‘आज 22 अक्टूबर है और आज ही के दिन हमारे ‘लायन‘ दुनिया से गए थे‘: क्यों हीरो से ज़्यादा विलेन बनकर छा गए थे अजीत खान?
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
अजीत खान, हामिद अली खान, विलेन, बॉलीवुड, आज 22 अक्टूबर है और हिंदी सिनेमा के एक ऐसे दिग्गज कलाकार की पुण्यतिथि है, जिन्होंने अपनी दमदार आवाज़, सधी हुई अदाकारी और एक खास ‘सॉफिस्टिकेटेड विलेनी’ से दर्शकों के दिलों पर राज किया। यह नाम है – अजीत खान (Ajit Khan)। पर्दे पर उनके डायलॉग्स – “सारा शहर मुझे ‘लायन’ के नाम से जानता है” या “मॉर्गन, तुम्हें गोल्ड चाहिए” – आज भी सिने प्रेमियों की ज़ुबान पर ज़िंदा हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि अजीत का सफर हीरो बनने की चाहत से शुरू हुआ था और ज़िंदगी ने उन्हें एक ऐसा विलेन बना दिया, जिसे दर्शक हीरो से भी ज़्यादा पसंद करने लगे। 27 जनवरी 1922 को हैदराबाद रियासत के गोलकुंडा शहर में जन्मे हामिद अली खान कैसे बॉलीवुड के ‘अजीत’ बन गए, आइए जानते हैं उनकी संघर्ष, सफलता और यादगार किरदारों की अनसुनी कहानी।
गोलकुंडा से मुंबई तक का सफ़र: नाम था हामिद अली खान, जेब में थे सिर्फ 113 रुपये
अजीत का मूल नाम हामिद अली खान था। उनका जन्म 27 जनवरी 1922 को हुआ था। उनके पिता बशीर अली खान हैदराबाद के निजाम की सेना में कार्यरत थे। उनकी मां का नाम सुल्तान जहां बेगम था। उर्दू माहौल में पले-बढ़े हामिद अली खान को उर्दू के अलावा हिंदी, अरबी और तेलुगू भाषाओं का भी बेहतरीन ज्ञान था।
कॉलेज के साथी और भविष्य के प्रधानमंत्री
यह एक दिलचस्प और कम लोग जानते वाला तथ्य है कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव भी उसी कॉलेज में पढ़ते थे जहाँ अजीत पढ़ते थे। पीवी नरसिम्हा राव इनसे दो साल सीनियर थे और दोनों एक ही हॉस्टल में रहा करते थे।
प्रोफेसर की फटकार और मुंबई पलायन
हामिद अली खान का मन पढ़ाई से ज़्यादा खेलकूद और ड्रामा में लगता था। अंग्रेजी में वे विशेष रूप से कमज़ोर थे। एक बार उनके अंग्रेजी के प्रोफेसर ने तंग आकर उनसे कह दिया, “तुम या तो सेना में भर्ती हो जाओ या फिर फिल्मों में चले जाओ। पढ़ाई-लिखाई तो तुम्हारे बस की बात है नहीं।”
प्रोफेसर की इस बात ने हामिद को प्रेरित किया। अगले ही दिन उन्होंने अपनी सारी किताबें बेच दीं और घर से कुछ पैसे लिए। कुल 113 रुपए लेकर वे बिना किसी को बताए मुंबई भागकर आ गए। उन्हें लगा था कि मुंबई में थोड़ी-बहुत मेहनत से काम मिल जाएगा, लेकिन उनकी राह संघर्षों से भरी थी।
सीमेंट के पाइपों में गुज़री रातें
मुंबई में उन्हें तुरंत काम नहीं मिला। कई प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स के ऑफिसों के चक्कर काटने के बाद भी किसी ने उन्हें भाव नहीं दिया। हालात इतने खराब हो गए कि कई रातें उन्हें सड़क किनारे रखे बड़े-बड़े सीमेंट के पाइपों में गुज़ारनी पड़ीं, जहाँ उन्हें गुंडों से भी भिड़ना पड़ा।
हीरो से ‘अजीत‘ बनने तक का सफ़र
काफी संघर्ष के बाद, हामिद अली खान को फिल्मों में जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर काम मिलना शुरू हुआ। शुरुआती दिनों में उन्हें एक दिन के 3 रुपए से लेकर 6 रुपए तक मिलते थे।
प्रफुल्ल रॉय और ‘शाह-ए-मिस्र‘
फिर उनकी मुलाकात प्रफुल्ल रॉय से हुई, जिन्होंने उन्हें कुछ छोटे बजट की फिल्मों में लीड एक्टर के तौर पर काम दिया। इस दौर में उनका नाम हामिद अली खान ही चल रहा था।
किस्मत तब बदली जब वे गोविंद रामसेठी से मिले और ‘विष्णू सिनेटोन’ प्रोडक्शन हाउस पहुंचे। इस प्रोडक्शन हाउस ने उन्हें अपनी एक्शन फिल्म ‘शाह-ए-मिस्र‘ में लीड एक्टर चुना। इसके बाद उन्होंने ‘जन्मपत्री’, ‘हातिमताई’, ‘जीवनसाथी’ और ‘आपबीती’ जैसी फिल्मों में हीरो के तौर पर काम किया। 1950 में वे फिल्म ‘बेकसूर‘ में अभिनेत्री मधुबाला के हीरो बने।
