नादिर शाह ने जब 1739 ई. में दिल्ली पर कब्जा किया तो तख्त ताऊस को तोड़- ताड़कर सोना-चांदी और कुल जवाहरात लेकर वह चलता बना। बर्नियर ने इस तख्त को औरंगजेब के काल में देखा था, जो जश्न के मौके पर लोगों को दिखाया जाता था। उसने लिखा है : ‘इस तख्त के ठोस सोने के छह बड़े-बड़े भारी-भारी पाए थे, जिन पर लाल, जमुरुद और हीरे जड़े हुए थे।

जो बेशुमार अमूल्य रत्न इसमें जड़े हुए थे, उनके मूल्य का अनुमान इस कारण होना कठिन था क्योंकि तख्त के निकट किसी को जाने की हिम्मत नहीं थी कि उनकी गिनती कर सके या उनको देखकर कीमत का अंदाजा लगा सके। फिर भी कीमत का अनुमान चार करोड़ रुपये किया जाता है।’ इसे शाहजहां ने बनवाया था और इस कदर बेशकीमती जवाहरात इसमें इसलिए लगवाए थे, ताकि मुगलों की दौलत का लोग अनुमान कर सकें, कि जब तख्त में इतनी दौलत लगी है तो न जाने और कितनी दौलत उनके पास होगी।

इसमें जो दो मोर हैं, वे जवाहरात और मोतियों से लिपे हैं। ये एक फ्रांसीसी ने बनाए थे। तख्त के नीचे सभी उमरा अपने तड़क-भड़क वाले लिबासों में एक निचले तख्त पर जमा होते थे, जिनके चारों ओर चांदी का कटारा लगा था। इस पर किमखाब का शामियाना तना रहता था। भवन के खंभों पर किमखाब और जरी-बूटी की साटन लपेटी जाती थी। तमाम बड़े-बड़े कमरों के सामने शामियाने ताने जाते थे।

फर्श बेशकीमत कालीनों का होता था या लंबी-चौड़ी दरियों का भवन से मिला हुआ बाहर की तरफ एक शामियाना आधे सहन को घेर लेता था, जिसके गिर्द कनातें लगी रहती थीं। इन पर चांदी के पतरों के खोल चढ़े रहते थे। इस शानदार शामियाने का अबरा बिल्कुल सुर्ख और अंदर मछली बंदर की निहायत उम्दा छींट का अस्तर था।

शामियानों में तरह-तरह के झाड़ और फानूस की हांडियां रोशनी के लिए लटकाई जाती थीं। रात को जश्न महताबी होता था, जिसमें तमाम चीजें सफेद होती थीं। यह नौ दिन तक चलता था। अकबर सानी के जमाने में दीवाने खास की हालत इस कदर खराब हो गई थी कि लोग उसे देखकर अफसोस के साथ हाथ मला करते थे। जगह-जगह टूटे सामान का ढेर लगा रहता था। कबूतरों की बीटों से सब सामान खराब हो गया था।

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