हाइलाइट्स

  • कई एतिहासिक घटनाओं के साक्षी बने वृक्ष
  • भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद गुरूकुल इंद्रप्रस्थ स्थित पीपल के पेड़ के नीचे क्रांतिकारियोंं से मिलते थे
  • -चांदनी चौक में 300 साल पुराना पीपल का पेड़
  • -सीकरी महामाया देवी मंदिर परिसर स्थित वृटवक्ष पर सैकड़ाें निर्देाष ग्रामीणों को अंग्रेजों ने दी फांसी

मखमली पत्तियों की वो छूअन, शाखाओं पर बैठकर खेलकूद, फलों को तोड़ने के वो जतन। छांव के नीचे बैठकर घंटों धमाचौकड़ी करता बचपन भले ही जिंदगी के सफर में आगे बढ़ता चला जाता है लेकिन वृक्षों से जुड़ी यादें जेहन में ताउम्र ताजा रहती है। इन पेड़ों का हमसें जुड़ाव सिर्फ आक्सीजन देने तक सीमित नहीं है अपितु हमारी धार्मिक, सांस्कृतिक रीति रिवाजों से भी ये गहरे जुड़े हैं। तभी तो दक्षिणी दिल्ली में 16,500 पेड़ कटने की सूचना मिलते ही लोग दौड़ पडे़। कोई इनकी जड़ों के पास बैठ गया तो कोई शाखाओं से लिपट रोने लगा। हर आंख नम हो गई। सभी सिर्फ एक बात पर सहमत थे कि पेड़ों को नहीं काटा जाना चाहिए। इसे अगर कैफी आजमी के शब्दों में समझें तो–

पेड़ को काटने वालों को ये मालूम तो था

जिस्म जल जाएंगे, जब सर पे ना साया होगा। पेड़ों की कटाई के बहाने दिल्ली में पुराने पेड़ों के संरक्षण की भी बहस चल पड़ी है। इस आर्टिकल में हम दिल्ली-एनसीआर के सालों पुराने पेड़ों एवं उनसे जुड़ी ऐतिहासिक कहानियों से रूबरू कराएंगे।

धर्म और आजादी की यादें सजाएं बरगद का पेड़

बदरपुर, दिल्ली-हरियाणा सीमा के पास अरावली की पहाड़ियों में स्थित गुरुकुल इंद्रप्रस्थ में 102 साल से ज्यादा पुराने बरगद के पेड़ का भी अपना इतिहास है। इसके नीचे बैठ कर ही संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद तपस्या किया करते थे। संचालक आचार्य ऋषिपाल कहते हैं कि महर्षि श्रद्धानंद सरस्वती ने 24 दिसंबर 1916 को गुरुकुल इंद्रप्रस्थ की स्थापना की थी। वे यहां स्थापना से दो वर्ष पहले आए थे। गुरूकुल की गुफा में देश के सच्चे सिपाही नेताजी सुभाष चंद्र बोस आठ दिनों तक भूमिगत रहे थे। इनके अलावा राम प्रसाद बिस्मिल, शहीदे आजम सरदार भगत सिंह, अशफाक उल्ला खां, चंद्रशेखर आजाद यहां आकर रणनीति बनाया करते थे। आजादी के आंदोलन के दौरान ही महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय तथा जयप्रकाश नारायण का आना हुआ था। ये सभी लोग जब इस पेड़ के नीचे आकर बैठा करते थे।

ग्रामीणों को दी गई थी फांसी

सीकरी महामाया देवी मंदिर परिसर में खड़े वृटवक्ष का सैंकड़ों साल पुराना इतिहास है। यहां 1857 में सैकड़ों निर्दोष ग्रामीणों को फांसी पर लटकाया गया था। माता की तरह वटवृक्ष में भी लोगों की अटूट आस्था है। माता के दर्शन के बाद लोग वटवृक्ष पर धागा बांधकर अपनी मन्नत मांगते हैं। सीकरी खुर्द गांव निवासी वृद्ध प्रकाशवीर सिंह बताते हैं कि 1857 में अंग्रेजों ने इस पेड़ पर लटकाकर सैकड़ों निर्दोष ग्रामीणों को फांसी दी थी। बुजुर्ग बताते हैं कि ग्रामीण अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की योजना बना रहे थे। जिसकी सूचना मुखबिर ने अंग्रेजों को दे दी थी। इसी के दंड स्वरूप अंग्रेजों ने ग्रामीणों को फांसी पर लटकाया गया।

