दिल्ली वाले हमेशा से सैलानी जीवड़े मशहूर रहे हैं। मेले-ठेलों और तीज-त्योहारों के रसिया थे। ‘हफ़्ते के आठ दिन और नौ मेले’ दिल्ली की एक पुरानी कहावत है, तरह-तरह के मेले और त्योहार सारे साल होते रहते थे। क़िले में भी आए दिन कोई-न-कोई उत्सव होता रहता था। कभी नौरोज़ कभी तोरेबंदी, कभी रतजगा, कभी सलोनो और कभी फूलवालों की सैर। दिल्ली वालों की प्रसन्नचित्तता और निश्चितता मशहूर थी।

अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र मुसलमानों को अपनी एक आँख और हिन्दुओं को दूसरी समझते। उन्होंने धर्म के आधार पर कभी किसी से कोई भेदभाव नहीं बरता। क़िले के कर्मचारियों में हिन्दुओं की संख्या भी काफ़ी थी और बादशाह अपने हिन्दू मुलाजिमों की खुशी और ग़म में बराबर शरीक होते थे और मदद करते थे। दिल्लीवासी भी अपने बादशाह पर जान छिड़कते थे। उन दिनों यह आम बात थी कि हिन्दू और मुसलमान दोनों एक-दूसरे के मजहबी त्योहारों में शरीक होते थे। मुसलमान हिन्दू साधु-संतों का बड़ा आदर करते थे और मुग़लकाल के कई ऐसे चित्र मिलते हैं जिनमें बादशाह और उनके दरबारियों को हिन्दू संतों और साधुओं की संगति में दिखाया गया है।

इसी प्रकार हिन्दुओं के दिलों में भी मुसलमान पीरों और सूफ़ियों के लिए अपार सम्मान की भावना थी और वे उनके मजारों और दरगाहों में दुआ माँगने और मुरादें हासिल करने के लिए बड़ी तादाद में जाते थे। हिन्दू त्योहारों के मौक़ों पर हिन्दू बच्चे मस्जिदों के मक्तबों के उस्तादों के लिए फल और मिठाई वग़ैरह लेकर जाते थे और अपने घरों में भी बुलाते थे। इसी तरह मुसलमान भी हिन्दुओं के त्योहारों का जिक्र बड़ी श्रद्धा से करते थे और इस बात का ख़ास ख़याल रखते थे कि वे हिन्दू रस्मों के बारे में कोई ऐसी बात न कह दें, जिससे उनका दिल दुखे। बादशाह हिन्दुओं के बड़े त्योहारों पर क्रिले के अष्टकोण बुर्ज पर बैठ जाते और नीचे गुजरते हुए जुलूस और जनसमूह को देखते। हर प्रमुख त्योहार चाहे वह हिन्दुओं का हो या मुसलमानों का क़िले में भी मनाया जाता और उसमें बेगमात और शहजादियाँ भी शरीक होतीं।

दिल्ली के त्योहार और मेले मौसम की दृष्टि से तीन प्रकार के थे-वसंत ऋतु वर्षा ऋतु और शरद ऋतु वसंत ऋतु के मशहूर त्योहार और मेले थे वसंत, होली । और नौरोज इनका अलग-अलग रंग और मजा होता था जरा देखिए, पुरानी दिल्ली में ये कैसे मनाए जाते थे।

वसंत

कड़ाके का जाड़ा ख़त्म हुआ और हवा की ठंडक कम हुई कि दिल्ली वालों को ख़ुमार आया। खेतों में सरसों फूल रही है। आम पर बौर आना शुरू हो गया है। मन में उल्लास, उमंग, उत्साह और दिल-दिमाग़ में ताज़गी पैदा होने लगी। यह वसंत का आगमन है। मुसलमानों के हिन्दुस्तान में आने से पहले भी यह त्योहार सदियों से बड़ी हँसी-खुशी से मनाया जाता था। ग्यारहवीं सदी के शुरू के अल-बरुनी ने किताबुलहिन्द में भारतीय तीज-त्योहारों, रीति-रिवाजों और मेलों का विस्तार से वर्णन किया है। वसंत के त्योहार के बारे में उसने लिखा है कि इस अवसर पर स्त्रियाँ बढ़िया कपड़े पहनती हैं और जेवरों से लदी अपने पतियों से श्रेष्ठ उपहार मिलने की प्रतीक्षा करती रहती हैं। महाकवि कालिदास, श्रीहर्ष और कवि भास ने भी अपनी पुस्तकों में वंसतोत्सव का वर्णन बड़े रोचक ढंग से किया है। इस अवसर पर सरस्वती और कामदेव का पूजन होता था नृत्य व गायन का आयोजन होता था। देवी-देवताओं के मंदिरों में उनको रिझाने के लिए बीर, कबीर, गुलाल और सरसों के फूल के गड़वे बनाकर गाते-बजाते ले जाते थे और बसंत का त्योहार बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता था।

