस राजनैतिक और धार्मिक घटना से जुड़ा है?
A- इन्द्रप्रस्थ का नाम इन्द्र देवता द्वारा किए गए ‘मोतियों के दान’ से जुड़ा है। ‘प्रस्थ’ का अर्थ दान देना है, जो इस स्थान की प्राचीन समृद्धि और राजनैतिक महत्व को दर्शाता है।
Q- दिल्ली का ‘उत्तर की ओर खिसकना‘ क्या दर्शाता है?
A: यह साम्राज्यों के विस्तार और सुरक्षा रणनीतियों को दर्शाता है। पृथ्वीराज चौहान से लेकर शाहजहाँ तक, हर शासक ने नई सुरक्षा और राजनैतिक जरूरतों के हिसाब से शहर को उत्तर की ओर बढ़ाया।
Q- मुगल शासन को ‘हिन्दुस्तानी हुकूमत‘ क्यों कहा जाना चाहिए?
उत्तर: क्योंकि अकबर के बाद मुगल बादशाहों में राजपूती खून का समावेश था और उनके दरबार की भाषा, संस्कृति और प्रशासन में हिन्दू मंत्रियों का अत्यधिक प्रभाव था।
Q-क्या दिल्ली की राजनीति हमेशा धर्मनिरपेक्ष रही है?
उत्तर: हाँ, गयासुद्दीन तुगलक जैसे शासकों ने स्पष्ट किया था कि धर्म और शासन दो अलग चीजें हैं। यह नीति शेरशाह और अकबर के काल में भी जारी रही।
Q- दिल्ली के लाल किले में ब्रिटिश प्रभाव की शुरुआत कैसे हुई?
उत्तर: १७१३ में बादशाह फर्रुखशियर के इलाज के बदले डॉक्टर हैमिल्टन ने व्यापारिक रियायतें प्राप्त कीं, जिसने अंततः अंग्रेजों को राजनैतिक शक्ति प्रदान की।
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