गाजीउद्दीन खां ने निजाम खानदान शुरू किया था

गाजीउद्दीन खां निजामुल मुल्क का लड़का था, जिसने हैदराबाद के निजाम खानदान की बुनियाद डाली। यह औरंगजेब और उसके लड़के आलम शाह के दरबार के अमीरों में बड़ा रुतबा रखता था। यह मकबरा उसने अपने जीवन काल में ही बनवा दिया था और जब अहमदाबाद में 1710 ई. में उसकी मृत्यु हुई तो उसके शव को दिल्ली लाकर इसमें दफन किया गया था। यह इमारत अजमेरी दरवाजे के बाहर दिल्ली की मशहूर और दिलकश इमारतों में है।

यह इमारत चौकोर और दोमंजिला है। तमाम इमारत लाल पत्थर की बनी हुई है, जिसका चौड़ा अहाता तीन सौ गज मुरब्बा है। इसके तीन दरवाजे बड़े आलीशान और सुंदर बने हुए हैं, खासकर पूर्व की ओर का सदर दरवाजा। सदर दरवाजा पूर्व की दीवार में है, जिसके दोनों ओर दो छोटे-छोटे दरवाजे हैं, जिनका रास्ता सदर दरवाजे से आ मिलता है।

अंदर जाकर एक सहन 174 फुट मुरब्बा मिलता है, जिसके तीन जानिब दोमंजिला पक्के कमरे बने हुए हैं। पश्चिम में एक निहायत सुंदर मस्जिद है, जो सिर से पैर तक लाल पत्थर की बनी हुई नजर आती है। मस्जिद के तीन दालान हैं और तीन-तीन दर मस्जिद के चौतरफा पत्थर का कटघरा है।

मस्जिद की कुर्सी ढाई फुट ऊंची है। मस्जिद का सहन 88 फुट लंबा और 44 फुट चौड़ा है। पूर्व में पांच सीढ़ियां हैं। मस्जिद के दोन गुंबद चुने गच्ची के हैं। बीच का गुंबद बड़ा है और इधर-उधर के छोटे हैं जिनके कलस टूट गए हैं। सिर्फ बीच के गुंबद का एक कलस बाकी हैं।

मस्जिद के सहन में एक हौज 6 फुट लंबा-चौड़ा था। वह अब पाट दिया गया है। मस्जिद के उत्तर और दक्षिण में ऊपर और नीचे दो चबूतरे दो-दो फुट ऊंचे हैं। उत्तरी चबूतरे के ऊपरी हिस्से के नीचे तहखाना है। ऊपर के चबूतरे के उत्तरी हिस्से में लाल पत्थर का दोहरा दालान तीन दर का है।

नीचे के चबूतरे पर भी दालान है, जो पांच दर का है। ये दालान उस्तादों और उलेमाओं के रहने के थे। ऐसे ही दालान दक्षिण की तरफ भी हैं। दक्षिणी हिस्से के ऊपर के चबूतरे पर संगमरमर का खुला हुआ मकबरा है, जिसके चौगिर्दा संगमरमर की चार-चार बारीक काम को जालियां लगी हुई हैं। फर्श संगमरमर का है। दो तरफ उत्तर और दक्षिण में खुले हुए दरवाजे हैं।

उत्तर का दरवाजा मस्जिद की दीवार के करीब है और दक्षिणी दरवाजे के सामने दो सीढ़ियां संगमरमर की हैं। मकबरे के अंदर का चबूतरा 2 फुट 4 इंच ऊंचा है। इसके चारों और जालीदार संगमरमर का कटारा लगा है। अंदर तीन कब्रें बराबर-बराबर हैं, जिनमें बीच की कब्र मीर शहाबुद्दीन गाजीउद्दीन खां बानी मदरसा की है। दाहिनी तरफ उसके बेटे की और बाईं तरफ उसके पोते की कब्रें हैं।

मदरसे की इमारत में उत्तर और पश्चिम में चालीस-चालीस कमरे हैं, जिनके सामने चौड़ा बरामदा है। पूर्व की ओर बीच में दरवाजा है। बीच में एक गुंबदनुमा हाल है, जिसके दाएं और बाएं रुख पर दोमंजिला चालीस कमरों की एक कतार थी, जिनकी पछील की दीवार एक ही थी।

इनमें से बीस कमरों का रुख पूर्व को था और बीस का इमारत के अंदरवार दक्षिण को इन कमरों में विद्यार्थी रहा करते थे। इमारत के चारों कोनों पर चार बुर्ज हैं। इस इमारत के सामने एक बहुत बड़ा मैदान अजमेरी दरवाजे तक था, उत्तर-पश्चिम और दक्षिण की तरफ दूसरी शानदार इमारतें और उमरा के मकबरे थे। इन्हीं इमारतों में मौलाना फखरुद्दीन का मदरसा भी था, जहां उन्होंने 1799 ई. में इंतकाल किया।

1803 ई. में जब लार्ड लेक ने दिल्ली फतह की तो मराठों के हमलों का बड़ा डर लगा रहता था। ऐसी हालत में इतनी बड़ी इमारत का शहर की फसील से बाहर रहना खतरनाक समझा गया। इसलिए मदरसे को और आसपास की इमारतों को ढहाकर मैदान साफ कर देने का हुक्म हुआ।

बहुत-सा हिस्सा ढहा दिया गया, मगर इमारत पुख्ता थी। आसानी से ढह न सकी। इसलिए एक खंदक खुदवाकर इसे शहर की हद में ले लिया गया। अब शहर की फसील और बुर्ज तोड़कर मैदान साफ कर दिया गया है। सिर्फ अजमेरी दरवाजा खड़ा है।

मस्जिद के पीछे एक बुर्ज था, जो अकबर शाह का बुर्ज कहलाता था। 1825 ई. में हुकूमत ने इस इमारत में ओरिएंटल कालेज खोला, जो 1842 ई. तक इस इमारत में रहा। बाद में कश्मीरी दरवाजा रेजीडेंसी में चला गया। फिर इसमें यूनानी शफाखाना खोला गया। गदर के बाद इमारत पुलिस को मिल गई। फरवरी 1890 ई. तक पुलिस लाइन इसमें रही। बाद में इसमें अरबी स्कूल खोल दिया गया, जी कालेज बन गया था, मगर 1947 ई. के बलवे में वह खत्म हो गया और अब इसमें दिल्ली कालेज है। कंपाउंड के दरवाजे के दोनों ओर संगमरमर की दो तख्तियां लगी हुई हैं, जिन पर अंग्रेजी में दाएं हाथ लिखा है- 1890 ई. से एंग्लो-अरेबिक स्कूल पुलिस लाइन 1860 से 1890 ईसवी।’ बाएं हाथ लिखा है- ‘मकबरा फीरोजजंग प्रथम मदरसा 1790 से 1857 ईसवी।

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