साहित्य और संस्कृति प्रेमियों का मठ है मंडी हाउस (mandi house) , जिसके ठीक बगल में हैं दिल्ली का लोकप्रिय, सक्रिय और उत्साह से भरपूर बंगाली मार्केट। राजधानी के सबसे पहले विकसित हुए आवासीय इलाकों से घिरे इस मार्केट में पूरे दिन लोगों की चहल-पहल रहती है। खाने-पीने की तमाम दुकानों के कारण चारों तरफ मिठाइयों की खुशबू फैलती रहती है, जिससे गुजरते हुए किताब-कापियों की खुशबू का एहसास लेने वाले पहुंचते हैं मार्केट की वर्षों पुरानी व एक मात्र किताब दुकान ‘न्यू जनता बुक डिपो’ पर। वर्ष 1966 में इस दुकान को स्थापित करने वाले हरिश्चंद्र गुप्ता की पूरी जिंदगी किताबों के चारों ओर ही बीती और कुछ उसी तरह उनके पुत्र मुकेश गुप्ता ने भी खुद को किताबों की दुनिया से जोड़ लिया। वर्तमान में गुप्ता परिवार की तीसरी पीढ़ी से सिद्धार्थ व तरुण गुप्ता इस व्यवसाय के विस्तार में अपना हाथ बंटा रहे हैं।

करीब पांच दशक पुरानी है दुकान :

दुकान की स्थापना को लेकर संचालक सिद्धार्थ गुप्ता कहते हैं कि उनका परिवार मूल रूप से गांव दौलताबाद (गुरुग्राम, हरियाणा) से है। वर्ष 1940 में उनके दादा जी स्व. हरिश्चंद्र गुप्ता दिल्ली के करोल बाग स्थित रैगर पुरा आ गए। वहां उन्होंने मिठाई की दुकान खोली। उन्हीं दिनों बंगाली मार्केट की स्थापना हुई थी। यहां कुछ प्रसिद्ध मिठाई की दुकानें थीं, जिनकी लोकप्रियता का यह आलम था कि काउंटर के बाहर राजनेताओं से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों की लंबी लाइनें लगी रहती थी। दादा जी की भी बड़ी इच्छा थी कि इस बाजार में उनकी एक दुकान हो। यह सपना पूरा हुआ वर्ष 1966 में। हालांकि, मिठाई के बजाय उन्होंने किताब-कॉपियों के दुकान की नींव रखी। इसका एक कारण यह था कि मार्केट के आस-पास के स्कूल-कॉलेजों, शैक्षणिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के कारण दुकान की संभावना थी। दूसरी तरफ यह भी कह सकते हैं कि और दिल्ली के दिल में रहने वालों के साहित्य प्रेम को उन्होंने समय से पहचान लिया था।

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राजनेताओं से अभिनेताओं तक की रही है आवाजाही :

महज 14-15 वर्ष की उम्र से दुकान से जुड़े मुकेश गुप्ता याद करते हैं कि उन दिनों आस-पास किताबों की ज्यादा दुकानें नहीं थी। नेशनल स्कूल अॉफ ड्रामा (NSD) और दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University) के कई विद्यार्थी किताब-कॉपी की खरीदारी के लिए यहीं आते थे। 70 के दशक में किरोड़ीमल कॉलेज (Kirorimal collage) के छात्र महानायक अमिताभ बच्चन(amitabh bachchan), क्रिकेटर कपिल देव (Kapil dev) और आगे के वर्षों में एनएसडी से अभिनेता राज बब्बर (Raj babbar), शाहरुख खान (shahrukh khan), अमृता सिंह, मनीषा कोइराला, गायक सोनू निगम (sonu nigam) सरीखे अभिनेता भी यहां आते रहे। यही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित समेत कई राजनैतिक हस्तियां भी बच्चों के साथ कॉपी-किताब की खरीदारी को पहुंचती थीं।

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किताबों से घिरा रहना देता है आनंद :

दुकान में बसी किताबों की महक और ज्ञान वर्धन के साधनों से घिरे 65 वर्षीय मुकेश गुप्ता को किताबों की खुशबू अपनापन देती है। वो बताते हैं कि किसी अति कीमती इत्र में भी वो महक नहीं जो इन किताबों में बसी रहती है। किताबों में घिर कर बैठने में जो आनंद है वह और कहीं नहीं। वो याद करते हैं कि साठ से अस्सी के दशक में कई दिग्गज राजनेताओं के बच्चों से उनकी गहरी दोस्ती रही। इसके पीछे का कारण है बाराखंभा रोड स्थित मॉडर्न स्कूल का बुक स्टोर, जहां दशकों से न्यू जनता बुक डिपो की ही शाखा है। वो बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल और सुनील शास्त्री मॉडर्न स्कूल के ही छात्र थे और किताब-कॉपी लेने दुकान पर आते थे। हमउम्र होने के कारण उनसे गहरी दोस्ती हो गई। बाद के वर्षों में भी आइएएस अमिताभ कांत, पूर्व वायु सेना प्रमुख एसके मेहरा व पीसी लाल, क्रिकेटर कीर्ति आजाद, संगीतज्ञ अमजद अली खान, अभिनेता आलोक नाथ, शेखर कपूर समेत अपने-अपने क्षेत्र के कई दिज्जगों से व्यवसायिक से ज्यादा पारिवारिक रिश्ता रहा।

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