दी यंगिस्तान, नई दिल्ली

जहांगीर के शासन काल में कबूतरबाजी को इश्कबाजी का नाम भी दे दिया गया था। शायद इसकी वजह जहांगीर का नौजवानी में अपना इश्क और कबूतरों के माध्यम से प्रेमपत्र भेजना भी था। शाहजहां को भी कबूतरों का बड़ा शौक था और उसने बाहर के देशों से बड़े-बड़े नामवर कबूतर सधाने और उड़ाने वाले उस्तादों को दिल्ली बुलवाया था। बुखारा से अली कुली आए, समरकंद से मसीह ख़ां, बल्ख से हाजी कासिम, शीराज से हबीब शीराजी। ये सब बादशाह के कबूतरखाने में नौकर थे। जैसे ही बादशाह की सवारी महल से निकलती, महल के पहरेदारों का दरोगा वक्त और मौसम को देखकर एक रंगीन कबूतर हवा में उड़ा देता। इस तरह से सब वज़ीरों और अहलकारों को बादशाह के महल से बाहर आने की ख़बर मिल जाती।

बहादुरशाह जफर के काल में सैयद वारिस अली शाही कबूतरबाज थे। उन्होंने दो सौ कबूतरों की एक टुकड़ी तैयार की थी। जब बादशाह सलामत अपने मौला बा नाम के हाथी पर सवार होकर लाल किले से नमाज पढ़ने ईदगाह जाते थे तो वारिस अली अपने सारे कबूतरों को हैकाकर उड़ा देते थे। कबूतर सवारी के पीछे-पीछे क़तार-दर-क़तार उड़ते थे और बादशाह की सवारी पर साया कर लेते थे। ये एक-दूसरे के इतना क़रीब होकर उड़ते थे कि एक छोटा-सा बादल बन जाते थे और बादशाह को सूरज की चमक और धूप से बचाए रखते। इन कबूतरों की उड़ान का यह कमाल भी बताया जाता है कि सवारी से जरा दूर होकर उड़ते ताकि हाथी पर सवार बादशाह या फीलवान के कपड़े ख़राब न हों। ये कबूतर अंत तक शाही सवारी पर साया किए उड़ते रहते।

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