कोई लाख दूर रहे कितना भी, पर अपना ही रहे क्या कम है

प्यार करे ना करे गम नहीं, बस याद करता रहे क्या कम है।

क्या खूब लिखा है किसी शायर ने. जिगर यानी दिल की परिभाषा और प्यार करने वालों की मनोस्थिति को सराबोर करती महज ये पंक्तियां वास्तव में कुछ ना कहते हुए भी बहुत कुछ कह रही हैं। सचमुच सच्चे प्यार का यह एहसास इंसान की जिंदगी को खुशियों से भर देता है।

आज से लगभग दो-तीन दशक पहले तक एक जमाना वह भी था, जब हमारे देश के आम लोग संत वैलेंटाइन वीक और वैलेंटाइन डे के बारे में नहीं जानते थे, लेकिन प्यार तब भी हुआ करता था। हीर-रांझा, सैणी-बींजा, सोहनी-महिवाल, ढोला-मरवण, नल-दमयंती जैसे कितने ही प्रेमी युगल इतिहास रच गए और प्यार करने वालों की दुनिया में अमर हो गए। इतना ही नहीं पौराणिक कथाओं में भी राधा-कृष्ण, सती-शिव, ईसर-गवर जैसे प्रेमी-प्रेमिकाओं की चर्चा है। वह प्यार कुछ अलग था और आजकल जिसे प्यार कहते हैं, वह शायद कुछ अलग है।

भूमंडलीकरण के दौर में उदारीकरण का असर त्यौहारों पर भी देखने को मिला है। सब कुछ बाजार के हवाले हो गया है। पहले वैलेंटाइन वीक (7 से 14 फरवरी) इतना प्रचलित नहीं था। वैलेंटाइन वीक व डे का उत्साह कम देखने-सुनने को मिलता था। 1991 के बाद जब से उदारीकरण का दौर शुरू हुआ, युवाओं में साल-दर-साल वैलेंटाइन वीक व डे मनाने का जोश बढ़ने लगा। सीधे तौर पर कहे तो वैलेंटाइन का अर्थ होता है प्यार का इजहार करना, लेकिन बीते कुछ सालों के दौरान इसे मानने के तौर-तरीकों में व्यापक बदलाव आया है।

प्यार को जो रूप इन दिनों देखने को मिल रहा है, उसे देखते हुए कई सवाल उठने लाजिमी हैं। जैसे कैसा है यह प्यार? लोग क्यों करते हैं प्यार? प्यार क्या रोग है? यदि हां तो इस मर्ज की दवा क्या है? इन सवालों को जबाव शायद इन पंक्तियों में मिल सकते है-

हमने तो नहीं किए कभी कोई वादे

न खाई कसमें

न निभाई रस्में

प्यार तो ऐसे भी होता है, है न

7 से 14 फरवरी तक क्रमशः रोज डे, प्रपोज डे, चॉकलेट डे, टेडी डे, प्रोमिस डे, हग डे, किस डे और वैलेंटाइन डे मनाया जाएगा। बाजार भी तरह-तरह के उपहारों से पट जाएंगे। गुलदस्ते बनाने वाले पूरी तरह व्यस्त हो गए हैं या हो जाएंगे। एक से बढ़कर एक और नायाब, डिजाइन वाले गुलदस्ते बनाने और उन्हें सही ठिकानों पर पहुंचाने में। सवाल उठता है कि क्या महकते फूलों का गुलदस्ता और मंहगे तोहफा देकर हम सही तरह से प्रेम दिवस (वैलेंटाइन वीक) मना रहे हैं? शायद नहीं। क्योंकि ढाई अक्षर के रूप में प्रेम का जो स्वरूप इस समय दिख रहा है उसके दो पक्ष हैं। पहला शून्य और दूसरा सेक्स. संयोग ही है कि ये दोनों (शून्य व सेक्स) भी ढाई अक्षर के ही हैं। शून्य हमें यह संदेश देता है कि स्वयं रिक्त रह कर जिसे प्रेम करते हैं उसे अपनी संवेदनशील आंतरिकता से भरें।

जबकि सेक्स हमें अपने प्रेमी या प्रेमिका का संपूर्ण रूप से उपभोग करने की सीख देता है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि प्यार भी आजकल एक चीज बन कर रह गया है। इसीलिए तो प्रेमी-प्रेमिका आइटम या माल कहे जाने लगे हैं। प्यार इनदिनों एक-दूसरे का उपयोग व उपभोग तक सिमट कर रह गया है। कई ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं, जिनमें कथित प्यार करने वालों की नजर एक-दूसरे की जेब या पर्स पर टिकी होती है। ब्रेक-अप और आत्महत्याओं की घटनाओं में भी इजाफा हुआ है. ऐसे कारनामे यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या …यही प्यार है?

कहना गलत न होगा कि उस समय के प्यार में जो बात थी-‘मैं तेरा’, इसकी जगह अब ‘तू मेरी’ ने ले ली है। इस बदलती सोच का परिणाम यह हुआ कि त्याग व समर्पण की भावना गायब हो गई और अहंकार व अधिकार की भावना प्रबल। एक और एक ग्यारह बनने के चक्कर में हम एक और एक दो भी नहीं बन सके। प्रेमी-प्रेमिकाओं को यह जान लेना चाहिए कि प्यार को प्यार से और दुख, तकलीफ, उलझनों के बीच फंसी जिंदगी को समझदारी से जीतना होगा, तभी प्यार की सच्ची पराकाष्ठा को समझा जा सकेगा. अगर ऐसा हुआ तो हर दिन, हर रात वैलेंटाइन डे की तरह होगी।

शंकर जालान, वरिष्ठ स्तंभकार

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