हलवाई का जिक्र आए और घंटेवाले शाही हलवाई का जिक्र ना हो, यह नामुमकिन है। 1712 ई. में लाला सुखलाल नाम का एक हलवाई जयपुर से दिल्ली आया। उसने पहले पटरी पर सामान बेचा एवं फिर दुकान किराए पर ली। उसने अपनी दुकान की छत पर बहुत-सी घंटियां लटका दीं। ये घंटियां मंदिरों में लटकी हुई घंटियों जैसी थीं। थोड़ी-थोड़ी देर बाद दुकान के नौकर उन घंटियों को बजाते रहते।

कहा जाता है कि आलम शाह की मदद के लिए जब महाराजा सिंधिया दिल्ली आए तो चांदनी चौक में बादशाह का दरबार सजाया। बादशाह की सवारी आई तो उस हलवाई ने घंटे बजा-बजाकर स्वागत किया। उस मकान के पास जिसमें दुकान थी, राजा जुगलकिशोर की हवेली के दरवाजे पर एक घंटा लटका रहता था। हलवाई घंटेवाले के नाम से मशहूर हुआ और हवेली में आने-जाने वाली औरतों के कहार उस जगह को ‘घंटे नीचे’ कहा करते थे।

यों घंटेवाला शाही हलवाई पिस्ते की लौज (बरफ़ी), मोती पाक, तिरखूंट, बोनट बादाम, खोया और नुक्ती के लड्डू, मक्खन बड़े, इमरतियां, फेनी, अंदरसे की गोलियां और बहुत-सी दूसरी मिठाइयां बनाता था। मगर उसका कलाकंद, हलवा सोहन, सोहन पपड़ी और नान खताई किलेवालों को बहुत पसंद थीं। उस दुकान से बादशाहों, बेगमों और शहजादियों के यहां मिठाई के थाल जाते थे।

दिल्ली वाले हलवाई का नाम तो भूल गए लेकिन दुकान घंटेवाले शाही हलवाई के नाम से दिल्ली में ही नहीं बल्कि सारे हिन्दुस्तान में मशहूर हो गई। लंदन में कुछ अरसे बाद नुमाइश हुई तो अंग्रेज़ों ने उसे वहां बुलवाया था। शादियों में हरे-हरे पत्तों की पत्तल के सात दानों (शीरींदान, नमकदान, मेवादान, खोयादान रबड़ीदान मलाईदान और अचारदान) के अलावा घंटेवाले हलवाई की ‘रामपुरी” खास चीज होती थी।

इसी संबंध में एक और छोटी-सी बात उल्लेखनीय है। अमनचैन के दिन थे। सस्ते का जमाना था। एक दिन कोई हंसमुख ग्राहक, जिसकी घंटेवाले हलवाई के साथ दोस्ती थी, उसकी दुकान पर आया और एक पैसा जेब में से निकालकर लाला की तरफ फेंका और बोला, ‘लाला, यह पैसा ले लो, पिस्ते की लौज दे दो और जो रेजगारी बचे, वापस दे दो।’

लाला ने पैसा उठाया और अपने नौकर को देकर कहा, ‘इसे ट्राम की पटरी पर रख दो’ उसने रख दिया। थोड़ी देर बाद ट्राम आई और पैसे के दो टुकड़े हो गए। नौकर ने दोनों टुकड़े लाकर लाला को दे दिये। लाला ने एक दोने में पिस्ते की लीज़ रखकर और पैसे का आधा टुकड़ा ग्राहक को देकर कहा, ‘यह लो लौज और यह रही रेजगारी।

बेदवाड़े और घंटाघर के पास भाना बबर की दुकानें थी। वह महीन मिठाई बनाने में माहिर था। पिस्ते की बरफ़ी और खोपरे का पेड़ा बहुत अच्छा बनाता था। यहां की बनी मिठाई की जौहरियों में बड़ी मांग थी। बड़शाहबोले पर सरनी हलवाई (आनंदीमल सरनीमल) और छोटे दरीबे या पराठेवाली गली में बहुत-सी दुकानों पर सवेरे हलवा-पूरी, खस्ता कचौरी, मठरियां और नमकपारों की खूब बिक्री होती थी। बहुत-से घरों में उनसे नाश्ता होता था। शाम को जलेबियां और रात को औटे हुए दूध को कढ़ाई से एक चौड़े मुंह की लुटिया में भरकर ऊंची-लंबी धार से मटकियों में भरकर ग्राहकों को देते थे। एक परदेसी ने यह देखकर कहा था, “लालाजी, एक गज दूध हमें भी दे दो।”

मटिया महल में लाला झब्बर मल और चांदनी चौक में कूचा क़ाबिल अत्तार के पास हब्शी हलवा सोहन वाले की दुकान थी। मुसलमानों के यहां यह हलवा बहुत खाया जाता था। फतेहपुरी मस्जिद के नीचे शाहजपुरी होटल में और जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर मसीता कवाबी की दुकान पर भी लोग दूर-दूर से खाने आते थे।

कारीगर हीरा बेमिसाल

हीरा दिल्ली का एक मशहूर कारीगर था। पेठे के अंगूर तैयार करता था और छोटी-सी पिटारी में रुई लगाकार उस पर उन अंगूरों के गुच्छे सजा देता पेठे के अंगूरों पर असल अंगूरों का धोखा होता। अंगूर के गुच्छे कुछ मुरझाए हुए, कुछ लाली लिए और कुछ गहरे हरे होते। जब तक उन अंगूरों को हाथ से छुआ न जाता, अच्छे-अच्छे धोखा खा जाते।

नमकीन थाल सजाने में माहिर था कल्लू

मिठाई और नमकीन के थाल सजाने में कल्लू सिंह बांके ने बड़ा नाम कमाया था। अमीर घरों और महलों में उसकी बड़ी मांग थी। चादनी चौक में छोटे दरीबे के नुक्कड़ पर लाला कुंवर सेन की दुकान थी। उनके यहां से अच्छा नमकीन सौदा और कहीं नहीं मिलता था। दिल्ली में सबसे पहले दालबीजी उनके यहा ही बननी शुरू हुई थी। लाला कुंवर सेन बहादुरगढ़ के रहने वाले थे। उनके बड़ों ने 1857 ई. से पहले लुधियाना में काम शुरू किया था। फिर दिल्ली आकर आटे-दाल की दुकान कर ली थी। बाद में उसे बंद करके मिठाई और नमकीन की दुकान खोल ली। मूँग का दिल-ए-खुशहाल उनकी दुकान की ख़ास मिठाई थी। दरीबे में गौरीशंकर की दुकान मशहूर थी। इस दुकान का पेठा, अंदरसे की गोलियां, मलाई के लड्डू और फेनी लाजवाब होते थे।

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