अशोक रोड पर जामुन और तीन मूर्ति पर मिलेगी इमली 

लुटियंस दिल्ली में एक सड़क पर एक ही प्रजाति के लगे हैं पेड़, अंग्रेजों ने बनाई थी योजना

गर्मियों के दिनों में शायद एक लुटियन जोन ही है जहां से गुजरते वक्त तपती गर्मी की तपिश का अहसास ही नहीं होता। मई की चिलचिलाती गर्मी में हरी पत्तियों से ढकी साखों के साए से लिपटी सड़कें, वीआईपी बंगलों से झांकती कच्ची अमियां के पेड़, जामुन के पेड़ों पर मंडराते मधुमक्खी, इमली के दरख्तों के बीच झांकती किरणों को देख प्रकृति की रोमानियत में खो जाने को दिल चाहने लगता है। दिल्ली के तमाम एवेन्यू में इस अहसास को जगाने वाले पेड़ों की किस्में हैं जो छाएदार होने के साथ साथ फलदार भी हैं। लुटियन दिल्ली (lutyens delhi) की अशोका रोड (Ashoka road), अकबर रोड (Akbar road) रायसीना रोड (Raisina road) पर लगे इमली ,जामुन के पेड़ों के एवेन्यू से गुजरते समय कई सवाल भी उमड़ते घुमड़ते हैं कि आखिर सड़कों को क्यों इस तरह सजाया गया। दरअसल, ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियन (edwin lutyens) ने जब नई दिल्ली को बसाया तब ब्रिटेन की तर्ज पर सड़कों के किनारे छायेदार पेड़ लगाए गए। अर्जुन, नीम, इमली, जामुन, पीपल सहित कई अन्य पेड़ों के एवेन्यू बनाए। राजेश पायलेट मार्ग (rajesh pilot marg) पर महुआ के पेड़ भी लगाए गए। इन सब के बीच आम, अमरूद के पेड़ भी लगाए गए लेकिन बंगलों के अंदर। सांसदों के सरकारी आवास में फलों के राजा आम के पेड़ों की बादशाहत पूरी है। फिर चाहे सांसद देश के किसी कोने के हो। ज्यादातर सांसदों के आवास में आम, अमरूद के पेड़ लगे हुए हैं। इन दिनों इन बंगलों से हो कर गुजरते समय कच्ची अमियां भी इठ्लाती दिख जाती है। खासकर तीन मोतीलाल नेहरू मार्ग (3, Motilal nehru marg) पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (ex priminister manmohan singh) का आवास है। इस आवास में लगे फलदार पेड़ पौधों के साथ यहां चमगादड़ भी आर्कषण का केन्द्र है।

वहीं, पुरानी दिल्ली के मिजाज में ही बाग बगीचों की शीतलता को महसूस किया जा सकता है। यह बात और है कि अब बाग बगीचे सिर्फ नाम में रह गए हैं। चांदनी चौक के अंगूरी बाग, कच्चा बाग, मेहताब बाग, चार बाग, रौशन आरा बाग, कुदेसिया बाग, तीस हजारी जैसे न जाने कितने स्थान हैं जो बागों के नाम पर है। ऐसा नहीं था कि पहले सिर्फ पुरानी दिल्ली में ही बाग हुआ करते थे। दक्षिणी दिल्ली में जोर बाग, मोती बाग, महारानी बाग, उत्तरी दिल्ली में शालिमार बाग, रानी बाग, मीना बाग जैसे कई क्षेत्र हैं। जानकारों के मुताबिक मुगल बादशाहों के समय बाग- बगीचों का काफी महत्व हुआ करता था। बादशाह अपने लिए खासतौर पर बाग बगीचे लगवाते थे। बहादुर शाह जफर ने अपनी रचनाओं में आम के बागों का जिक्र किया है। कहा जाता है कि चांदनी चौक में कुदेसिया बाग में संतरे व आम के पेड़ हुआ करते थे। रानी कुदेसिया के बाग में करीब 600 से अधिक आम व संतरे के पेड़ थे जो 1857 की क्रांति में नष्ट कर दिए गए। इसी दौरान दिल्ली के कई बागों को अंग्रेजों ने नष्ट कर अपना कैंप बना दिया। उसी में से एक मेहताब बाग भी है। कहां जाता है यहां शाहजहां ने उम्दा किस्मों के आम के पेड़ लगाए थे। इसलिए आज भी उसका नाम कच्चा बाग है। सड़क के किनारे भी फलदार पेड़ लगाने का रिवाज था। मुगलबादशाहों ने जहां जहां भी राज किया वहां वहां फलदार पेड़ लगाए। इसके पीछे दो कारण हुआ करते थे। एक तो फलदार पेड़ों के नीचे घनी छाया होती है और दूसरा इन पेड़ों के फल राहगीरों की भूख भी मिटा सकती है। अंग्रेजों के लगाए गए जामुन के पेड़ों ने दिल्ली वासियों के जामुन के फलों की समस्या को दूर कर दिया था। कुछ साल पहले तक अशोका रोड से लेकर इंडिया गेट पर लगे सभी जामुन के पेड़ों का ठेका छोड़ा जाता था और इस पेड़ के नीचे जामुन बेचा जाता था। जामुन के पेड़ों में जामुन आ चुके हैं लेकिन बरसात में यह पकने लगेंगे। तब लुटियन जोन के उन तमाम एवेन्यू में जहां जामुन लगे हैं वहां जामुन बेचने वाले दिख जाएंगे।

