1857 की क्रांति: बगावत से पहले दिल्ली में कई अजीबो गरीब घटनाएं हुई। पहले एक विज्ञापन दीवार पर लगाया गया, जिसमें दावा किया गया था कि ईरान की सेना दिल्ली आ रही है। ब्रितानिया हुकूमत से लोहा लेने के लिए। इस के अलावा उर्दू अख़बारों में एक अजीब रहस्यमयी रोटी (या, दिल्ली के अख़बारों के मुताबिक, तली हुई पूरी) का ज़िक्र आ चुका था जो रात को चौकीदारों के जरिए हिंदुस्तान भर के हर गांव में भेजी जा रही थी।

फरवरी 1857 में एक अख़बार “नूरे मगरिबी” ने भी इसका ज़िक्र किया था कि वह बुलंदशहर के आसपास के गांव में पहुंच चुकी है और शुरू मार्च में वह मथुरा में भी पाई गई जो आगरे के रास्ते में पड़ता है। लेकिन अभी वह दिल्ली तक न पहुंची थी और वहां कोई न जान पाया था कि उसकी क्या अहमियत है। जहां तक दिल्ली के अख़बारों का ताल्लुक था तो उनमें उस रोटी के ज़िक्र से ज़्यादा मद्रास के उस फतवे का ज़िक्र आ रहा था, जिसमें सब अहले-दीन को ललकारा गया था कि वह काफिरों के खिलाफ बगावत करें।“ वह जो उस जिहाद में मारा जाएगा वह शहीद कहलाएगा,” और इन आशाजनक अफवाहों का ज़िक्र था कि रूसी या ईरानी या शायद दोनों फौजें हिंदुस्तान की तरफ कूच कर रही हैं और बहुत जल्द दिल्ली पहुंचने वाली हैं। सबसे प्रमुख ख़बरें जो आखिर मार्च से अख़बारों में देखी जाने लगीं वह बंगाल की, खासतौर पर बहरामपुर और बैरकपुर की फ़ौजों में बगावत और हलचल का जिक्र था। थियो का कहना था कि 1857 में गर्मियों से पहले ही दिल्ली के लोगों को खूब अंदाज़ा हो गया था कि सिपाहियों में अंग्रेज़ों की वफादारी ख़त्म हो रही थी। और हर जगह इसी बात की चर्चा थी।

दिल्ली की यह बढ़ती बेचैनी पिछली सर्दियों के मौसम से ही शुरू गई थी, जब 7 फ़रवरी 1856 को अंग्रेज़ों ने एकतरफा फैसला करते हुए अवध की हुकूमत पर क़ब्ज़ा कर लिया था और उसकी वजह यह बताई गई कि वहां के नवाब वाजिद अली शाह जो शायर, रक्कास और एक रसिया थे, बहुत ज़्यादा अय्याश हैं। हालांकि दिल्ली के लोग अंग्रेज़ों के नवाबों को लूटने और धमकाने के आदी हो चुके थे जो वह पिछले सौ साल से करते आ रहे थे, लेकिन इस तरह किसी सल्तनत पर आक्रामक रूप से कब्ज़ा कर लेने पर सारे उत्तरी भारत में ख़तरे की लहर दौड़ गई। जिसकी न अंग्रेज़ों को उम्मीद थी और न ही कोई अंदाज़ा था। इस वाकुए से मुग़लों को भी अपनी सलामती की फिक्र हो गई और सबसे ज़्यादा यह कि कंपनी की अपने फौज के सिपाही बहुत बेचैन होने लगे क्योंकि उनमें से ज़्यादातर यूपी के देहातों के ऊंचे तब्कों से ताल्लुक रखने वाले हिंदू थे और उनको यह महसूस होने लगा कि वो अपने ही मुल्क को गुलाम बनाने के लिए लड़ने को मजबूर हो रहे हैं। जिस बेहिसी और क्रूर ढंग से अवध पर क़ब्ज़ा किया गया था, वह सब हिंदुस्तानियों के लिए बहुत तकलीफदेह था।

