पढ़ें दिल्ली के इतिहास से जुड़े अनसुने किस्से
दी यंगिस्तान, नई दिल्ली।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दिल्ली केवल एक राजनीतिक केंद्र नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता की प्रयोगशाला रही है। 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में, जब अंग्रेज फूट डालो और राज करो की नीति के जरिए भारत को बांटने की कोशिश कर रहे थे, तब दिल्ली के नागरिकों ने भाईचारे की ऐसी मिसाल पेश की जिसने इतिहास का रुख बदल दिया। 1912 से 1918 के बीच दिल्ली में जो एकता देखी गई, वह किसी चमत्कार से कम नहीं थी। जामा मस्जिद की सीढ़ियों से लेकर चांदनी चौक की गलियों तक, इंकलाब के नारों में मंदिर की घंटी और मस्जिद की अज़ान का साझा सुर सुनाई देता था। हकीम अजमल खां और डॉ. अंसारी जैसे नेताओं ने यह साबित किया कि जब तक दिल्ली एक है, तब तक हिंदुस्तान को कोई गुलाम नहीं रख सकता।
डॉ. अंसारी का प्रभाव
1912 में जब डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी दिल्ली आए, तो उन्होंने राजनीति को एक मानवीय और अंतरराष्ट्रीय चेहरा दिया। तुर्की के युद्ध (Tripoly War) के दौरान उन्होंने ‘हिलाले-अमर’ (रेड क्रिसेंट) आंदोलन के जरिए तुर्कों की मदद के लिए एक मेडिकल मिशन भेजा। इस मिशन ने न केवल मुसलमानों बल्कि हिंदुओं के मन में भी साम्राज्यवाद के खिलाफ नफरत पैदा की। मौलाना मोहम्मद अली के अखबार ‘कामरेड’ और ‘हमदर्द’ ने दिल्ली के हर घर तक यह संदेश पहुँचाया कि जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना ही असली धर्म है।
1917 का रामलीला विवाद: एकता की अग्निपरीक्षा
हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे बड़ा इम्तिहान 1917 में हुआ। उस साल रामलीला और मोहर्रम एक ही समय पर थे। ब्रिटिश सरकार ने सांप्रदायिक दंगों की आशंका जताते हुए रामलीला के पारंपरिक रास्ते पर रोक लगा दी। अंग्रेजों को उम्मीद थी कि इससे दोनों समुदाय आपस में लड़ेंगे। लेकिन दिल्ली की जनता ने इतिहास रच दिया। हकीम अजमल खां ने अपने घर पर प्रमुख मुसलमानों को इकट्ठा किया और प्रस्ताव पास किया कि “रामलीला पुराने रास्ते से ही निकलनी चाहिए और मुसलमान उसमें हर संभव मदद करेंगे।” जब सरकार फिर भी नहीं मानी, तो हिंदुओं ने विरोध स्वरूप उस साल रामलीला नहीं निकाली। इस त्याग और आपसी समर्थन ने अंग्रेजों की साजिश को नाकाम कर दिया।
गांधी और गोखले का दिल्ली आगमन
1913 में गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी दिल्ली आए। संगम थिएटर में उनका वह भाषण आज भी याद किया जाता है जिसने दिल्ली के युवाओं को अहिंसा और सत्याग्रह का नया पाठ पढ़ाया। गांधीजी, जो उस समय उतनी अच्छी उर्दू नहीं जानते थे, उन्होंने दिल्ली वालों से वादा किया कि अगली बार वे उर्दू में बात करेंगे। यह एक नेता का अपनी जनता के प्रति प्रेम और एकता का संदेश था। गांधीजी की मौजूदगी ने दिल्ली के हिंदू और मुस्लिम रजाकारों (स्वयंसेवकों) को एक ही तिरंगे के नीचे ला खड़ा किया।
होमरूल लीग और साझा संघर्ष