राष्ट्रपति भवन में आम के बागान

जहां आज राष्ट्रपति भवन है वो कभी रायसीना हिल्स हुआ करता था। इस रिज क्षेत्र में जंगली पेड़ के सिवाय कुछ नहीं था। लेकिन जब राष्ट्रपति भवन तैयार हुआ तब यहां पूसा ने कई पेड़ लगाए। उस समय इस भवन में आम, अमरूद, नींबू, कीनू के पेड़ लगाए गए। इनमें से आज भी कई पेड़ भवन में लगे हुए हैं। करीब नब्बे साल पहले के कई पेड़ आज भी हैं। चीकू के भी कई पेड़ लगाए गए हैं।

माननीयों के पसंदीदा फल के पेड़ों की बगिया

लुटियन जोन पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बंगले में भी कई फलदार पेड़ लगे हैं जिसमें दशहरी और मल्लिकका आम के पेड़ देखे जा सकते हैं। इसी तरह फिरोज शाह रोड के किनारे बने सासंदों के निवास में भी कई आम के पेड़ देखे जा सकते हैं। केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू, मंत्री नितिन गडकरी सहित कई माननीयों के निवास में भी आम व जामुन के पेड़ लगे हैं।

बिट्रिश शासकों के पेड़ों से सजी दिल्ली

प्रदीप कृष्ण, पर्यावरणविद व लेखक

बिट्रिश शासकों ने अपने शहरों की तरह दिल्ली की सड़कों व कॉलोनियों में पेड़ लगाए। वास्तुकार लुटियन ने जब शहर में भवन व बंगले बनाए, उन बंगलों में भी आम के पेड़ों को तरजीह नहीं दी। इमली, जामुन, शहतूत जैसे फलों के पेड़ जरुर लगवाए लेकिन इसके पीछे इनका फलदार पेड़ होना कतई इसका कारण नहीं था। अंग्रेज शहर को खूबसूरत बनाने के मकसद से ऐसे पड़े लगाए जो एक साथ अपने पत्ते नहीं गिराता है। उनके अनुसार शहर हर मौसम में हरा भरा दिखना चाहिए। इसी कांसेप्ट को आज भी उनके शहरों में पेड़ पौधे लगाने लगाए जाते हैं। अंग्रेजों ने लुटियन जोन में कई खूबसूरत एवेंन्यू बनाए। जिसमें अशोका रोड, राजपथ, सुनहरी बाग, तुगलक रोड, मोतीलाल नेहरु मार्ग, महादेव मार्ग, तालकटोरा रोड पर जामुन के पेड़ लगाए। तिलक मार्ग, अकबर रोड, तीनमूर्ति मार्ग पर इमली के पेड़ लगाए। राजेश पायलट मार्ग पर सिर्फ महुआ के पेड़ लगाए। लुटियन जोन में इसी तरह करीब 17 एवेन्यूज हैं। आजादी के बाद केन्द्रीय लोकनिर्माण विभाग ने एवेन्यू के साथ छेड़ छाड़ नहीं की। इस क्षेत्र में ज्यादा बदलाव भी नहीं किए गए। ब्रिटिश प्रशासन ने पेड़ों का चयन इस प्रकार किया जिससे सड़क पर बिना पत्तों वाली कोई पेड़ न लगे। दिल्ली के मौसम के अनुसार सितंबर के महीने से लेकर जनवरी तक बारिश नहीं होती। ऐसे में इस तरह के पेड़ लगाए गए जो कम पानी के साथ भी फल फूल सके। सर्दियों में अगर कुछ पत्ते झड़ते भी हैं तो कुछ ऐसे पेड़ भी हैं जो इस मौसम में काफी हरे भरे रहते हैं। अंग्रेजों के उद्यान लगाने वालों ने योजना के तहत ऐसे सुंदर वृक्ष लगाए जो सड़कों के किनारे न केवल छाया देते हैं बल्कि शहर को सुंदर भी बनाते हैं।

मुगल बादशाहों ने लगाए फलों के पेड़

डॉ. एस के सिंह, पूसा के उद्यान विभाग निदेशक

दिल्ली के कई क्षेत्रों के नाम बाग से यू ही नहीं रखे गए। जब युमना नदी पुरानी दिल्ली के करीब से गुजरा करती थी, तब इसके आसपास के क्षेत्र में कई बाग लगाए गए। इन बागों में फलों के पेड़ों को प्रमुखता दी जाती थी। अगर बात करें लालकिले के पीछे की तो खुद आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर ने भी अपने लेखनी में फलों के बागों की खूबसूरती का जिक्र किया है। दरअसल मुगलों ने सड़कों के किनारे भी फलों के पेड़ों को प्राथमिकता दी। कहा जाता है कि ग्रैंड ट्रंक सड़क के किनारे सिर्फ आम के पेड़ हुआ करते थे। अब तो शहरीकरण की होड़ में पेड़ ही गायब हो रहे हैं। दिल्ली में भी आम्रपाली, लंगड़ा, चौसा, दशहरी जैसे कई देसी वैरायटी के आमों के पेड़ लगते हैं। वैसे अंग्रेजों ने जामुन के पेड़ लगाए क्योंकि इसकी छाया के साथ इसमें हवा को शुद्ध करने की भी छमता पाई जाती है। इसलिए लुटियन जोन में जामुन के पेड़ के एवेन्यू ज्यादा बनाए गए। दिल्ली में आज भी आम के पेड़ लगाए जा रहे हैं। पूसा में तो कई वैरायटी इजाद की गई है। दशहरी व अलफांजों, नीलम से कई वरायटी तैयार की गई है। यही से तैयार की गई आम, अंगूर की वैरायटी सांसदों की कोठियों में लगाए गए हैं। पूसा प्रतिभा आम की किस्म है जो राष्ट्रपति भवन में लगाया गया है। यह पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के नाम पर रखा गया था। राष्ट्रपति भवन में तो मल्लिका आम के कई वैरायटी लगाई गई है।

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