बगावत के बीच चांदी के तख्त पर क्यों बैठे बहादुर शाह जफर

1857 की क्रांति: दिल्ली के आसपास के इलाकों में तो हालात और भी बदतर थे। जब ज़फ़र ने अलवर के राजा के पास फौज और मदद मांगने के लिए अपने कुछ सवार भेजे तो गूजरों ने उन पर रास्ते में महरौली के पास हमला कर दिया। और वह नंगे और जख्मी पैदल वापस आए और शिकायत की कि गूजरों ने उनके कपड़े, घोड़े और सब पैसे छीन लिए और उनसे बादशाह का ख़त भी छीनकर उसके टुकड़े-टुकड़े करके उनके हाथ में रख दिया। जफर ने इस उम्मीद में कि शायद वह यह लूटमार बंद करवा सकें और शहर के हालात काबू में ला सकें, अपने दरबार के कुछ आला अफसरों को किले में बुलवा भेजा ताकि उनसे मशवरा कर सकें कि अब क्या करना चाहिए। उन्होंने उनसे एक चांदी के तख्त पर बैठकर मुलाकात की, जो काफी दिनों से इस्तेमाल नहीं किया गया था, जबसे 1842 में उस पर बैठकर गवर्नर जनरल से नज़र कुबूल करने की रस्म ख़त्म कर दी गई थी। अब उसको निकालकर उस पर पॉलिश की गई और उसको दीवाने खास में लगा दिया गया।

और कोई विकल्प नहीं होने की वजह से दरबार के लोगों ने फैसला किया कि बादशाह सलामत एक जुलूस निकालें और उसमें हाथी पर बैठकर जाएं और मिर्ज़ा जवांबख्त उनके पीछे बैठें। और कुछ पैदल फौज के सिपाही, कुछ तोपें और उनके अपने शाही हथियारबंद ख़िदमतगार, और एक संगीतकारों का दल उनके साथ हो, और वह शहर की खाली और लुटी हुई सड़कों पर से गुजरें, तो शायद शहर में शांति की कोई उम्मीद हो। इस तरह यह जुलूस निकला और नक्कारे की आवाज़ के साथ ऐलान किया गया कि “हिंदुस्तान फिर से बादशाह सलामत के कब्जे में आ गया है। और जफर को वह सत्ता वापस मिल गई है, जो हमेशा से उनका अधिकार था। अब यह लूटमार फौरन बंद हो जानी चाहिए और दुकानों पर भी फिर से कारोबार शुरू कर देना चाहिए।” इसके अलावा शहजादा मिर्ज़ा मुगल भी हाथी पर सवार होकर हर बड़े पुलिस थाने में गए और ऐलान किया, “अगर कोई भी लूटमार करते पकड़ा गया, तो उसके नाक-कान काट दिए जाएंगे। जफर के किले से निकलते वक़्त इक्कीस तोपों की सलामी दी गई, और फिर उनकी वापसी के समय भी।

लेकिन यह जुलूस अब तक के सारे जुलूसों से बहुत भिन्न था, जिनमें ज़फ़र जगह-जगह रुककर नज़राने कुबूल करते थे। अब तो ‘हर घर से जहां से बादशाह गुजरे, उन्हें लोगों की फरियाद और दर्खास्तें सुनाई दीं। कभी उन अंग्रेज़ों के नौकरों की जिनकी मालिकों को कत्ल कर दिया गया था, तो कभी उन दुकानदारों की जिनकी दुकानें लूट ली गई थीं, कभी दिल्ली के शरीफ लोगों की जिनके घरों में लोग घुस आए थे। यह सब बादशाह से फ़ौरन मदद के उम्मीदवार थे और हर जगह उनसे फरियाद थी कि उस लूटमार को रुकवाएं, जो शहर में हर तरफ मची हुई थी।”

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