मुगलों के आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर को कुश्ती और कसरत का बहुत शौक था। उसके काल में उस्ताद सिद्दीक और उस्ताद सुखदेव अपनी असाधारण शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। कहा जाता है कि उनके शारीरिक बल का यह हाल था कि अगर किसी हाथी को दुम से पकड़ लेते तो वह आगे को हिल भी नहीं सकता था। यह भी मशहूर था कि इनमें से कोई अगर किसी सिक्के को हाथ में लेकर हाथ में अंगूठे और उंगलियों से रगड़ता तो उस सिक्के से सारे अक्षर घिस जाते। सैयद अहमद देहलवी का कथन है कि सुखदेव महाराजा अलवर के दरबार का पहलवान था । 1857 ई. के पहले स्वाधीनता संग्राम से कुछ ही दिन पहले वह बहादुरशाह के दरबार में पेश हुआ और बोला, “हुजूर सारे शहर में मुनादी करा दें कि अगर किसी को मुझसे कुश्ती करने का हौसला हो तो कल लाल किले के झरोखों के नीचे आ जाए। अगर कोई नहीं आया तो मैं समझ लूंगा कि कोई पहलवान मुझसे टक्कर लेना नहीं चाहता और मैं हमेशा के लिए कुश्ती लड़ना छोड़ दूंगा” दूसरे दिन झरोखों के नीचे जमना की रेती पर दिल्ली वालों और आसपास के रहनेवालों की भीड़ इकट्ठी हो गई और एक मेला-सा लग गया। मगर किसी को सुखदेव से लड़ने का हौसला न हुआ।

बादशाह खुद झरोखे में बैठे हुए देख रहे थे। सुखदेव एक मस्त हाथी की तरह अकेला खड़ा ललकारता रहा मगर कोई सामने नहीं आया। फिर उसने भारी-भारी मुगदर हिला-हिलाकर, जोर और मेहनत करके अपनी ताकत और वीरता का प्रदर्शन किया। फिर वह बादशाह के झरोखे के नीचे खड़ा होकर हाथ जोड़कर बोला, “जहांपनाह अब इजाजत दीजिए। मुझसे कोई लड़ना नहीं चाहता।” यह कहकर सुखदेव ने लंगर लंगोट खोलकर कपड़े बदले और अपने कथन के अनुसार आइंदा कुश्ती न लड़ने की शपथ ली। बहादुरशाह जफ़र ने सुखदेव की वीरता और मर्दानगी से प्रभावित होकर फ़िलबदीह’ यह शेर कहा और उसे एक चांदी की तख़्ती पर खुदवा कर सुखदेव के गले में डलवा दिया-

सूरत-ए-रुस्तम, सीरत-ए-गेव यकता गुरु महासुखदेव

पहलवानी मर्दों का शौक और कला समझी जाती है। इसलिए कुश्ती और पहलवानी के साथ औरत का नाम नहीं जुड़ता। मगर आज से आधी सदी या उससे पहले किसी नारी की तैराकी या कुश्ती के कपड़ों में देखे जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। लेकिन साहब आधी सदी पहले भी हिन्दुस्तान में नारी पहलवान हुई है, और ऐसी, जिन्होंने मशहूर पुरुष पहलवानों को पछाड़ दिया। ऐसे दो नाम हठात् मन में उभरते हैं एक हमीदा बानो का और दूसरा तारा बाई का।

हमीदा बानो काफी मशहूर हो गई थी और उसने दिल्ली और पंजाब में काफ़ी कुश्तियां लड़ीं। लोग उसे और उसकी कुश्ती को देखने दूर-दूर से पहुंच जाते थे। वह बिल्कुल मर्द पहलवानों की तरह लड़ती थी हालांकि कुछ का यह कहना था कि हमीदा बानो और मर्द पहलवान का आपस में गुप्त समझौता हो जाता था और वह जानकर हमीदा बानो से हार जाता था। ताराबाई बाद में सर्कस में शामिल हो गई और तार पर चलती थी। उसके बहुत-से कारनामों में अपने लंबे बालों से बांधकर बहुत भारी पत्थरों को जमीन से ऊपर उठाना शामिल था।

अंग्रेज़ों के जमाने में दिल्ली वालों ने धीरे-धीरे अखाड़ों में जाना बंद कर दिया। ऊंचे घरों के नौजवान लड़कों का नजरिया बदल गया और वे कुश्ती और पहलवानी को अच्छी निगाह से नहीं देखते थे। वे क्रिकेट, हॉकी, फुटबाल और वॉलीबाल वग़ैरह में दिलचस्पी लेने लगे और कुश्ती और पहलवानी ग़रीब लोगों और पिछड़े हुए तबक़ों के लोगों तक सीमित हो गई। जैसा कि स्वाभाविक था अखाड़ों की संख्या भी कम हो गई। फिर जीविका की चिंता और जनता की तंगदस्ती भी एक रुकावट बन गई। दिन-भर की मेहनत-मज़दूरी के बाद पहलवानी क्या होगी और वह खुराक जो दो-चार आनों में मुहैया हो जाती थी, दो चार रुपए में भी मुश्किल थी। फिर भी ग़रीब और कम पढ़े-लिखे लोगों के सहारे अखाड़ों की प्रथा दिल्ली में बनी रही। हां, कुश्ती और दंगल में बड़े-बड़े राजा-महाराजा रुचि रखते थे। उनकी रियासतों में कलाकारों की तरह नामी पहलवानों की भी क़द्र होती थी।

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