1857 की क्रांति : बगावत के दौरान का एक अन्य दस्तावेज बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह शायद मुगल शहजादे मिर्जा मुगल या उनके दफ्तर से जारी नहीं हुआ था। यह एक उल्लेखनीय घोषणापत्र है, जिसे दिल्ली के बादशाह के घोषणापत्र (जो कि गलत है, क्योंकि ज़फ़र से उसका कोई ताल्लुक नहीं था) या आजमगढ़ घोषणा के नाम से जाना जाता है।

पिछली घोषणाओं के विपरीत यह बिल्कुल मजहबी नहीं है बल्कि धर्मनिरपेक्ष है। इसमें विभिन्न गुटों की बहुत सी और शिकायतों का जिक्र था। यह गुदर के जमाने में राष्ट्रीय आज़ादी के आंदोलन का पहला मसौदा था। उसके पहले ही वाक्य से इसका अंदाज़ा हो जाता है, जिसमें हथियार उठाने का नारा है। क्योंकि ‘हिंदू और मुसलमान दोनों ही काफिर और दुष्ट अंग्रेज़ों के जुल्मो-सितम से बर्बाद हो रहे हैं।’

हालांकि उसमें लिखा था कि ‘इस वक्त अंग्रेजों से मजहब के बारे में जंग हो रही है,’ और ‘पंडितों और फकीरों’ से इल्तेजा की गई थी कि वह मुगल फौज में शामिल हो जाएं। लेकिन उसके बाद बाकी घोषणापत्र अंग्रेज़ों की शिकायतों से भरा हुआ था। किस तरह उन्होंने जमींदारों और जागीरदारों पर भारी टैक्स लगा दिया है और फौज और हुकूमत के ‘सब इज़्ज़तदार और पैसे वाले’ ओहदे सिर्फ अंग्रेज़ों के लिए हैं, और बाजार को सस्ती अंग्रेज़ी चीज़ों और सामान से भरकर हिंदुस्तानी कारीगरों को बिल्कुल बेरोजगार कर दिया है।

कुछ इतिहासकारों को जब 1857 का यह दुर्लभ मसौदा मिला, जिसमें ख़ासतौर से उस जमाने की समाजी और आर्थिक मुश्किलों का जिक्र था, तो उन्होंने इस असाधारण रूप से आधुनिक मसौदे को लाल किले से जोड़ दिया, जिससे उसका महत्व और असर बढ़ गया। हालांकि असल में इसका लिखने वाला एक गैर अहम और रहस्यमयी शाहजादा फीरोज शाह था, जो शायद ज़फर का पोता था लेकिन ज़्यादातर लखनऊ और अवध में लड़ा था, और बगावत के जमाने में एक बार भी दिल्ली नहीं आया था। शायद इसीलिए उसने जिन धर्मनिरपेक्ष बातों का जिक्र किया है, वह अपने लहजे और अभिव्यक्ति में उससे बहुत भिन्न हैं, जो उस जमाने में मुगल राजधानी में शिकायतों के रूप में लिखा जा रहा था।

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