उर्दू थियेटर को ही पारसी थियेटर भी कहा जा सकता है। इनके ‘बाइस्कोप’ को आर्थिक सहयोग देने में ‘चवन्नी वाले’ दर्शकों का ही हाथ था। दर्शकों का यह वर्ग हाल में भरा रहता था और हालांकि उनका टिकट सबसे कम होता था, मगर नाटक वालों को सबसे ज्यादा आमदनी ‘चवन्नी वालों’ से ही होती थी। इसलिए थियेटर के मालिक और नाटक का निर्देशक उनकी रुचि और पसंदीदगी की चीजें नाटक में जगह-जगह भरते थे, चाहे उन चीज़ों का नाटक से सीधा संबंध न होता। ‘चवन्नी वालों’ के लिए तमाशे में कई जगह अश्लील मजाक, घटिया दर्जे की बातें और छेड़छाड़ रख दी जाती थी जिन्हें देखकर और सुनकर वे बहुत प्रसन्न होते थे।

दिल्ली में उन दिनों नाटक देखने का शौक सबको था- शहर के कोतवाल को भी। कोतवाल को कंपनी की तरफ से हर नाटक का पास भिजवा दिया जाता था। वैसे बिना पास के भी जिस रोज और जब चाहे तमाशा देखने आ सकता था। उसे हमेशा सबसे अगली लाइन में एक मुख्य स्थान पर बिठाया जाता था और अगर कोई कुर्सी खाली न होती या तो किसी को पीछे भेज दिया जाता था या उसके लिए एक ख़ास कुर्सी मंगवाकर रख दी जाती थी। आमतौर पर शहर कोतवाल कंपनी का विशिष्ट अतिथि होता था और जिस रोज वह मौजूद होता तो, खेल के मध्यांतर में अधिक रोचक हास्य कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते थे और अक्सर कोतवाल को खुश करने के लिए उसका जिक्र भी किसी-न-किसी रूप में अभिनेता कर देता था। इंटरवल में आमतौर से मालिक और मैनेजर शहर कोतवाल के पास जाते और उसकी लेमन ‘वगैरा से खातिर की जाती।

उन दिनों यह भी रिवाज था कि एक आदमी नाटक के संवादों की पूरी किताब हाथ में लिए मंच से छिपा बाएँ या दाएँ तरफ़ खड़ा रहता और अभिनेताओं की सहायता के लिए संवाद बोलता रहता था ताकि कोई अभिनेता किसी जगह पर संवाद भूल जाए तो उसे सुनकर याद आ जाए अगली एक-दो पंक्तियों में बैठे हुए दर्शक अक्सर उस आदमी को देख सकते थे, मगर किसी को ख़याल भी नहीं होता था, क्योंकि वह आदमी नाटक के मंच का एक हिस्सा होता था। बाजे वाला और तबले वाला भी आमतौर पर आगे की तरफ़ एक कोने में बैठे रहते थे। वे भी आपस में कुछ बात करते तो अगली पंक्ति वाले सुन लेते। कई बार तो बाजे-तबले वाले अगली पंक्ति में बैठे हुए लोगों से दियासलाई माँगकर अपनी बीड़ी-सिगरेट भी सुलगा लेते थे।

हकीकत तो यह थी कि उन दिनों मंच की तकनीकी और दूसरी आवश्यकताओं की ओर अधिक ध्यान भी नहीं दिया जाता था। उदाहरण के लिए कोई अभिनेता जो दृश्य में है, मगर अभी उसके बोलने की बारी नहीं आई, तो किसी जरूरत से अंदर चला जाता और फिर आ जाता। एक बार एक दृश्य में देवकी अपने संवाद बोल रही थी और कंस एक कोने में खड़ा था कि उसने अपना वक़्त गुजारने के लिए अपने आपसे कुछ-कुछ बोलना शुरू कर दिया, जिसका नाटक से कोई संबंध नहीं था। शायद उसका खयाल था कि दर्शकों तक उसकी आवाज नहीं जाएगी। मगर अगली पंक्ति वालों ने तो उसकी बहुत-सी बेहूदा बातें सुन ली थीं।

