1857 की क्रांति: अंग्रेजी सरकार ने बहादुर शाह जफर पर मुकदमा चलाया। उनके ऊपर अभियोग लगाने के लिए तीसरी कैवेलरी के मेजर जेएफ हैरियट को जज एडवोकेट जनरल नियुक्त किया गया।

अभियोग पक्ष इस बात पर बहुत खुश था कि बहादुर शाह जफर न ज्यादा विस्तृत और गंभीर कानूनी सफाई पेश करने की कोशिश नहीं की और न ही किसी गवाह से सवाल-जवाब करना चाहा। क्योंकि जैसे-जैसे यह तमाशा आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे पेश किए गए गवाहों और सुबूतों के ढेर के बावजूद, उनके खास बिंदु की हास्यासपदता ज़्यादा से ज़्यादा स्पष्ट होती गई। इस बड़े सवाल से हटके कि इस अदालत को ज़फर पर मुकद्दमा चलाने का अधिकार है भी या नहीं, अभियोक्ता मेजर हैरियट ने ऐसा स्पष्ट रूप से छिछला काल्पनिक केस बनाया और बगावत के बारे में समझ की ऐसी कमी दर्शाई कि वहां मौजूद वह सारे अंग्रेज समीक्षक जो मुकद्दमे का हिसाब रखते थे, भी उसके तर्क को मानने को तैयार नहीं थे।

हैरियट का कहना था कि बहादुर शाह जफर कुस्तुनतुनिया से लेकर मक्का, ईरान और लाल किले की दीवारों तक फैली हुई एक बहुत बड़ी अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी साजिश के सरगना और सरदार थे। हैरियट ने कहा कि उनका इरादा बा कि ब्रिटिश हुकूमत को तबाह करके मुगलों को उस की जगह पर बिठाया जाए। उन सारे सुबूतों के बावजूद कि बगावत की शुरुआत ज्यादातर हिंदू सिपाहियों के दस्तों में हुई थी और लड़ने वाले बलों में पूरे वक़्त ज्यादातर ऊंची आर के हिंदू भरे हुई थी और लड़ने से, क्रांतिकारियों , ईरान के शीया मुसलमानों और दिल्ली के सुन्नी दरबार के बीच भेद को बिल्कुल नजरअंदाज करते हुए का बहस करता रहा।

उसने कहा, “हम 1857 का इस्लामी साजिश का नतीजा कह सकते हैं। यह साजिश शुरू से ही सिर्फ सिपाहियों तक सीमित नहीं थी और न ही उनसे शुरू हुई थी। इसकी जड़ें सारे किले और शहर में फैली हुई थीं और ज़फर दिल्ली के क्रांतिकारियों का खास सरदार था… इंसान के दिल में पैदा होने वाली किसी भी भावना से अनजान, इस सिकुड़े हुए दुर्भावना के प्रतिरूप ने अपने चारों ओर इकट्ठा दुष्टों का कोई अयोग्य केंद्र नहीं चुना होगा… हम देखते हैं कि मुसलमानों ने कितनी जल्दी और कितनी शिद्दत से इस मामले में दिलचस्पी और हिस्सा लिया और किस तरह यह बगावत अपने चरित्र में पूरी तरह से इस्लामी थी…

“क्या जफर इसका मूल प्रेरक था, इस सारी कार्रवाई का अगुवा था? एक सामने आने वाली, अनैतिक लेकिन फिर भी लचकदार कठपुतली जिसे चालाक मुल्लों ने धर्मांधता को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया था? मुझे यकीन है कि बहुत से लोग इसी से सहमत होंगे। इस्लामी कट्टरपन की जानी-मानी बेचैन भावना इसका पहला कदम रही, इस मजहब की प्रतिशोधी असहिष्णुता अपने प्रभुत्व के संघर्ष में लगा है, बागी साजिश इसका साधन रही है, यह कैदी इसका सक्रिय सह अपराधी रहा है, और हर किस्म का संभव अपराध इसका भयानक नतीजा रहा है… लेकिन वास्तव में बगावत में एक ऐसा संकेत था कि इसे ऊंची जात के हिंदुओं ने शुरू किया था, जिन्हें स्पष्ट रूप कुछ ऐसी फौजी शिकायतें थीं, जिनसे उनकी जात और धर्म को खतरा था।

फिर यह बहुत ज़ोर-शोर से पूरे मुल्क में फैल गई और इसमें और बहुत से विभिन्न और बिखरे हुए ग्रुप शामिल होते गए, जो अंग्रेजों की आक्रामक रूप से असंवेदनशील और क्रूर नीतियों की वजह से नाराज थे। इन्हीं में मुगल दरबार भी था और बहुत से और मुसलमान भी थे, जो दिल्ली आ गए और आपस में मिलकर क्रांतिकारियों  की तरह काफिरों से जंग लड़े। लेकिन हैरियट ने अपनी धर्माधता और इस्लाम-दुश्मनी की वजह से इस पेचीदा मसले को बहुत सरल करके पेश किया और उसने इसे एक फर्जी लेकिन आसानी से समझ में आ जाने वाली अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी साजिश करार दिया, जिसका केंद्र उसने उस कैदी को बना दिया जो सबकी घृणा का पात्र था और जिसकी और वह अपने धार्मिक प्रतिशोध का रुख मोड़ सकता था।

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