प्राचीन दिल्ली कॉलेज की उपलब्धियाँ हिन्दुस्तान की शिक्षा और संस्कृति के इतिहास में विशेष स्थान रखती हैं। इस कॉलेज ने न केवल देशी भाषा में शिक्षा की भव्य परंपराएँ स्थापित कीं, बल्कि उर्दू गद्य को मालामाल कर दिया और उसे नए मूल्य प्रदान किए। इस प्रकार एक नई सभ्यता का श्रीगणेश हुआ। पूर्व और पश्चिम का वह सम्मिश्रण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की वह प्रथम अनुभूति दिल्ली कॉलेज ने ही उत्पन्न की थी। प्यारेलाल ‘आशोब’ राष्ट्रीय एकता के दिलदादा थे। उनके भतीजे लाला श्रीराम तकरा-ए-खुमखाना-ए-जावेद के संपादक लिखते हैं-

“दिल्ली कॉलेज का आविर्भाव ‘आशोब’ साहब की प्रेरणा और प्रयत्नों का परिणाम था। वह इसके मंत्री और शक्ति के स्रोत बने रहे। इस सोसायटी की प्रथम संगोष्ठी में मिर्ज़ा ग़ालिब अपनी वृद्धावस्था के बावजूद आए और एक लेख भी पढ़ा। जब मिर्जा साहब संगोष्ठी में पहुँचे तो सब हैरान थे कि बीमारी और कमज़ोरी के कारण कहीं जाते नहीं थे। आज कैसे आ गए। पूछने पर मिर्ज़ा ग़ालिब ने मुस्कराकर प्यारे लाल ‘आशोब’ की तरफ़ और कहा—रिश्तः दर गर्दनम अफ़गंदः दोस्त मी बुर्द हर जा कि ख़ातिर ख्वाहस्त’।

1857 ई. में जब मुग़ल साम्राज्य का अंत हो गया तो अंग्रेजों ने अपने ढंग पर शिक्षा देने के लिए मिशन स्कूल खोले उन स्कूलों में अंग्रेज़ी के अलावा बाइबिल भी पढ़ाई जाती थी। दिल्ली वाले अपने बच्चों को उन स्कूलों में भेजते हुए डरते थे कि कहीं वे ईसाई न बना दिए जाएँ। मगर धीरे-धीरे यह डर मिटता चला गया। फिर भी दिल्ली में बहुत अर्से तक हिन्दुस्तानी और अंग्रेजी दोनों ही ढंग से पढ़ाई चलती रही, हालांकि मदरसों और पाठशालाओं में बच्चों की तादाद घटती रही। हिन्दू व्यापारियों और सेठों के बच्चे सात साल के होते ही पाठशालाओं में चले जाते थे जहाँ ब्राह्मण अध्यापक हिन्दी, संस्कृत और गणित पढ़ाने पर बल देते थे। ये पाठशालाएं किसी मुहल्ले की बैठक या किसी व्यापारी की हवेली में लगतीं। मक्तब या मदरसे में उर्दू या फारसी पढ़ाई जाती और कहीं-कहीं अरबी के पढ़ाने का प्रबंध भी होता था। मदरसे भी किसी अमीर की हवेली या किसी बड़े मकान के दालान में होते थे।

1857 ई. के बलवे में न केवल दिल्ली कॉलेज को जला दिया गया था बल्कि उसके प्रिंसिपल मि. टेलर, हेडमास्टर रॉबर्ट्स और सेकंड मास्टर मि. स्टुअर्ट को भी मार डाला गया था। बाद में फ़ारसी के उस्ताद मौलवी इमाम बख़्श को बग़ावत के जुर्म में मारकर ख़त्म कर दिया गया था। कई साल तक दिल्ली कॉलेज में फ़ौजें पड़ी रहीं 1872 ई. में इस कॉलेज को मुसलमानों में अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए फिर शुरू कर दिया मगर पहली अप्रैल 1877 ई. से उसे लाहौर कॉलेज का हिस्सा बना दिया गया लेकिन उसे अलग कॉलेज के रूप में स्थापित करने की कोशिश जारी रही। 1924 ई. में यह इंटरमिडिएट कॉलेज के तौर पर कायम हो गया, बाद में उसमें बी. ए. और एम.ए. की कक्षाएँ भी शामिल कर दी गई। अलबत्ता 1924 ई. से 1947 ई. तक कॉलेज का नाम ऐंग्लो-अरेबिक कॉलेज रहा। 1947 ई. के सांप्रदायिक दंगों में उसे फिर तबाही का सामना करना पड़ा, लेकिन 1948 ई. में पं. जवाहर लाल नेहरू और डॉ. जाकिर हुसैन की कोशिशों से अपने पुराने नाम दिल्ली कॉलेज के साथ फिर शुरू कर दिया गया। उसके प्रिंसिपल प्रसिद्ध साहित्यकार और विद्वान मिर्जा महमूद बेग (अब मरहूम) नियुक्त हुए थे।

