मुगलों के जमाने में यात्रा की तैयारियाँ बड़े पैमाने पर होती थीं और शायद ही ऐसी कोई सवारी होती जो शाही क़ाफ़िले में शामिल न होती। शहर के भीतर भी यह शाही दस्तूर था कि जब बादशाह अपने तख़्त-ए-रवाँ पर सवार होकर कहीं जाएँगे, तमाम अमीर उनके साथ चलेंगे। बादशाह के तख़्त-ए-रवाँ को आठ आदमी अपने कंधों पर उठाकर चलते थे। हाँ, अगर बादशाह किसी निजी काम से जाते थे या मस्जिद में नमाज पढ़ने जाते थे तो उनके साथ सिर्फ़ वे ही अमीर होते तो उस समय क़िले में तैनात होते ।

शहजादियों की सवारी

प्रसिद्ध इतिहासकार बनियर ने शहजादी रोशनआरा बेगम के जुलूस का बड़ा मोहक चित्र प्रस्तुत किया है। उसने लिखा है-“मैंने ऐसे रोबदाब की और शानदार सवारी और ऐसा प्रदर्शन पहले नहीं देखा। वह अपने पेगू हाथी पर अपनी सुनहरी मेघदंबर में बैठी है। उसके पीछे पाँच या छह हाथी और हैं जिनमें शाही घराने की दूसरी स्त्रियों हैं। हरेक बेगम और शहजादी की अपनी अलग और उतनी ही शानदार मेघदंबर है। शहजादी को घेरे हुए खूबसूरत ख्वाजासरा हैं जो अपने-अपने घोड़ों पर सवार हैं। वे बहुत सुंदर लिवास पहने हुए हैं और उनके हाथों में एक छोटा-सा डंडा या छड़ी है, जिससे उनके ओहदे और श्रेणी का पता चलता है। उम्दा घोड़ों पर ही चढ़ा हुआ शहज़ादी का जनाना सुरक्षा दस्ता है, जिसमें कश्मीरी और तातारी सुंदरियाँ हैं। इसके अलावा कुछ ख्वाजासरा घोड़ों पर सवार और भी हैं और बड़ी संख्या में पैदल सिपाही है जिन्होंने डंडे अपने हाथों में ले रखे हैं और रास्ता साफ़ करते जा रहे हैं। किसी ने रास्ते में जाने की कोशिश की तो उडे मारकर बाहर निकाल देते हैं। शहजादियों और बेगमात के बाद वह बेगम हैं जो क़िले में सबसे बड़ी हैं। वह भी इसी तरह हाथी पर सवार हैं और उनके इर्द-गिर्द भी उनाना सुरक्षा दस्ते हैं। शान-शौकत का इस तमाम जुलूस में यह हाल है कि बयान नहीं किया जा सकता।”

शहज़ादी जहाँआरा बेगम एक पालकी में सफ़र करना पसंद करती थी। यह पालकी एक उम्दा कपड़े या सोने के तारों के जाल से ढँकी रहती थी। यह काफ़ी सजी हुई होती थी और इसके अंदर आईने भी लगे होते थे। पालकी के चारों तरफ़ ख्वाजासरा और हिजड़े होते थे जिनके हाथों में बड़ी बढ़िया धातु की छड़ियाँ होती थीं। उनमें मोर के पर भी लगे होते थे। पालकी बहुत आहिस्ता-आहिस्ता चलती थी और उसके आगे-आगे सक्के होते थे रास्ते की धूल और मिट्टी को दबाने के लिए पानी छिड़कते रहते थे। पालकी के अंदर सुगंधियाँ और इत्र भी रखे होते थे। आगे-आगे एक दस्ता मर्द खिदमतगारों का भी चलता रहता था। उनके हाथों में सोने और चाँदी की छड़ी होती थीं और वे चिल्लाते रहते थे, “रास्ता छोड़ो! हटो यहाँ से! ख़बरदार कोई बीच में न आए !” इक्के, ताँगे, टमटम, विक्टोरिया, लैंडो, साइकिलें, मोटर कारें और हवाई जहाज़ बहुत बाद की सवारियाँ हैं।

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