पहले इस मेले का मुसलमानों में दस्तूर नहीं था, लेकिन अमीर खुसरो के समय से उनमें भी इनका रिवाज चल पड़ा। हुआ यह कि उनके पीर-मुरशिद हज़रत निजामुद्दीन औलिया को, जिन्हें दिल्ली वाले सुलतानजी कहते थे, अपने प्यारे और खूबसूरत भानजे मौलाना तक़ीउद्दीन नूह से, जो रूप और गुण दोनों ही दृष्टि से अनुपम थे, अपार स्नेह था। साथ ही उनके भानजे को भी उनसे इतना प्रेम था कि पाँचों वक़्त की नमाज पढ़कर यह दुआ माँगते थे कि इलाही मेरी उम्र भी महबूब-ए-इलाही यानी सुलतानजी को दे दे ताकि उनकी आध्यात्मिक कीर्ति दीर्घ काल तक चलती रहे। ख़ुदा की मर्जी कि भानजे की दुआ कबूल हुई और वह उठती जवानी में ही अल्लाह को प्यारे हो गए। हजरत निजामुद्दीन औलिया को इतना दुख हुआ कि आपने एकदम समाज की महफिल बंद कर दी। इस बात को चार-पाँच महीने गुज़र गए। फिर वसंत ऋतु आई। हजरत अमीर खुसरो ने देखा कि खेत में सरसों फूल रही है, हिन्दू गड़वे बना-बनाकर हँसी-खुशी नाचते-गाते कालकाजी के मंदिर में जा रहे हैं। उन्हें भी खयाल आया कि इस मौके पर मैं भी अपने पीर-मुरशिद को खुश करूँ। चुनांचे उनके दिल में एक खुशी की कैफियत पैदा हो गई। उसी वक़्त अपनी दस्तार को खोलकर कुछ पेच इधर-उधर लटकाए, उनमें सरसों के फूल उलझाकर यह पंक्ति अलापते हुए उस तालाब की तरफ़ चले जिधर सुलतानजी गए थे—-

अश्करेज आमदाअस्त अब्र-ए-बहार

जहां तक उनके आलाप की आवाज पहुंचती थी यह मालूम होता था कि एक आलम गूंज रहा है। एक तो अमीर खुसरो संगीत कला में निपुण और अद्वितीयः सरोदवादक थे, दूसरे इस शौक ने एक आग भड़का दी थी। उधर महबूब-ए-इलाही को खयाल आया कि आज हमारा तुर्क यानी खुसरो कहाँ रह गया ? अपने दो-तीन जलीलों (शिष्यों) को उन्हें लेने भेजा, मगर वह क्या देखते हैं कि आप अजब रंग से गाते हुए, मस्ताना चाल से झूमते हुए आ रहे हैं। जलीसे भी बेखुद होकर वहीं खड़े हो गए। उनके लौटकर न आने पर सुलतानजी खुद ही खुसरो की ख़बर लाने रवाना हो गए। खुसरो को दूर से देखते ही उनकी आँखों से आँसू बहने लगे जिस क्षण खुसरो की नजर उन पर पड़ी तो बेताब होकर यह शेर पढ़ा-

अश्क रोज आमदा अब्र-ए-बहार

साकिया गुलबरेज बाद: बयार

दूसरे मिसरे का सुनना था कि पीर-मुरशिद बेताब हो गए। बस उसी समय से मुसलमानों ने भी यह मेला अपना लिया और सुलतानजी ने भी महफ़िल-ए-समाअ फिर से शुरू कर दी।

नवाब दरगाह कुलीला लिखते हैं कि दिल्ली में वसंत का मेला अपनी विशिष्टताओं की दृष्टि से सब मेलों से निराला होता था। वसंत के महीने की पहली तारीख को तमाम दिल्ली वाले कदम शरीफ पर गुलदस्ते और मिठाई चढ़ाते हैं गुलाबपाश से गुलाब, बेदमुश्क के अर्क औरत तरह-तरह के इत्र और केवड़ा छिड़कते हैं। जब क़दम शरीफ़ पर मेला अपने शबाब पर होता है तो मंजर में अजब निखार और आकर्षण पैदा हो जाता है। हर तरफ हसीनों के जमघट, कव्वालों का शोर, गायकों का नृत्य-गान नक्कालों की नकलबाजियाँ एक ऐसा समा होता है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