खुद अंग्रेज़ अफसरों को भी यह अहसास था कि जो कुछ हुआ है वह कंपनी की तारीख़ में कोई गौरवशाली कारनामा न था। कंपनी के एक अफसर रॉबर्ट बर्ड ने तो यहां तक किया कि एक गुमनाम किताब प्रकाशित की जिसका शीर्षक था डाका डालने में महारत, या ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों अवध की तबाही।” इस किताब में बर्ड ने, जो अंदरूनी हालात से वाकिफ था, सारा वाकेआ बयान किया है और तफ्सील से बताया कि किस तरह एक फर्जी मसौदा कुछ शरारती लोगों ने अवध पर कब्ज़ा करने की ख़ातिर तैयार किया। जो बाद में पार्लियामेंट की अवध की खुली किताब के नाम से प्रकाशित किया गया और जिसका मकसद अवध पर कब्ज़ा करने पर ज़ोर देना था। इस मसौदे में एक ऐसे सूबे की तस्वीर दिखाई गई थी जहां हुकूमत के कुप्रशासन और अनैतिकता की वजह से जुर्म, जुल्मो सितम और अराजकता फैली हुई थी। लेकिन यह सब अफ़सरों की मनगढ़त रचना थी। और उसका सुबूत यह ठोस हक़ीक़त थी कि अवध के लोग अपने नवाब की बदनाम की हुई हुकूमत को अंग्रेज़ों की बजाहिर खुशनुमा, लेकिन असल में लालची हुकूमत से कहीं ज़्यादा पसंद करते थे ।

बर्ड ने खासतौर पर कहा, “जिन लोगों को दोनों हुकूमतों का तजुर्बा हुआ है यानी कंपनी के 50,000 के करीब मुलाजिम सिपाही, वह दोनों हुकूमतों के फर्क को खूब महसूस करते हैं। यह क़ब्ज़ा उन जुल्म और लूटमार के साथ किया गया। सारी जायदादों और जागीरों की बुनियाद को भी इस तरह हिला दिया गया जो किसी सभ्य हुकूमत में न देखा गया न सुना गया। हमें हर तरफ से ख़बरें मिल रही हैं कि ज़मींदारों और जागीरदारों से उनकी जमीनें छीन ली गईं। कंपनी ने सूबे के साथ ऐसा सुलूक किया था जैसे उसको न सिर्फ इसकी आमदनी पर पूरा हक हो, बल्कि प्रांत के अंदर सारी संपत्ति पर भी, जैसे ये कोई बिल्कुल नया खोजा गया द्वीप हो जिसकी हर चीज़ पर उनको अपनी मर्जी चलाने का पूरा अधिकार हो।

कंपनी पहले ही बहुत ख़ामोशी से कई छोटी-छोटी जागीरें और सल्तनतें जब्त कर चुकी थी। जिससे उसे बहुत फायदा हुआ। गवर्नर जनरल डलहौजी (1812-1860) की नई नीति ‘उत्तराधिकारी न होने पर अधिकार ज़ब्त हो जाने का आदेश’ से बेटा न होने पर किसी लेपालक को गद्दी पर बिठा दिए जाने की सदियों पुरानी हिंदू प्रथा को ख़त्म कर दिया गया और उसके लागू होने के बाद जब उसके तहत जब 1848 में सतारा की, 1853 में झांसी की और 1854 नागपुर की हुकूमतों पर कब्जा किया गया, तो लोगों में में बहुत नफरत और गुस्से का जज्बा पैदा हो गया था। लेकिन अवध का कब्ज़ा बिल्कुल ही भिन्न और बड़े पैमाने पर था क्योंकि यह एक वफादार और अविरोधी हुकूमत थी और यहां यह बहाना भी नहीं था कि कोई कानूनी वारिस नहीं है। इसलिए उस फ़र्ज़ी, मनगढ़त और गलत अवध की खुली किताब का बहाना बनाया गया।

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