1857 की क्रांति: बहादुर शाह जफर में और बहुत ख़ूबियां थीं, लेकिन फैसला नहीं कर पाना उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी। ब्रितानिया हुकूमत के दिल्ली रेजिडेंट की बेटी एमिली ईडन अपने दिल्ली के निवास के दौरान का एक वाके़आ बयान करती हैं। 1838 में जब जफर वलीअहद थे तो उनसे बहुत बलपूर्वक कहा गया कि वह उनके भाई लॉर्ड ऑकलैंड के पास पेश हों जो गवर्नर जनरल थे।
जफर फ़ैसला नहीं कर पाए कि उन्हें जाना चाहिए या नहीं और आखिरकार वह बिस्तर पर लेट गए और तेरह डाक्टरों से एक के बाद एक कहलवा भेजा कि वह बहुत बीमार हैं। सारी दोपहर वह इसी दुविधा में रहे और फिर उन्होंने अपना फैसला बदल दिया और आने का इरादा कर लिया।
इस अर्से में हमारे आधी सिपाही जो दरबार में हाजरी दे रहे थे मारे गर्मी के बेहोश हो रहे थे। इसी तरह 1852 में जब जफर का मिर्ज़ा फखरू से झगड़ा हुआ तो वह हर हफ्ते अपनी राय बदलते रहे। एक दिन वह अपने बड़े बेटे को दरबार में आने से मना कर देते और किसी को भी उनसे संपर्क रखने पर पाबंदी लगा देते और दूसरे दिन उनसे बेहद मुहब्बत का इज़हार करते और सब दरबारियों से कह देते कि उनसे मिलने में कोई हर्ज़ नहीं और ना ही उनकी बरसात की पार्टियों में शामिल होने पर कोई पाबंदी है।