दूसरे दिन तमाम दिल्ली वाले हजरत ख्वाजा बख्तियार काकी के मज़ार पर हाजिरी देते थे और रास्ते में चिराग़ दिल्ली के मजार पर दीए जलाते थे और फातिहा पढ़ते थे। तीसरे दिन हजरत निजामुद्दीन महबूब-ए-इलाही के दरगाह पर मजलिस-ए-समाअ होती थी। चौथे दिन हजरत शाह हसन रसूलनुमा के मज़ार पर बंसत होती थी। दिन भर सैर-तफरीह और रंगरेलियाँ मनाई जातीं। पाँचवें दिन हज़रत शाह तुर्कमान के मजार पर मेला भरता था। यहाँ भी हसीनों और महजबीनों का एक मनमोहक जमघट होता था। छठे रोज अमीर और शहर के प्रतिष्ठित लोग बादशाह सलामत की ख़िदमत में हाजिरी देते थे और वसंत की मुबारकबाद पेश करते थे। सातवें दिन रात के वक्त रंगीन मिजाज लोग हज़रत अजीजी की क़ब्र पर जाते थे जो अहदीपुरा में थी। रात भर शराब का दौर चलता था और नाच-गाना होता रहता था। गरज कि दिल्ली के मुसलमान उस दौर में एक हफ्ते तक वसंत का मेला और त्योहार मनाते थे।

समय बीतते वसंत के मेले की धूम बढ़ती रही। यह हिन्दू मुसलमानों का मिला-जुला त्योहार बन गया। दरगाहों पर चादरें चढ़ने लगीं। आज भोलूशाह की वसंत है और कल हरे भरे की। हजरत सरमद के मजार पर और सुईवालान के मुहल्ले में भी वसंत का मेला भरने लगा। कव्वालों और गवैयों ने भी अपने उस्तादों बल्कि अपने बुजुगों के मज़ारों पर भी वसंत चढ़ानी शुरू कर दी। सब लोग बसंती रंग के कपड़े पहनकर मेलों में शरीक होते थे मंदिरों में हिन्दू केसर का भोग लगाते वसंत राग-रंग का त्योहार था। बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र का यह ख़याल बहुत लोकप्रिय था-

सकल बन फूल रही सरसों

और मिर्ज़ा ग़ालिब की यह ग़ज़ल तो बच्चे-बच्चे की ज़बान पर थी-

फिर उसी अंदाज से बहार आई

कि हुए मेहर-ओ-माह तमाशाई

वसंत ऋतु पर बहादुरशाह ज़फ़र के आख़िरी जश्न की दास्तान भी अप्रसांगिक न होगी वसंत का शुभागमन था। ठण्डक कम हो गई थी और दिल्ली वाले हमेशा की भाँति वसंत के मेले जोर-शोर सो मना रहे थे। जब लोगों ने बहादुरशाह जफर की सालगिरह का ढिंढोरा सुना तो ख़ुशी से उछल पड़े। जुमेरात का दिन था। जनता ऐसी उमड़ी कि क़िले के मैदान में और जमना के किनारे पर तिल धरने की जगह न थी । मकानों के परदे और औरतों की चादरें, मर्दों की पगड़ियाँ, बच्चों के कपड़े सब वासंती थे। किले के नीचे खाई में जो कंदीलें लगाई गई थीं वे भी वसंती थी मानो कोने-कोने में और चप्पे-चप्पे पर वसंत फूल रही थी। शहजादों ने क़िले में, दुकानदारों ने मैदान में, तैराकों ने राजघाट पर और क़व्वालों ने शाहबाड़े पर डेरे डाल रखे थे। अंदर और बाहर, नदी पर और खुश्की पर रात भर नाच-गाना होता रहा। बसंती कागजों के सैकड़ों आदमक़द-गुब्बारे रोशन करके छोड़े जा रहे थे। चार बजे तक सारा आसमान

भी वसंती हो गया और मालूम होता था कि आसमान की आँखों में भी सरसों फूल रही थी। बादशाह तशरीफ़ लाए। आगे-आगे हब्शनियों का दस्ता, उसके बाद उरदा-बेगनी रक्षक, बीच में बादशाह सलामत के पीछे बल्लम लिए हुए। हज़रत तख्त पर जलवा अफ़रोज़ हुए। चोबदार ने आवाज लगाई-

अदव, निगाह रू-ब-रू

न पेश हुई, पहले शहजादे ने, फिर अमीरों ने और उसके बाद रैयत ने नजें गुजारी। ग्यारह बजे रात को दरबार खत्म हुआ।

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