मुगल दरबार में ब्रितानी रेजिडेंट विलियम फ्रेजर करते थे दिल्ली की बारिश का इंतजार

इतिहासकार बताते हैं कि मुगल दरबार में ब्रितानी रेजिडेंट विलियम फ्रेजर दिल्ली की बारिश का मानों इंतजार करते थे। बारिश की बूंदे गिरी नहीं कि वो अपने दोस्त कर्नल जेम्स स्किनर के साथ खुशी से झूम उठते थे। बारिश के आगमन का जश्न मनाया जाता था। कश्मीरी गेट स्थित विलियम फ्रेजर के घर पर और हांसी में कर्नल स्किनर के आवास पर दोनों मित्र साथ-साथ सावन की रूमानियत का मजा लेते थे। कई बार दोनों दोस्त हरियाणा के दूरदराज के इलाकों में भी जाते थे।

आम खाने का इंतजार

साहित्यकार मृदुला गर्ग कहती हैं कि हमें बारिश का इंतजार रहता था। बारिश के बाद दिल्ली में पतंगबाजी भी होती थी। यही नहीं आम तभी खाते थे जब बारिश होती थी। अब तो बारिश के पहले ही आम खाते हैं, बारिश होने तक तो आम खत्म ही हो जाता है। पहले कहा जाता था कि जब तक बारिश ना हो आम मत खाओ, गरम होता है। चूसने वाला एक आम आता था।

एक रात में नौ इंच बारिश

मृदुला गर्ग कहती हैं कि दिल्ली में एक रात नौ इंच बारिश हुई। हर तरफ पानी ही पानी दिख रहा था। लेकिन इसका भी अपना मजा था, क्यों कि ये पानी ज्यादा देर तक रुकता नहीं था। हां, बारिश होते ही स्कूल, कालेज जरूर बंद हो जाते थे। कई बार पढ़ाई बंद कर अध्यापक कविता, कहानी सुनाते थे। बारिश एक त्योहार की तरह मनाया जाता था। बारिश आते ही तीज त्योहारों का इंतजार भी शुरू हो जाता था। हम तो बंगाली मार्केट स्थित घर में ही झूला डालकर झूलते थे।

बिना पकौड़ी, जलेबी बारिश अधूरी

चांदनी चौक में सेंट्रल बैंक के पास एक पकौड़ी की दुकान थी। दही के साथ पकौड़ी बनाता है। यह दुकान तब सेंट्रल पकौड़ीवाले के नाम से मशहूर थी। कारण, यह सेंट्रल बैंक के पास थी। इसी तरह जलेबी वाले का स्वाद भी जरूर लेते थे। बारिश में बेडमी पूरी की बात ना हो तो बेमानी लगती है। हम सभी बहनें बारिश में पुरानी दिल्ली जरूर जाते थे। पराठे वाली गली तो सबकी फेवरिट थी। इंडिया गेट पर बारिश के बाद खुले में आइसक्रीम का लुत्फ उठाना पसंद था। दरअसल, बारिश के इंतजार का अपना मजा है। आप बादलों को देखते हैं और फिर इंतजार करते हैं कि कब बारिश होगी। लेकिन आज कल की बारिश राहत से ज्यादा आफत बन जाती है।

इतिहासकार सोहेल हाशमी कहते हैं कि दिल्ली में बरसात के मौसम में ओखला बैराज जाते थे। यहां एक बहुत ही सुंदर बाग था। यहां एक जमाने में दिल्ली रेगटा होती थी, बोटस कंपटीशन होता था। सन 1960 तक यहां बारिश के मौसम में आना जाना लगा रहा। छतरपुर मेट्रो के पास पहले आम के बाग थे। इन बाग को बहादुर शाह जफर के पिता ने लगवाया था। आम का सीजन शुरू होने के बाद यहां लोग पिकनिक के लिए आते थे। तांगे पर बैठकर लोग दरी वगैरह लेकर आते थे। कई लोग तो टब में बर्फ भी लेकर आते थे। जिसको जो आम पसंद होता था वो माली को बोल देता था। पूड़ी और सब्जी यहीं बनाते थे। जो मीट खाने वाले होते थे वो कीमा और हरी मिर्च की सब्जी लेकर आते थे। इसके अलावा हौजखास भी बारिश में लोगों का ठिकाना होता था।

दिल्ली में जब पुरबइया हवा चलनी शुरू होती थी तो मानों त्योहार आ जाता था। पुरानी दिल्ली ही नहीं अपितु पूरी दिल्ली में लोग पतंगबाजी करते थे। पतंगबाजी का यह दौर 15 अगस्त तक चलता रहता था। इस दौरान खाने पर भी खूब जोर रहता था। बारिश की मिठाई की बात करें तो चावल और तिल की मिठाई खाते थे। इस मिठाई को अंदरसे की गोली कहते थे। घेवर खूब खाया जाता था। तली हुई चीजें खाते थे। अरुई के पत्ते, प्याज, आलू के पकौड़े लोग खाते थे।

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