दीवाने खास के उत्तर में शाही हम्माम हैं। इन दोनों इमारतों के बीच में 47 फुट चौड़ा संगमरमर का फर्श है। हम्माम की इमारत की दक्षिणी दीवार के मध्य में दीवाने खास के मुकाबिले में तीन दर का हाल है, जो हम्माम की दयोदी है। इस इयोदी के दोनों ओर दो कमरे हैं, जिनके बीच में से हम्माम में दाखिल होते हैं। हम्माम में संगमरमर के फर्श के तीन बड़े कमरे हैं।

इन कमरों का फर्श, आधी-आधी दीवारें, हौज, पानी गर्म करने की जगह इन सब पर पहले रंग-बिरंगे कीमती पत्थर जड़े – हुए थे और बहुत सुंदर फूल-पत्तियां और गुलदस्ते बने हुए थे। दरिया की ओर के कमरे में पानी के लिए तीन हौज बने हुए हैं। पूर्वी दीवार में एक छोटी-सी संगमरमर की बालकनी है, जिसके हर तरफ एक-एक खिड़की है।

इसमें संगमरमर को जालियां लगी हैं। दूसरे कमरे में केवल एक ही हौज है और तीसरे कमरे में पानी गर्म करने का बहुत सुंदर गर्भा बना है, जिसके पीछे एक तवा लगा हुआ है, जहां से पानी गर्म होकर आता था। हम्माम में जगह-जगह नहरें दौड़ती थीं, फव्वारे लगे हुए थे, जिनसे हर कमरे में पानी पहुंचता रहता था। हम्माम में रोशनी आने के लिए धुंधले आइने लगे हुए थे।

तस्वीहखाने के दक्षिण में हम्माम है जिसमें जाने का दरवाजा दीवाने खास की पूर्वी दीवार के सामने है। हम्माम की इमारत के इधर-उधर जो कमरे हैं, कहते हैं कि वे साहबजादों के हम्माम थे। हम्माम की इमारत के तीन बड़े हिस्से हैं। पहला दर्जा दरिया की तरफ ‘जामा कुन’ कहलाता है। यहां कपड़े उतारे जाते थे या स्नान के बाद आकर बैठते थे और कपड़े पहनकर नाश्ता करते थे।

इसमें छोटे-छोटे हौजों में फव्वारे लगे हैं। एक में से गुलाब जल निकलता था। इसकी एक खिड़की में बड़ी बारीक काम की जाली लगी है और कुछ रंगीन आइने लगे हुए हैं। दूसरा दर्जा उत्तर की ओर है, जिसमें बैठने की चौकी है जो संगमरमर की बनी है और उस पर पच्चीकारी का काम किया हुआ है। इसके आगे एक कमरा है, जिसमें फर्श से लेकर छत तक तरह-तरह के पत्थर लगे हुए हैं, जैसे कालीन बिछा हो।

बीचोंबीच एक हौज है। चार कोनों पर चार फव्वारे लगे हैं, जिनकी धारें मिलकर हौज में गिरा करती थीं। दीवार से मिली हुई एक नहर बनी है। इस स्थान की यह खूबी है कि चाहे उसे ठंडा कर लें चाहे गर्म। तीसरा दर्जा, जिसके पश्चिम में गर्म पानी के संगमरमर के हौज बने हुए हैं, जिनमें सवा सौ मन लकड़ियां जलाई जाती थीं। इसके आगे एक चौकोर कमरा है, जिसके बीच में संगमरमर का चबूतरा है। इस पर बैठकर स्नान करते थे। उत्तर की ओर दूसरे दरजे की तरह हौज बने हैं, जिन्हें चाहे गर्म रखें चाहे ठंडा, यह खूबी है। यहां भी सब जगह मीनाकारी का काम हुआ है। हम्माम के हर दरजे में रोशनी रंगीन शीशों से आती थी। मुगल बादशाहों को हम्मामों का बड़ा शौक था। यहां बैठकर सल्तनत के बड़े-बड़े काम हुआ करते थे।

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