पीपल के नीचे लगती थी चौपाल

एनएच-24 के निकट बसा मकनपुर गांव का इतिहास मुगलकालीन है। 85 वर्षीय रतनलाल बताते हैं कि मकनपुर गांव के बीचों-बीच लगा पीपल का पेड़ करीब 300 साल से भी पुराना है। एक जमाना था जब पीपल के पेड़ पर मोर, कोयल, कौए और बुलबुल सुबह से लेकर देर शाम तक चहचहाती रहती थी। सन 1961 में यहां के प्राचीन स्कूल में मुख्त्यार नाम के मास्टर के द्वारा गांव की जनगणना की गई थी तो उस वक्त 1365 लोगों की गिनती हुई थी उस वक्त यह इकलौता पेड़ था जो सबसे पुराना हुआ करता था।

पेड़ का तना सुनाता बलिदान की कहानी

चांदनी चौक स्थित शीश गंज गुरुद्वारे को गुरु तेग बहादुर के शहादत स्थल के रूप में पहली बार स्थापना वर्ष 1783 में की गई थी। शीश गंज गुरुद्वारा दिल्ली के सबसे महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक गुरुद्वारों में से एक है। इस धार्मिक स्थान की वर्तमान संरचना वर्ष 1930 में निर्मित कराई गई थी। इसमें एक एक विशाल हॉल भी समायोजित है, जिसके ठीक केन्द्र में एक पीतल का मंडप बना है, जिसमें सिक्खों की पवित्र पुस्तक गुरु ग्रंथ साहिब रखी हुई है। गुरु तेग बहादुर को जिस वृक्ष के नीचे शहादत दी गई थी, उस वृक्ष का तना आज भी गुरुद्वारा के अंदर संरक्षित है।

द किलर ट्री की यादें

इतिहासकार कहते हैं कि लाल किले में दीवाने आम के पास एक पेड़ था, जिसे किलर ट्री कहते थे। दरअसल, 1857 में अंग्रेजों ने हिंदुस्तानियों को इस पेड़ पर टांगकर मारा था। यह पेड़ करीब 30 साल पहले एक आंधी में गिर गया। इस पेड़ को मैंने भी देखा था। इसी तरह कोटला में एक बरगद का पेड़ है, जो सैकड़ों साल पुराना है। इस पेड़ के नीचे एक साथ 50 से ज्यादा लोग बैठकर आराम करते थे। वहीं प्रदीप कृष्णन अपनी पुस्तक दिल्ली ट्री में कहते हैं कि महरौली में दिल्ली का सबसे पुराना पेड़ खिरनी का है। यह पेड़ करीब 500 साल पुराना है।

सालों पुराने पीपल पेड़ों की कहानियां भी दिलचस्प

खजूर वाली गली

पुरानी दिल्ली की गली खजूर वाली में पहले कई खजूर के पेड़ हुआ करते थे लेकिन अंग्रेजों के जमाने में यहां से खजूर के पेड़ काट दिए गए। इस गली में एक अखाड़ा हुआ करता था। करीब सौ साल पहले इस अखाड़े में एक पीपल का पेड़ लगाया गया था जिसकी लोग पूजा भी करते थे। अखाड़े के पहलवान इसी पेड़ का आर्शीवाद लेकर कुश्ती किया करते थे। अखाड़ा तो बंद हो गया लेकिन यह पेड़ आज भी उस गली के तमाम मकानों को हरियाली का अभास करता है।

