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Annapurna devi biography

Annapurna devi biography: सुरबहार और सितार की प्रसिद्ध वादिका अन्नपूर्णा देवी का जन्म विंध्य प्रदेश के मैहर नामक कस्बे में संगीत जगत के महान गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के यहां सन १९२७ में पूर्णिमा के दिन हुआ।

Annapurna devi biography: धर्मानुसार मुसलिम परिवार के होते हुए भी उस्ताद अलाउद्दीन हिंदू धर्म में भी उतनी ही आस्था रखते थे। इसी मान्यता के अनुरूप इस पुत्री का नाम, जिसे मैहर के महाराजा ने प्रस्तावित किया था, ‘अन्नपूर्णा’ रखा गया।

संगीत में योगदान (Annapurna devi biography)

Annapurna devi biography: बाल्यकाल से ही अन्नपूर्णा में संगीत की विलक्षण प्रतिभा को परखकर पिता ने उन्हें सितार की शिक्षा देनी शुरू कर दो। अन्नपूर्णा पिता के बताए मार्ग पर अथक परिश्रम हुई अग्रसर होने लगीं। सितार शिक्षा सन १९४० तक चली इसके बाद उस्ताद अलाउद्दीन खां ने सितार के स्थान पर सुरबहार का अभ्यास प्रारंभ करा दिया।

उस्ताद अलाउद्दीन खां उदयशंकर की नृत्य मंडली के साथ विदेश भ्रमण पर रहते थे। इसी नृत्य मंडली में उदयशंकर के छोटे भाई रविशंकर भी नृत्य करते थे। इसी क्रम में रविशंकर की नैसर्गिक प्रतिभा से अलाउद्दीन खाँ बहुत प्रभावित हुए और अवकाश के क्षणों में रविशंकर को गायन एवं सितार की शिक्षा देने लगे।

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परिजनों के खिलाफ जाकर किया विवाह (Annapurna devi personal life)

Annapurna devi biography: कालांतर में नृत्य छोड़कर वे उस्ताद अलाउद्दीन खां से विधिवत सितार की शिक्षा प्राप्त करने लगे। इसी शिक्षा क्रम में रविशंकर अन्नपूर्णा के निकट आए और परिजनों के कट्टर विरोध एवं आपत्तियों के बावजूद दोनों प्रणय-सूत्र में सन् १९४१ में बंध गए।

विवाहोपरांत पिता की आज्ञा से पति रविशंकर के साथ अन्नपूर्णा देवी ‘इप्टा’ संस्था की ओर से पं. जवाहरलाल नेहरू की ‘डिस्कवरी इंडिया’ आदि कार्यक्रमों के संगीत देने के निमित्त भारत भ्रमण पर निकल पड़ीं। इस प्रकार इन विविध कार्यक्रमों में अन्नपूर्णा देवी पार्श्व वादन किया करती थीं।

बहन ने की आत्महत्या

Annapurna devi biography: सन् १९४२ में अन्नपूर्णा देवी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र शुभेंदु को उन्होंने सितार की शिक्षा देकर कलाकार की श्रेणी तक पहुंचाया। अन्नपूर्णा की बड़ी बहन का विवाह पूर्वी पाकिस्तान में एक बंगाली मुसलमान के साथ हुआ था लेकिन उस परिवार का सौहार्दपूर्ण व्यवहार न होने के कारण उनके हृदय को गहरा आघात पहुंचा। अंततोगत्वा इसी कारण उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर डाली।

उस्ताद अलाउद्दीन खां के परिवार में संतानों का पालन-पोषण संकीर्णता से कोसों दूर हिंदू-मुसलिम समतामूलक परिवेश के अंतर्गत ही होता था। अतः इस समन्वयात्मक व उदार वृत्तिक संस्कार को भला कोई संकीर्ण व रूढ़िवादी परिवार कैसे आत्मसात् कर सकता था। बड़ी पुत्री के साथ हुई इस घटना से उस्ताद काफी मर्माहत हुए। इसी कारण वह पुत्री अन्नपूर्णा के वैवाहिक संबंध की स्वीकृति में भी हिचकिचाए।

महज समझौता बनकर रह गया विवाह

Annapurna devi biography: उस्ताद कहते थे कि “अच्छी जाति का, उत्तम विचारों का और संगीतज्ञ युवक अगर मेरी निगाह में आया तो मैं अन्नपूर्णा की शादी पर विचार कर सकता हूँ।” किंतु होनी को कौन रोक सकता है? अन्नपूर्णा का तो रविशंकर के साथ विवाह उस्ताद के सभी मानकों के अनुरूप होने के बावजूद भी अन्नपूर्णा का वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा।

अन्नपूर्णा और रविशंकर अलग- अलग रहने लगे। अंततोगत्वा दोनों का विवाह एक समझौता मात्र रह गया। पं. रविशंकर संगीत के क्षितिज पर विश्व पुरुष अवश्य हुए, किंतु वैयक्तिक तौर पर उस्ताद अलाउद्दीन खां की मर्यादा एवं चरित्र के विरुद्ध जीवन जीकर अन्नपूर्णा के लिए कितना उचित- अनुचित किया, यह या तो अन्नपूर्णा देवी हो जानती थीं या उनके निकट के आत्मीय।

संगीत को समर्पित किया पूरा जीवन

यह निर्विवाद है कि बाबा जीवनपर्यंत अन्नपूर्णा देवी के प्रति चिंतित रहे। संगीत की इस देवी को भी पति-सुख प्राप्त नहीं हुआ और उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संगीत को ही समर्पित कर दिया उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के आत्मीय शिष्य एवं सचिव पं. ज्योतिन भट्टाचार्य की पुस्तक ‘उस्ताद अलाउद्दीन खाँ ऐंड हिज म्यूजिक में बेटी अन्नपूर्णा एवं दामाद रविशंकर के संबंध और उससे संबंधित बाबा की मनोभावात्मक रूप से की गई टिप्पणियों से इस प्रसंग की अपेक्षित जानकारियां प्राप्त होती हैं।

Annapurna devi biography:  श्रीमती अन्नपूर्णा सार्वजनिक रूप से अपनी कला का प्रदर्शन नहीं के बराबर करती थी। एक साधिका के रूप में वह संगीत से जुड़ी हुई थीं। उनका कहना था कि बाबा (उस्ताद अलाउद्दीन खाँ) ने शिक्षण काल में ही कहा था कि उनका संगीत जनता में प्रदर्शित करने के लिए नहीं होगा, अपितु आत्मानंद एवं स्व-विकास तक ही सीमित रहेगा।” लेकिन संगीत के गंभीर पारखी व विद्वानों के बीच प्रदर्शन करने में वह कभी हिचकिचाई नहीं।

उस्ताद अलाउद्दीन खां के शिक्षण काल में उनकी अनुपस्थिति में शिष्यगण अन्नपूर्णाजी से ही संगीत सीखा करते थे। कालांतर में पं. ज्योतिन भट्टाचार्य, पं. हरिप्रसाद चौरसिया जैसे कलाकारों का मार्गदर्शन उन्होंने ही किया है। सेनिया घराने की समग्र विशेषताओं की नई कल्पना और नए रूप के साथ उनका वादन देखने को मिलता है। वैसे दिल्ली और मुंबई में कई बार उन्होंने ‘सुरबहार’ वादन का प्रदर्शन किया है। रागों में यमन कल्याण’ व ‘मालकोश’ और तालों में ‘चौताल’ एवं ‘धमार’ उन्हें प्रिय था। अन्नपूर्णा देवी का निधन 13 अक्टूबर 2018 को मुंबई में हुआ।

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