समय बीतने के साथ-साथ पारसी थियेटर का पतन शुरू हो गया। उसका स्थान बायस्कोप ने ले लिया और मूक फिल्मों का जादू चलने लगा। ‘चवन्नी वाले’ अब बायस्कोप के मंडवे में सबसे आगे दरी या बेंचों पर बैठते थे। बिल्कुल नई चीज होने की वजह से लोगों के झुंड के झुंड बायस्कोप देखने जाने लगे। एस्टन सिनेमा (जिसका नाम नावेल्टी पड़ा) और रॉयल सिनेमा (जो पहले बनारसी कृष्णा थियेटर था बायस्कोप के मंडवों ओर हॉलों में टिकट हासिल करने के लिए खूब धक्केबाजी होती थी।

मगर दिल्ली वालों का नाटक का शौक पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ। कुछ शौक़ीन लोगों ने अपने ड्रामा ग्रुप बना लिए और ड्रामों को स्कूलों की इमारतों और धर्मशालाओं में खेला जाने लगा। हर कॉलेज में एक ड्रामा क्लब क़ायम हो गया और इन क्लबों ने मशहूर लेखकों के सामाजिक ऐतिहासिक नाटक स्टेज करने शुरू कर दिए। जिन लोगों ने दिल्ली में आधुनिक नाटक की शुरुआत की उनमें सेंट स्टीफेंस कॉलेज के प्रोफ़ेसर इश्तियाक़ हुसैन कुरैशी और हिन्दू कॉलेज के प्रोफ़ेसर बालकृष्णदास अग्रणी थे। प्रो. कुरैशी न केवल बढ़िया नाटक लिखते थे, बल्कि उनका निर्देशन भी करते थे। उनके नाटक ‘हमजाद’, ‘सैद-ए-जुबूँ’ और ‘नक़्श-ए-आखिर’ बहुत मशहूर हैं। उन दिनों कॉलेज के नाटकों में लड़कियों की भूमिका भी लड़के ही करते थे। प्रो. बालकृष्ण दास भी नाटक के विकास और विद्यार्थियों में अभिनय की रुचि उत्पन्न करने के लिए हमेशा कोशिश करते रहे। उन्हें उर्दू नाटक से बड़ा प्रेम था।

उनके जमाने की एक घटना का उल्लेख अप्रासंगिक न होगा। उनका एक नाटक शुरू होने वाला था, मगर कुछ देर पहले ही एलची का पार्ट करने वाला अभिनेता अचानक बीमार पड़ गया। प्रोफ़ेसर बालकृष्ण दास ने परदा खींचने वाले विद्यार्थी से कहा कि बीमार अभिनेता के बदले यह पार्ट करे। विद्यार्थी घबरा गया । क्योंकि यह स्टेज पर जाने से डरता था। उसने प्रोफेसर साहब से हाथ जोड़कर माफी माँगी कि उसे पार्ट करने के लिए मजबूर न किया जाए। लेकिन प्रोफेसर साहब ने उसे डॉटकर पार्ट अदा करने का हुक्म दिया तो वह मान गया। जब वह परदा खींचने वाला विद्यार्थी एलची के तौर पर राजा के दरबार में पहुँचा तो राजा कड़ककर बोला, “तुम किसके हुक्म से मेरे महल में आ गए?” बदले में काम करने वाला अभिनेता घबरा गया और बदहवास होकर बोला, “मैं तो हरगिज़ यहाँ नहीं आना चाहता था, मगर क्या करूँ प्रोफ़ेसर बालकृष्ण दास साहब ने जबरदस्ती मुझे भेज दिया।”

कोई भी दौर और सभ्यता स्थायी नहीं होती। दिल्ली का वह दौर जब मंडवे या हॉल पर किसी लोकप्रिय उर्दू के तमाशे पर दिल्ली की जनता टूट पड़ती थी; इतिहास के गर्भ में विलीन हो गया है। ‘चवन्नी वाले’, जिनका उन खेलों से गहरा संबंध था, अब सिर्फ यादों का हिस्सा बन गए हैं। उर्दू ड्रामा वैसे तो अब भी जिन्दा है और दिल्ली के कई ड्रामा ग्रुप समय-समय पर उर्दू के उम्दा नाटक प्रस्तुत करते हैं, मगर नाटकों का स्वरूप बदल गया उनकी भाषा बदल गई है। मनोरंजन की जगह मस्तिष्क ने ले ली है और आज का नाटक जनसाधारण का न रहकर, उच्च वर्ग का बन गया है।

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