तोप खाने वाली गली में भूतों का डेरा

यहां करीब दो सौ साल पुराना पीपल का पेड़ है। जिसे लाला हनुमान प्रसाद ने लगवाया था। उनकी यहां एक कोठी और एक मंदिर भी है। कहा जाता है कि इस गली में स्थित हवेलियों में अंग्रेजों की तोपें रखी जाती थीं। और गली के दोनों ओर गेट हुआ करती थी, जो सिर्फ यहां रहने वाले लोगों के लिए ही खुला करती थी। इस गली का नाम अब शंकर गली रख दिया गया है।

हिंदू-मुस्लिम एकता का गवाह

गली चौक राय में पीपल का यह दरख्त किसी दीवार में उग आया था, जिसे बाद में जमीन में स्थान दे कर घर के बीचों बीच लगाया गया। इस दरख्त को उखाड़ने की कोशिश करने वालों के साथ कई घटनाएं हुई जिसके बाद से गली और आसपास के लोग भी इस पेड़ के संरक्षण में जी जान से जुट गए। कई बार निगम के लोग इस पेड़ को काटने छांटने आए लेकिन उन्हें लौटना पड़ा। इस पेड़ के प्रति लोगों की आस्था इस कदर है कि कोई टहनियां तक नहीं काटता। लोग इसी पेड़ की शीतल छाया के नीचे बैठ कर अपनी सुख और दुख बांटते हैं। यहां रहने वाले हिंदू मुस्लिमों के दुख और सुख का गवाह रहा है यह दरख्त।

संघर्ष का साथी

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में बरगद का पेड़ दिल्ली सरकार द्वारा घोषित विरासत वृक्ष में शामिल हैं। वृक्ष ना केवल पुराना है बल्कि इससे थियेटर कलाकारों की यादें भी जुड़ी हैं। इसी पेड़ के नीचे विभिन्न रंगकर्मी और फिल्म कलाकार घंटों रिहर्सल करते थे। कभी साथियों के साथ सुख-दुख बांटते तो कभी भविष्य के सपने बुनते। इन कलाकारों में आशीष विद्यार्थी, नसीरूददीन शाह, ओमपुरी, नवाजुददीन सिदिदकी इत्यादि के नाम खासतौर पर उल्लेखनीय हैं।

दिल्ली सरकार ने इन्हें घोषित किया विरासत वृक्ष

1-एफआरआरओ दफ्तर भीकाजी कामा प्लेस का बरगद का पेड़।

2. तुगलकाबाद के खंडहरों में शान से खड़ा ऐलान्थस का पेड़।

3. लोदी गार्डन बड़ा गुंबद के उत्तर में स्थित मशहूर आम का विशाल पेड़।

4. इंडिया गेट से 100 मीटर पर स्थित बरगद जो इंडिया गेट की पहचान का हिस्सा बन चुका है।

5. राजघाट संग्रहालय का अर्जुन का पेड़।

6. राजघाट स्थित अशोक वृक्ष।

7. तीन मूर्ति स्थित नेहरू मेमोरियल में विशाल नीम का पेड़

8. नेहरू पार्क का ऐलान्थस पेड़

9. नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का बरगद का मशहूर पेड़।

10. कुतुब मस्जिद स्थित मशहूर स्लवाडोरा का पेड़

11. बर्मा मिशन में स्थित पीपल का पेड़ जिसके नीचे भगवान बुद्ध की प्रतिमा है

12. कटवारिया सराय सेंट्रल पार्क का बरगद

13. तीन मूर्ति स्थित नेहरू मेमोरियल में सेमाल का पेड़

14. कदम शरीफ मस्जिद स्थित नीम का पेड़

15. हौज खास डियर पार्क के पास स्थित पिलखन का पेड़

16. हौज खास आर्ट विलेज के पास स्थित इमली का पेड़

17. दादा बाड़ी जैन मुनि स्थित पीपल का पेड़

18. चिराग दिल्ली दरगाह का खिरनी का पेड़।

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