ब्रितानिया हुकूमत के दौरान दिल्ली के रेजिडेंट सर थॉमस मेटकाफकी शादी बहुत कामयाब थी लेकिन उसकी बीवी फैलिसिटी की सितंबर 1842 में एक अंजान बुखार की वजह से अचानक मृत्यु हो गई। उस समय उनकी उम्र सिर्फ चौंतीस साल थी। अगले दस साल तक जब तक उनके छह बच्चे इंग्लैंड के बोर्डिंग स्कूल में थे वह अपने गम के साथ तन्हा निबटते रहे और जब उनके बच्चों ने हिंदुस्तान वापस आना शुरू किया, तब उनकी आदतें पुख्ता हो चुकी थीं। उनको महसूस हुआ कि उनके पिता वक़्त की पाबंदी और सही बर्ताव के इतने आदी हो चुके हैं कि वह अपने कार्यक्रम में किसी तरह की तब्दीली बर्दाश्त नहीं कर पाते थे और इसके बाद 1850 के दशक के आरंभ तक उसकी आदत इतनी पुख्ता हो चुकी थीं जैसे पत्थर की लकीर । उसकी बेटी एमिली लिखती है:

वह हमेशा सुबह सवेरे पांच बजे उठते थे और अपना ड्रेसिंग गाउन पहनकर बरामदे में छोटा हाजरी (छोटा नाश्ता) के लिए जाते। फिर वहां वह टहलते रहते और विभिन्न नौकर उनसे दिनभर के लिए निर्देश लेने आते। ठीक सात बजे वह नीचे नहाने की हौज में जाते जो उन्होंने बरामदे के निचले कोने पर बनवाई थी। फिर वह तैयार होकर गिरजा के कमरे में जाकर दुआएं पढ़ते और आठ बजे नाश्ता करने के लिए तैयार होते।

हर चीज में वक्त की पूरी पाबंदी की जाती और सारा घर जैसे घड़ी की चाल से चलता। नाश्ता खत्म होते ही उनका हुक्का आ जाता और उनकी कुर्सी के पास रख दिया जाता… आधे घंटे में वह हुक्का पीना खत्म करके अपने दफ्तर में जाकर खत लिखते जब तक उनकी गाड़ी न आ जाती, जो हमेशा ठीक दस बजे लग जाती थी। वहां तक जाते हुए वह नौकरों की कतार के सामने से गुजरते। एक उनकी टोपी लिए होता, दूसरा उनके दस्ताने, तीसरा उनका रूमाल और उनके सोने की मूठ वाली छड़ी, और कोई फाइलों का डिब्बा। यह सब गाड़ी में रख दिए जाते और उनका जमादार सामने कोचवान के पास बैठ जाता। फिर गाड़ी रवाना हो जाती,  जिसके पीछे दो रईस खड़े होते।”

खानदान के न होने की वजह से और सोसाइटी का शोरो-गुल नापसंद होने से मैटकाफ के मिजाज में कोई नर्मी न थी। लिहाजा उसने अपने आपको काम में मशगूल कर लिया। खासकर विरासत के मसले पर जिससे कंपनी शाही खानदान को ज़फ़र के इंतकाल के बाद लाल किले से निकाल सके। उसको उस आदमी से थोड़ी सी हमदर्दी ज़रूर थी, लेकिन इज़्ज़त बिल्कुल नहीं, जिनको तैमूर की नस्ल का वह आखरी बादशाह बनाने पर तुला हुआ था। जफर के सामने तो वह उनसे बहुत इज्जत से पेश आता और उनको खत में भी “मेरे शाही आला मर्तबत दोस्त” लिखता और यह कि “मैं बादशाह की बेहद इज़्ज़त करता हूं और अपने को जहांपनाह का सच्चा दोस्त समझता हूं।

 लेकिन पीठ पीछे वह इतना हमदर्द नहीं था। उसने एमिली को लिखा “जफर नर्म और प्रतिभाशाली हैं लेकिन प्राकृतिक रूप से कमजोर और दुविधापूर्ण और अपनी अहमियत के गलत अहसास का शिकार, जिसकी वजह से खुद शर्मिंदगी उठाना पड़ती है और स्थानीय प्रशासन को परेशानी।

लेकिन मैटकाफ का दिल्ली और उसके बादशाह के बारे में रवैया इतना स्पष्ट न था जैसा इस ख़त से महसूस होता है। उसे अपने बादशाह के दिए हुए फारसी के ख़िताबों पर बहुत फख था, और उसने उनको बहुत खुशखती में लिखवाकर उनका एक एलबम बनवा लिया था। उसके पूरे अल्काब जो वह अक्सर अपनी खतो-किताबत में इस्तेमाल करता था, इस तरह थे; “साहिबे-वाला, मनकूब-आली मंसब, फ़र्ज़दे-अरजुमंद, पैवंदे-सुल्तानी, मोअज़्ज़मुद्दौला, अमीनुल मुल्क, सर थॉमस मैटकाफ, बैरन बहादुर, फीरोज़ जंग, साहब कलां बहादुर ऑफ शाहजहानाबाद।”

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