हरिवंश राय बच्चन (harivansh rai bachchan ) के पिता प्रताप नारायण ने सिराथू तहसील के रूपनारायणपुर गांव के रामकिशोर की बेटी श्यामा से शादी तय कर दी। हरिवंश राय ने भी आपत्ति नहीं की। लेकिन शादी के मामले में उनकी तीन शर्तें थीं। पहली शर्त थी, किसी भी सूरत में दहेज नहीं लिया जाएगा। दूसरी शर्त लड़की वाले अगर अपनी ओर से कुछ नकद दें भी तो उसे छोटे भाई शालिग्राम की पढ़ाई में खर्च किया जाएगा, किसी और मद में नहीं। तीसरी और आखिरी शर्त थी कि शादी में कोई दिखावा नहीं होगा। आतिशबाजी, रोशनी वगैरह बिलकुल नहीं। यहां तक कि बारात में बाजेवाले भी नहीं रहेंगे। अपने बेटे की शर्तें प्रतापनारायण ने मान लीं।

सन 1926 की मई में हरिवंश बच्चन की शादी श्यामा से हुई। जिस समय शादी हुई उस समय हरिवंश राय बच्चन की उम्र साढ़े अठारह साल और पत्नी श्यामा की उम्र साढ़े चौदह साल थी। शादी के चार दिन बाद ही श्यामा को बुखार आ गया था। लगातार चार महीनों तक डॉक्टर-वैद्य के उपचार के बाद भी श्यामा का बुखार जब नहीं उतरा तब हरिवंश राय को जाने क्यों यह एहसास होने लगा कि भौतिक सुख-शांति और उनका स्वाभाविक जीवन रेल की पटरियों की तरह ऐसे ही समानांतर चलते रहेंगे, वे कभी एक दूसरे से मिल नहीं पाएंगे। इसी बीच दस साल गुजर गए। हरिवंश राय बी.ए. पास इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी से स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने लगे। कविताएं भी लिखते रहते।

हरिवंश जी की पत्नी श्यामा को बुखार चढ़ता और फिर उतर जाता। दो दिन ठीक रहतीं तो दस दिन फिर बीमार । लगातार दस सालों तक यही क्रम चलता रहा। मगर सन् 1936 के 15 अप्रैल से वह फिर स्वस्थ नहीं हुईं। लगातार 216 दिनों के बुखार के बाद उस साल 17 नवंबर को उन्होंने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। दस साल के इस विवाहित जीवन ने बच्चनजी को दूसरी बार फिर से बुरी तरह तोड़ दिया।

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