दिल्ली में जब होमरूल लीग सक्रिय हुई, तो इसमें डॉ. अंसारी, सरदार नानक सिंह और आसफ अली जैसे नेता एक साथ आए। सीआईडी की कड़ी निगरानी के बावजूद दरीबा कलां स्थित लीग के दफ्तर में हिंदू और मुस्लिम युवा साथ मिलकर रणनीति बनाते थे। अंग्रेजों ने इस एकता को तोड़ने के लिए प्रेस रजिस्ट्रेशन एक्ट और डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट का सहारा लिया। आसफ अली और पंडित नेकीराम शर्मा को भाषण देने से रोका गया और गिरफ्तार किया गया, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर “अल्लाह-हु-अकबर” और “वन्दे मातरम” के नारे एक साथ गूंजते रहे।
1918 का कांग्रेस अधिवेशन: एकता का महाकुंभ
दिसंबर 1918 में दिल्ली में पहली बार इंडियन नेशनल कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। यह दिल्ली के इतिहास का स्वर्ण काल था। हकीम अजमल खां स्वागत समिति के अध्यक्ष थे। चांदनी चौक के पत्थर वाले कुएँ के मैदान में एक विशाल पंडाल सजाया गया, जहाँ 15,000 से अधिक लोग जुटे। डॉ. अंसारी का भाषण इतना प्रभावशाली था कि सरकार ने उसे तुरंत जब्त कर लिया। इस अधिवेशन ने यह संदेश दिया कि दिल्ली अब केवल मुगलों या अंग्रेजों की नहीं, बल्कि उन भारतीयों की है जो अपने धर्म से ऊपर देश को रखते हैं।
दिल्ली की यह हिंदू-मुस्लिम एकता कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह सालों के साझा संघर्ष और बलिदान का परिणाम थी। आज की राजनीति के दौर में 1917 की रामलीला और 1918 के कांग्रेस अधिवेशन के सबक और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि दिल्ली की असली शक्ति उसकी विविधता में है। यदि हम अपने पुरखों के दिखाए इस एकता के रास्ते पर चलें, तो कोई भी शक्ति भारत के विकास को नहीं रोक सकती।
Q&A Section
प्रश्न: 1918 के दिल्ली कांग्रेस अधिवेशन की मुख्य विशेषता क्या थी?
उत्तर: यह दिल्ली में होने वाला पहला कांग्रेस अधिवेशन था, जिसमें रिकॉर्ड 15,000 लोग शामिल हुए थे और हकीम अजमल खां स्वागत समिति के अध्यक्ष थे।
प्रश्न: ‘हेलीईज्म‘ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: दिल्ली के तत्कालीन चीफ कमिश्नर मिस्टर हेली की दमनकारी नीतियों को ‘बम्बई क्रॉनिकल’ ने ‘हेलीईज्म’ का नाम दिया था।
प्रश्न: लाला हरदयाल का दिल्ली की राजनीति में क्या योगदान था?
उत्तर: लाला हरदयाल क्रांतिकारी विचारों के प्रणेता थे। उन्होंने सरकारी छात्रवृत्ति छोड़कर युवाओं को स्वराज के लिए प्रेरित किया और लार्ड हार्डिंग बम केस में उनका नाम चर्चा में आया।
प्रश्न: 1917 में रामलीला क्यों नहीं निकली थी?
उत्तर: ब्रिटिश सरकार द्वारा पुराने पारंपरिक रास्ते पर रोक लगाने के विरोध में हिंदुओं ने उस वर्ष रामलीला नहीं निकालने का निर्णय लिया था।
प्रश्न: डॉ. अंसारी के किस भाषण को अंग्रेजों ने जब्त किया था?
उत्तर: 1918 के दिल्ली अधिवेशन में स्वागत समिति के अध्यक्ष के रूप में दिए गए उनके ओजस्वी भाषण को सरकार ने जब्त कर लिया था।
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