‘हामिद अली खान‘ से ‘अजीत‘ बनने का किस्सा
हामिद अली खान को ‘अजीत’ नाम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के शुरुआती फिल्ममेकर के. अमरनाथ साहब ने दिया था। उन्होंने हामिद से कहा था कि उनका नाम बहुत लंबा है और लोगों की ज़ुबान पर चढ़ने में दिक्कत आती है, इसलिए उन्हें कोई छोटा और प्रभावशाली नाम रखना चाहिए। के. अमरनाथ साहब के साथ मिलकर उन्होंने अपना नाम ‘अजीत‘ फाइनल किया। हीरो के तौर पर अजीत ने अपने ज़माने की लगभग हर हीरोइन के साथ काम किया, सिवाय नूतन जी और नरगिस जी को छोड़कर।
विलेन बनकर मिली असली शोहरत: ‘लायन‘ का जन्म
हीरो के तौर पर काम करते-करते जब अजीत की उम्र ढलने लगी, तो उनके करियर में एक नया मोड़ आया। अभिनेता राजेंद्र कुमार ने उन्हें टी प्रकाशराव की फिल्म ‘सूरज‘ (1966) में विलेन का रोल ऑफर किया। अजीत ने उनकी बात मान ली और ‘सूरज’ में उनका विलेन का किरदार दर्शकों को इतना पसंद आया कि उनका ढलता हुआ करियर एक बार फिर उठ खड़ा हुआ।
इस बार वे हीरो नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के सबसे मशहूर विलेन के तौर पर मशहूर हो रहे थे।
सॉफिस्टिकेटेड विलेनी और यादगार फिल्में
अजीत ने विलेन के तौर पर एक नई शैली पेश की, जिसे सॉफिस्टिकेटेड विलेनी कहा जाता है। उनकी दमदार आवाज़, महंगे सूट और कम बोलते हुए भी अपनी बात मनवाने का अंदाज़ उन्हें बाकी विलेनों से अलग करता था।
बतौर विलेन उनकी यादगार फिल्में हैं:
- ज़ंजीर (1973): इसमें उनके ‘मॉर्गन’ के किरदार और डायलॉग्स ने उन्हें अमर कर दिया।
- यादों की बारात (1973): ‘मॉर्गन’ के डायलॉग्स की वजह से यह फिल्म भी काफी मशहूर हुई।
- कालीचरण (1976): “सारा शहर मुझे ‘लायन’ के नाम से जानता है।” यह डायलॉग आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित डायलॉग्स में से एक है।
इसके अलावा उन्होंने ‘पतंगा’, ‘आदमी और इंसान’, ‘पराया धन’, ‘लाल पत्थर’, ‘जुगनू’, ‘कहानी किस्मत की’, ‘खोटे सिक्के’, ‘वारंट’, ‘पाप और पुण्य’, ‘देस परदेस’, ‘चोरों की बारात’ और ‘आतिश’ जैसी 200 से भी ज़्यादा फिल्मों में काम किया।
अपने करियर में अजीत खान साहब ने एक हीरो से लेकर एक खलनायक तक का सफ़र बड़ी शान से तय किया और हमेशा के लिए हिंदी सिनेमा के इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ गए। आज, 22 अक्टूबर 1998, उनकी पुण्यतिथि पर हम उस महान अभिनेता को याद करते हैं, जिनकी आवाज़ और अंदाज़ ने दशकों तक दर्शकों का मनोरंजन किया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
| प्रश्न (Question) | उत्तर (Answer) |
| अजीत खान का असली नाम क्या था? | उनका असली नाम हामिद अली खान था। |
| अजीत खान का जन्म कहाँ हुआ था? | उनका जन्म 27 जनवरी 1922 को हैदराबाद रियासत के गोलकुंडा शहर में हुआ था। |
| अजीत खान के कॉलेजमेट कौन थे, जो बाद में प्रधानमंत्री बने? | देश के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव उनके कॉलेजमेट और हॉस्टल में उनके सीनियर थे। |
| अजीत खान को ‘अजीत‘ नाम किसने दिया था? | हिंदी सिनेमा के शुरुआती फिल्ममेकर के. अमरनाथ साहब ने उन्हें ‘अजीत’ नाम दिया था। |
| अजीत खान की पुण्यतिथि कब है? | अजीत खान की मृत्यु 22 अक्टूबर 1998 को हुई थी। इसलिए, 22 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि मनाई जाती है। |
| अजीत खान किस फिल्म में विलेन बनकर मशहूर हुए थे? | वे फिल्म ‘सूरज‘ (1966) में विलेन बनकर मशहूर हुए, जिसके बाद ‘ज़ंजीर’ और ‘कालीचरण’ ने उन्हें स्थापित किया। |
| अजीत खान मुंबई कैसे पहुंचे थे? | वे अपने प्रोफेसर की बात सुनकर अपनी किताबें बेचकर और मात्र 113 रुपए लेकर बिना किसी को बताए मुंबई भागकर आ गए थे। |
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