दिल्ली के लाल किले में पान की गिलौरियां चार तरह की होती थीं। समोसा गिलौरी, लक्ष्मी गिलौरी, ताबीजी गिलौरी और बीड़ा पान इस तरकीब से खाया जाता था कि पूरे पान पर कत्था चूना लगा देते थे और पानदान में या पानी की डिविया में खद्दर के गीले कपड़े में बांध कर रख लेते थे। जब खाने की इच्छा हुई तो एक टुकड़ा निकालकर खा लिया। कत्था चूना इतनी एहतियात से लगाया जाता था कि पान पर हर जगह एक-सा होता था। पान जाड़े, गर्मी, बरसात यानी मौसम के हिसाब से बनाया जाता था। जाड़े का पान ऐसा होता था कि खाते ही बदन में गरमी दौड़ जाती। थी और पेशानी पर पसीना फूट पड़ता था। गर्मियों में पान ठंडक पहुंचाते और बरसात में दिल को सुकून ये सब अमीरों के चोंचले थे। लेकिन पान फ़कीरों, दरवेशों और खानाबदोशों की भी सौगात रहा।

बदन पर नहीं लत्ता पान खाए अलबत्ता

किसी शायर ने कहा है कि –

क्या करूं खानाबदोशी में

कदर मेहमान की गिलौरी पान की।

लीजिए डिबिया कि हाज़िर है

गिलौरी पान की

जमाने गुजर गए लेकिन पान के बारे में कुछ कहावतें और रस्में अभी तक चली आ रही हैं। भानजे-भानजी के ब्याह में विदाई के वक्त बहन के रिश्तेदारों और औरतों को नकदी देने की रस्म को ‘ताम्बुल’ या ‘तम्बुल’ कहा जाता है। जब लड़के को लड़की का पिता सात पानों का बीड़ा भेजता है तो समझो बात पक्की हो गई। मुसलमानों में दूल्हे मियां घोड़ी पर सवार होकर, दुल्हन को डोले में बिठाकर रुखसत करा के लाते हैं तो बहुत से सड़कों के सिरों पर दहेज का सामान होता है उसमें पानदान और उगालदान भी होते हैं। एक समय था कि दिल्ली के चौक, चौराहों और गली-कूचों में फेरीवाले और सौदा बेचने वाले जो कुछ बेचते, ऊंची आवाज से गाकर बेचते। उनमें पनवाड़ी और पनवाहिनें भी होतीं। पनवाहिनें अलबत्ता न आवाज देती, न गातीं उनके लगे-बंधे घर होते और वे उनमें जाकर औरतों में पान बेच देतीं। पनवाड़ी अपनी ख़ास आवाज में लहक- लहक कर गाता-

ले लो पान की गिलौरी

गोरी के लिए गिलौरी

हरा हरा पान है

लाल-लाल शान है

बदख्शां की दुकान है

यह पान है यह पान है

ले लो गोरी के लिए गिलौरी

एक चुटकुला भी प्रसिद्ध

पान के बारे में एक चुटकुला सुनिए- एक बार कोई अजनबी दिल्ली आया । इधर-उधर घूमता रहा और थक-हार कर एक पान की दुकान पर खड़ा हो गया। उसने बहुत से लोगों को पान खाते देखा। जब भीड़ छंटी तो उसने पान लिया और उसके बाद पान पर पान खाना शुरू कर दिया। पनवाड़ी पान बनाता रहा और अचंभे से उसे देखता रहा। अजनबी ने बहुत से पान खा लिए और पेट भर गया तो पैसे देकर चलता बना। दूसरे दिन पनवाड़ी ने उस अजनबी को अपनी दुकान से कन्नी काटकर जाते देखा तो आवाज दी, “ऐ हुजूर, पान तो खाते जाइए।” अजनबी ने मुड़कर जवाब दिया, “आज नहीं। आज तो मैं रोटी खाकर निकला हूं।” इस चुटकुले को सुनकर बड़ों का कहा याद आ गया कि पान खाने के लिए सलीक़ा चाहिए। यह नहीं कि बकरी की तरह पेट भरने के लिए चबड़-चबड़ चबाते जाइए। पान न हुआ पीपल का पत्ता हो गया।

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