-तीसरी पीढ़ी चला रही दुकान, बेमिसाल स्वाद अब भी बरकरार

दिल्ली..जायकों का शहर है। हर गली-नुक्कड़ पर जायके की विविधता इसे बाकि शहरों से अलग बनाती है। यही वजह है कि स्वाद के शौकीनों को यह खूब भाती है। स्वाद की बात हो और कचौड़ी का जिक्र ना हो तो बात बेमानी लगती है। राजधानी की गुलाबी ठंडक में करारे कचौड़ी का स्वाद सर्दी का मजा दोगुना कर देता है। कहीं दाल की पिठठी भरी-देशी घी में तली कचौड़ी तो कहीं छोले और आलू वाली कचौड़ी तो कहीं किसी जगह हरी चटनी के साथ चटकारे लेकर आपने कचौड़ी खायी होगी। लेकिन सिविल लाइंस स्थित फतेह चंद की कचौड़ी की बात ही निराली है। कचौड़ी में न तो दाल की पिठठी भरी है न ही ये मोटी, गोल, देशी घी में तली है। यह कचौड़ी मठरा स्टाइल में है।

संदूकची से शुरू हुआ सफर

फतेहचंद के पोते नंदकिशोर बताते हैं कि फिरंगियों की हुकूमत के दौरान की बात है। यही करीब सन 1940 का। स्व. फतेहचंद मूलरूप से बंदायू के रहने वाले थे। दिल्ली में अपना बिजनेस शुरू करने के मकसद से आए थे। संदूकची में मटरा (जिसे अब छोले बोलते हैं) लेकर सिर पर ढोया करते थे। इधर-उधर पैदल घूमते, मटरा बेचते। फिर धीरे-धीरे उन्होंने गुजराती समाज स्कूल, सिविल लाइन्स, दिल्ली को अपना ठौर बनाया। संदूकची को सड़क के किनारे रखकर बच्चों को मटरा बेचना शुरू कर दिया। यानी पैदल घूमना बंद हो चुका था, खड़े होकर मटरा बेचने लगे। असल में वहां 4-5 स्कूल थे। बच्चे झुंड में आने लगे थे। जैसे ही स्कूल की छुट्टी होती थी दादाजी कुर्ते की बाजूओं को ऊपर करके मटरा बेचना शुरू कर देते। महज 10 पैसे में मिल रहा मटरा बच्चों के बीच लोकप्रिय हुआ तो फतेहचंद ने इसे आगे बढ़ाने की सोची और फिर साइकिल ली। सन 1960 तक उन्होंने कचौड़ी के साथ छोले-कुल्चे रोल भी बेचने शुरू कर दिए थे। 1990-2000 के बीच अपने स्वाद को जिंदगी देकर खुद दुनिया से विदा हुए।

खुल चुकी हैं चार दुकानें

नंद किशोर बताते हैं कि फतेहचंद के बाद उनके पिता हरी चंद ने दुकान सम्हालनी शुरू की। अब फतेहचंद नाम से चार दुकानें है। दरअसल, लुडलो कैसल स्कूल के पीछे फतेहचंद की बेटी के तीन लड़के महीने में दस-दस दिन के अंतर पर दुकान लगाते हैं जबकि बेटे हरी चंद के बेटे नंद किशोर 13 राजपुरा रोड पर फतेहचंद कचौड़ी नाम से दुकान चलाते हैं।

स्वाद लाजवाब

फतेहचंद की कचौड़ी बहुत ही क्रिस्पी होती है। बाकि जगहों पर आलू के साथ कचौड़ी दी जाती है लेकिन यहां मटर के साथ दी जाती है। लेकिन कचौड़ी के स्वाद के पीछे असली वजह तो मठरी के उपर सर्व किए जाने वाले मटर के बॉयल दाने, अदरक, प्याज, धनिया, मसाले और मीठी चटनी है। नंद किशोर कहते हैं कि मसाले बहुत ही स्पेशल होते हैं। इन्हें हम घर पर ही बनाते हैं। यही वजह है कि ये लोगों को खूब पसंद आते हैं। अब यहां रोल भी मिलने शुरू हो गए हैं। दुकान खुलने के बाद से ही भीड़ लग जाती है। बताते हैं कि राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत भारत के विभिन्न राज्यों से लोग कचौड़ी का स्वाद चखने आते हैं। कई फाइव स्टार होटल भी अपने यहां बुलाते हैं। विदेशों तक से पर्यटक आकर यहां कचौड़ी का स्वाद चखते हैं।

स्कूल से पढ़े बच्चों की फेवरिट दुकान

नंद किशोर कहते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन समेत सेंट जेवीयर स्कूल व पास स्थित चार अन्य स्कूलों से पढ़े बच्चों का यह अब भी ठौर बना हुआ है। हफ्ते-महीने में यहां कचौड़ी खाने जरूर आते हैं। दिसंबर महीने में ही स्कूल में एक बड़ा फंक्शन आयोजित किया जा रहा है। जहां विशेष रूप से कचौड़ी की दुकान लगाने का आग्रह किया गया है।

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