1962 में चीन ने भारत (indo china war 1962) पर चुपके से हमला कर दिया। चीन (china) विस्तारवादी नीति के तहत भारतीय जमीन (indian land) पर कब्जा करते आ रहा था। सेना मुंहतोड़ जवाब दे रही थी लेकिन कहीं ना कही हथियारों की कमी आड़े आ रही थी। शायद यही वजह थी कि भारत ने अमेरिका (America) से मदद मांगी। भारत ने इससे पहले कभी भी विदेशों से हथियारों की मदद नहीं मांगी थी, लेकिन अब उसे ऐसा करना पड़ रहा था। जवाहर लाल नेहरू (jawaharlal nehru) ने वाशिंग्टन में भारत के राजदूत वी.के. नेहरू (b k nehru) के माध्यम से राष्ट्रपति जे.एफ. कैनेडी (john f kennedy) को एक आपात सन्देश भेजा।

कुलदीप नैयर (kuldeep nayyar) ने अपनी किताब में इस पूरे प्रकरण पर विस्तार से लिखा है। वो लिखते हैं कि कैनेडी ने वी.के. नेहरू से मिलने में जरा भी देर नहीं लगाई थी, हालांकि वे क्यूबा के मिसाइल संकट में उलझे हुए थे। बी.के. नेहरू यह देखकर हैरान रह गए थे कि कैनेडी भारत के एक बड़े आकार के नक्शे का बारीकी से अध्ययन कर रहे थे और उनके साथ उनके कई वरिष्ठ प्रशासनिक और सैनिक अधिकारी मौजूद थे।

सेक्रेटरी ऑफ स्टेट डीन रस्क का सुझाव था कि चीनी बढ़त को रोकने के लिए टैंकों का इस्तेमाल किया जाए। बी.के. नेहरू ने कहा कि टैंकों को मोर्चोंं तक पहुंचने में काफी समय लग जाएगा, क्योंकि उन्हें काफी घूम-फिरकर जाना होगा। रस्क ने पूछा कि वे सीधे क्यों नहीं जा सकते तो बी. के. नेहरू ने उन्हें बताया कि बीच में पूर्वी पाकिस्तान पड़ता था। इस पर रस्क ने कहा, “आप कोई पिकनिक मनाने नहीं जा रहे, आप अपने देश की रक्षा करने जा रहे हैं। टैंकों को सीधे घुसेड़ दो।

कैनेडी ने जानना चाहा कि क्या कृष्ण मेनन अब भी रक्षा मंत्री थे। बी.के. नेहरू ने ‘हां’ कहा तो कैनेडी बोले कि इससे अमरीका में कुछ मुश्किलें आ सकती थीं। उन्होंने बी. के. नेहरू से यह भी कहा कि वे निकिता ख़्रुश्चेव से ‘या तो कुछ करने या फिर चुप रहने के लिए कहें। (खुश्चेव ने लड़ाई के लिए पश्चिमी देशों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि वे भारत और चीन में लड़ाई छिड़वाकर अपनी जेबें भरना चाहते थे)। भारत ने जो हथियार मांगे थे, उनकी सूची देखकर अमरीका के एक ऊंचे अधिकारी ने टिप्पणी की थी, “चर्चिल ने न के बराबर हथियारों से लड़ाई जीतकर दिखा दी थी, और आप पीछे हटते हुए भी हर तरह के हथियार चाहते हैं!” वे चीन से टक्कर लेने के लिए भारत में शौर्य-भावना की कमी की तरफ इशारा कर रहे थे।

नेहरू ने दो पत्र भी लिखे थे

दबाव का सामना कर रहे नेहरू ने दो पत्र लिखकर अमेरिका से मदद मांगी थी। हालांकि लंबे समय तक सरकार पत्र लिखने से इंकार करती रही। वर्ष 2010 में जॉन एफ केनेडी प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी एंड म्यूज़ियम ने इन पत्रों को सार्वजनिक किया। एक पत्र में नेहरू ने लिखा था कि चीन ने नेफा के बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है। चीन के हमले से निपटने के लिए उन्होने युद्धक विमानों की आवश्यकता पर बल दिया। दूसरे पत्र में नेहरू ने कैनेडी को लिखा कि आपको पहला संदेश भेजने के कुछ घंटों के अंदर नेफ़ा में हालात और बिगड़ गए। अब तो पूरी ब्रह्मपुत्र घाटी पर गंभीर संकट पैदा हो गया है। यदि तत्काल कुछ नहीं किया गया तो पूरा असम, त्रिपुरा, मणिपुर और नागालैंड पर चीन कब्जा कर लेगा।

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