मिशन कॉलेज (सेंट स्टीफेंस) केंब्रिज मिशन दिल्ली के तत्त्वावधान में 1881 ई. में शुरू किया गया था। यह कॉलेज पंजाब सरकार के विशेष अनुरोध पर शुरू किया गया था, ताकि दिल्ली शहर के लिए उच्च शिक्षा की वे सुविधाएँ सुलभ हो सकें जो 1876 ई. में दिल्ली कॉलेज के बंद हो जाने से समाप्त हो गई थीं। 40 वर्ष तक सेंट स्टीफेंस कॉलेज पंजाब विश्वविद्यालय से संबद्ध रहा क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना 1922 ई. में हुई थी। यह कॉलेज आज भी दिल्ली का एक चोटी का कॉलेज है और दिल्ली के सांस्कृतिक और नागरिक जीवन में उसका हमेशा विशेष महत्त्व रहा है। इसके अग्रगण्य विद्यार्थियों में एम. के. रुद्र, जो बाद में कॉलेज के प्रिंसिपल भी बने, एस. के. बोस, डॉ. ताराचंद और मिर्ज़ा महमूद बेग वग़ैरा शामिल हैं।

एक मिशन हाई स्कूल चाँदनी चौक में था जो मिशन कॉलेज की ही शाखा थी। उसका पिछला फाटक दरीबा की तरफ़ खुलता था। मास्टर जानकीनाथ उसके हेडमास्टर थे। लड़के उनको जल्लाद कहते थे। जो लड़का शरारत करने पर सजा पाने के लिए उनके सामने पेश होता था उसकी पानी से भीगी हुई बेंत से ख़बर लेते, जिसके निशान जिस्म पर कई दिन तक न मिटते। मदरसा खुलने पर भी सहन में प्रार्थना और उसके बाद भाषण होता था। दूसरे सब मास्टरों के अलावा एक-दो मास्टर सजा देने के लिए भी नियुक्त होते थे। ये क्रिश्चियन होते थे और लड़के का अपराध मालूम करके उसे आईंदा वैसा न करने की हिदायत देते थे। अगर किसी का अपराध अक्षम्य होता तो बेंत से मारते थे और बाद में उसे वैसा न करने की क़सम दिलाते थे। बेंत मारते हुए जबान से यह कहते, “मैं यीशु मसीह को हाजिर नाज़िर जानकर तुम्हें बिना किसी पक्षपात के उचित दंड देता हूँ।” प्रसिद्ध चिंतक और विद्वान लाला हरदयाल, जो कायस्थ माथुर थे और जिन्होंने अमरीका जाकर ग़दर पार्टी की स्थापना की थी, इसी स्कूल में पढ़े थे। मिशन स्कूल के सबसे लोकप्रिय अध्यापक मास्टर अमीरचंद थे। वे ग़रीबों लड़कों की किताब-कापियों से भी मदद करते थे और कपड़े तक बनवा देते थे। जब 1912 ई. में लॉर्ड हार्डिंग की सवारी पर बम का गोला फेंका गया तो उनको भी पकड़कर फाँसी पर लटका दिया गया था। उनके दो-तीन और भी साथी शहीद हो गए थे। उन पर यह आरोप लगाया गया था कि वे लाला हरदयाल की ग़दर पार्टी के संस्थापकों में से थे। मिशनरियों ने उन्हें छुड़वाना चाहा था मगर कामयाब न हुए थे। सब दिल्ली वालों को उनके फाँसी दिए जाने पर बहुत रंज हुआ।

मिशन कॉलेज के बाद हिन्दू कॉलेज और फिर रामजस कॉलेज खुल गए। लेकिन आज की दिल्ली में पढ़ाई का बोल-बाला है। इतने स्कूल, कॉलेज और मदरसे जगह-जगह खुले हुए हैं कि उनकी गिनती भी मुश्किल है। जितने सरकारी स्कूल हैं उनसे ज़्यादा गैर-सरकारी स्कूल हैं। अंग्रेज़ी का नए हिन्दुस्तान में भी बोल-बाला है। हर आदमी अपने बच्चे को अँग्रेज़ी स्कूल में पढ़ाना चाहता है। जितनी संख्या पढ़ने वाले लड़कों की होती है उतनी ही लड़कियों की भी। अंग्रेज़ी स्कूलों में हर बच्चे का खर्च औसतन डेढ़ सौ रुपए माहवार है। दिलकश, खुशनुमा वर्दी पहने चमचमाते और मुस्कुराते हुए बच्चे अपना टिफिन और पानी की बोतल लिए स्कूल जाते नजर आते हैं।

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